25/03/26 | 9:59 pm

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2030 तक 5,000 टन होगी दुर्लभ पृथ्वी चुम्बकों की घरेलू उत्पादन क्षमता: डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में कहा कि भारत दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुम्बकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने और लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की खोज में तेजी ला रहा है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक उत्पादन क्षमता को 5,000 टन तक पहुंचाना है।

मांग में तेजी से बढ़ोतरी का अनुमान

प्रश्नकाल के दौरान जितेंद्र सिंह ने बताया कि वर्तमान में देश में दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुम्बकों की मांग लगभग 4,000 टन है, जो 2030 तक बढ़कर करीब 8,000 टन होने का अनुमान है। यह बढ़ती मांग घरेलू उत्पादन क्षमता के विस्तार की आवश्यकता को दर्शाती है।

नई परियोजनाएं और उत्पादन क्षमता में विस्तार

सरकार ने नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन स्थायी चुम्बकों की प्रायोगिक परियोजना शुरू की है। इसके अलावा विशाखापत्तनम में समैरियम-कोबाल्ट चुम्बक संयंत्र 500 टन प्रति वर्ष की प्रारंभिक क्षमता के साथ चालू किया गया है, जिसे आगे बढ़ाकर 2,000 टन और फिर 2030 तक 5,000 टन करने का लक्ष्य रखा गया है।

लिथियम खोज और खनिज विकास पर जोर

जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार विभिन्न मंत्रालयों के समन्वय से महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और विकास को गति दे रही है। राजस्थान के देगाना क्षेत्र में लिथियम भंडार का प्रारंभिक सर्वेक्षण जारी है, जबकि जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में भी इसी तरह के प्रयास किए जा रहे हैं।

स्वच्छ ऊर्जा और नई तकनीकों के लिए अहम

उन्होंने कहा कि लिथियम और दुर्लभ पृथ्वी तत्व इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ये खनिज स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और एआई जैसी उभरती तकनीकों को भी मजबूती प्रदान करेंगे।

निजी क्षेत्र के लिए खुले अवसर

सरकार ने हालिया नीतिगत सुधारों के तहत महत्वपूर्ण खनिजों की खोज को निजी क्षेत्र के लिए भी खोल दिया है। इससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी, जबकि यूरेनियम जैसे संवेदनशील संसाधनों के लिए सुरक्षा प्रावधान बनाए रखे गए हैं।

दुर्लभ पृथ्वी गलियारे की घोषणा

घरेलू प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन को बढ़ावा देने के लिए तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और केरल में दुर्लभ पृथ्वी गलियारे विकसित करने की योजना बनाई गई है। इससे देश में एक मजबूत खनिज इकोसिस्टम तैयार होगा।

खनिज खोज में भौगोलिक चुनौतियां

डॉ. सिंह ने बताया कि दुर्लभ पृथ्वी तत्व समुद्र तट की रेत और चट्टानों दोनों में पाए जाते हैं, जिनकी खोज के लिए अलग-अलग तकनीकों की आवश्यकता होती है। राजस्थान, गुजरात और झारखंड जैसे राज्यों में चट्टानों में मौजूद भंडार की खोज अपेक्षाकृत जटिल है।

आयात निर्भरता घटाने की रणनीति

सरकार अवैध खनन पर नियंत्रण के साथ-साथ एक मजबूत और लचीली आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने पर जोर दे रही है, ताकि भारत महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके और भविष्य के औद्योगिक व तकनीकी विकास को समर्थन मिल सके। (इनपुट: पीआईबी)

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