22 अप्रेल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले और इससे करीब डेढ़ साल पहले 7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल में हुए हमास हमले के बीच संभावित समानताओं की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, एक चिंताजनक और खतरनाक पैटर्न सामने आ रहा है। दुनिया के 2 अलग-अलग हिस्सों में 3,000 किलोमीटर की दूरी पर घटित इन दोनों घटनाओं में एक समान रणनीतिक सोच दिखाई देती है, पर्यटकों को निशाना बनाओ और सामान्य जन-जीवन में डर और खौफ की भावना पैदा कर दो।
7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकवादियों ने दक्षिणी इज़राइल में आयोजित नोवा म्यूजिक फेस्टिवल पर हमला किया। हमास ने किसी सैन्य अड्डे या रणनीतिक प्रतिष्ठान को निशाना नहीं बनाया। उनका लक्ष्य वे युवा, परिवार और आम नागरिक थे जो जीवन का उत्सव मनाने के लिए वहां एकत्र हुए थे। इस हमले का उद्देश्य केवल हत्या करना नहीं था, बल्कि यह संदेश देना था कि कोई भी स्थान सुरक्षित नहीं है। सामान्य दिन का आनंद ले रहे आम लोगों को निशाना बनाकर हमास उस सुरक्षा–बोध को तोड़ना चाहता था, जिस पर किसी भी स्वतंत्र समाज की नींव टिकी होती है।
करीब 18 महीने बाद इसी सोच और मंसूबे के साथ जम्मू–कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने हमला किया। बंदूकधारी आतंकियों ने घाटी के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक को निशाना बनाते हुये निर्दोष पर्यटकों पर गोलियां चला दीं। यहां भी निशाना सैनिक या सुरक्षा बल नहीं थे, बल्कि वे आम नागरिक थे, जो कश्मीर के पहाड़ों और वादियों में अपने किसी प्रिय के साथ आनंद लेने गए थे। उनका एकमात्र “अपराध” यह था कि वो इस भरोसे के साथ वहाँ गए थे कि सामान्य जीवन लौट आया है।
यही आधुनिक जिहादी आतंकवाद की मूल रणनीति है। जो आतंकी संगठन किसी राज्य पर सैन्य रूप से अपना ‘अवैध कब्जा, नहीं कर सकते, वे समाज को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ने का प्रयास करते हैं। वे नागरिकों को दुर्घटनावश नहीं, बल्कि सोच–समझकर निशाना बनाते हैं। उनकी सोच स्पष्ट है कि जितना निर्दोष शिकार होंगे, उतना ही बड़ा भय पैदा होगा। युद्ध में या आतंकियों से साथ लड़ते हुये मारा गया सैनिक संघर्ष का हिस्सा माना जाता है, लेकिन छुट्टियां मनाने आए किसी पर्यटक की हत्या उन लाखों लोगों तक डर का संदेश पहुंचाती है जो हमले की जगह पर मौजूद भी नहीं थे।
हमास ने दशकों के दौरान इस रणनीति को विकसित किया। उसने बार–बार उन स्थानों को निशाना बनाया जहां नागरिक सामान्य दिनचर्या में लीन होते हैं, जैसे बसें, बाजार, रेस्तरां, स्कूल और सार्वजनिक कार्यक्रम। आतंकियों का उद्देश्य केवल लोगों की जान लेना नहीं था, बल्कि यह डर जमाना था कि कोई भी स्थान सुरक्षित नहीं है, कोई भी दिनचर्या भरोसेमंद नहीं है और कोई भी समाज अपने नागरिकों को आतंक से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकता।
लगातार इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन इस मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियां वर्षों से हमास के नेताओं और लश्कर–ए–तैयबा (LeT) तथा जैश–ए–मोहम्मद (JeM) जैसे संगठनों के बीच संपर्कों पर नजर रखती रही हैं। कई मौकों पर हमास से जुड़े लोग पाकिस्तान में LeT से जुड़े नेताओं के साथ सार्वजनिक मंचों पर दिखाई दिए हैं। इन नज़दीकियों को महज संयोग कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पहलगाम हमले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) यह भी देख रही है कि क्या इस हमले में हमास जैसी कार्यशैली के संकेत मौजूद हैं। खुफिया अधिकारियों ने हमले से पहले और बाद में हमास, LeT और JeM से जुड़े व्यक्तियों के बीच संपर्कों की ओर संकेत किया है। जांच अभी जारी है, लेकिन समानताएं इतनी स्पष्ट हैं कि उन्होंने भारत के सुरक्षा तंत्र का ध्यान आकर्षित किया है।
पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी संगठनों को समर्थन देना कोई रहस्य नहीं है, कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने सार्वजनिक रूप से कश्मीर में सक्रिय अतिवादी समूहों और आतंकी संगठनो को समर्थन दिए जाने की बात स्वीकार की थी। वहीं, पूर्व ISI प्रमुख हमीद गुल ने जिहादी संगठनों को ‘रणनीतिक संपत्ति’ बताया था। दशकों से नीति यही रही है, नॉन स्टेट एकटर्स का उपयोग करके संघर्ष को आगे बढ़ाना और साथ ही आधिकारिक जिम्मेदारी से बच निकलना।
हालांकि अब जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह है आतंकवाद का तरीका। भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान की धरती से संचालित संगठन अब हमास की मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीति से प्रेरणा ले रहे हैं। उनका लक्ष्य सैन्य जीत हासिल करना नहीं है, बल्कि आर्थिक नुकसान पहुंचाना, भय फैलाना, जनता का विश्वास कमजोर करना और भारत को असुरक्षा के निरंतर चक्र में फंसाए रखना है।
इसीलिए पहलगाम का चयन संयोग नहीं था, ठीक वैसे ही जैसे नोवा फेस्टिवल का चयन संयोग नहीं था। पर्यटन आतंकवादियों के लिए सबसे आकर्षक लक्ष्यों में से एक है, क्योंकि यह सामान्य जीवन, समृद्धि और शांति का प्रतीक होता है। यदि किसी सैन्य काफिले पर हमला होता है तो उसका असर सैनिकों तक सीमित रहता है, लेकिन किसी पर्यटन स्थल पर हमला पूरे समाज और उसकी मनोदशा को प्रभावित करता है। लोग अपनी यात्राएं रद्द करने लगते हैं, व्यापार और काम धंधों को नुकसान होता है और सरकारों को चिंतित नागरिकों को भरोसा दिलाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं।
पहलगाम आतंकी हमले से पहले कश्मीर का पर्यटन उद्योग नई ऊंचाईयाँ हासिल कर रहा था। पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही थी और घाटी धीरे–धीरे संघर्ष क्षेत्र की अपनी पुरानी छवि से बाहर निकल रही थी। इस हमले का उद्देश्य इन उपलब्धियों को पलटना और भय को फिर से केंद्र में लाना था। 7 अक्टूबर को हमास का लक्ष्य भी यही था। निशाना केवल लोग नहीं थे, बल्कि वह भरोसा था कि शांति और सामान्य स्थिति लौट आई है।
लेकिन आधुनिक आतंकवाद गोलीबारी रुकने के साथ समाप्त नहीं हो जाता। हिंसा केवल पहला चरण होती है। दूसरा चरण धारणा और नेरेटिव की लड़ाई का होता है। वायरल वीडियो, मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया अभियान और राजनीतिक बयानबाजी स्वयं अभियान का हिस्सा बन जाते हैं। हमास ने दशकों में इस सूचना–युद्ध को परिष्कृत किया है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है नैतिक स्पष्टता को धुंधला करना, ध्यान बंटा कर असली अपराधियों से फोकस शिफ्ट करना और आतंकवादियों को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना। हमला संकट पैदा करता है और उसके बाद का नैरेटिव उस संकट की परिभाषा बदलने का प्रयास करता है।
पहलगाम हमले के बाद भारत में भी इसके कुछ संकेत दिखाई दिए। कुछ ही घंटों के भीतर ऐसी आवाज़ें सुनाई देने लगीं जो आतंकियों के मंसूबों और अनैतिक कुकृत्ययों को नज़रअंदाज़ करके सवालों की दिशा को अलग मोड़ दे रहे थे। आतंकी हमलावरों से ध्यान हटाकर उसे राजनीतिक संदर्भों की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे थे। यही कारण है कि आज आतंकवाद को केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि कथानक और सूचना के युद्ध के रूप में भी समझना आवश्यक है।
कई लोग कहेंगे कि 7 अक्टूबर का हमला और पहलगाम की घटना दो अलग–अलग भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़े मामले हैं। सतही स्तर पर यह बात सही भी है। लेकिन इनके पीछे काम कर रही रणनीतिक सोच में समानता साफ दिखाई देती है– नागरिकों को निशाना बनाना, सामान्य जीवन को बाधित करना, भय फैलाना, पर्यटन को नुकसान पहुंचाना और उसके बाद सूचना के क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करना।
नोवा फेस्टिवल और पहलगाम अलग–अलग स्थान थे, लेकिन उनकी आतंकवादी रणनीति आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी थी। मानव जीवन के लिए खतरा बने आतंकवाद का स्थान बदल सकता है, लेकिन उसकी रणनीति अक्सर वही रहती है।


