भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने गेहूं और चावल के भंडारण में होने वाले कीट प्रकोप के सुरक्षित एवं टिकाऊ प्रबंधन के लिए वैकल्पिक धूमन तकनीकों पर शोध करने के उद्देश्य से समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। 30 सितंबर 2026 को हुए इस समझौते के तहत पारंपरिक रासायनिक धूमन के विकल्प विकसित और मानकीकृत किए जाएंगे। शोध अध्ययन को उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (डीएफपीडी) का सहयोग प्राप्त है।
लुधियाना में लागू होगी दो-वर्षीय परियोजना
दो-वर्षीय प्रथम चरण की परियोजना को लुधियाना स्थित आईसीएआर–सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट-हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीआईपीएचईटी) द्वारा लागू किया जाएगा। परियोजना का उद्देश्य अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए ऐसी तकनीकों का वैज्ञानिक परीक्षण करना है, जिन्हें बड़े स्तर पर अपनाया जा सके।
पारंपरिक रसायनों के सामने बढ़ी चुनौतियां
भारत में दशकों से भंडारित अनाज को कीटों से बचाने के लिए मुख्य रूप से एल्युमीनियम फॉस्फाइड (एएलपी) और मैलाथियान का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इनके बड़े पैमाने पर और बार-बार इस्तेमाल के कारण कई क्षेत्रों में कीटों में इनके प्रति प्रतिरोध बढ़ने की चुनौती सामने आई है। प्रमुख राज्यों में कीट प्रतिरोध 72-100% तक दर्ज किया गया है। इसके चलते धूमन के चक्र बढ़ने के साथ लागत में भी वृद्धि हुई है।
श्रमिकों और पर्यावरण पर भी ध्यान
मौजूदा रासायनिक धूमन विधियों से श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभाव की चिंताएं भी सामने आती हैं। नई पहल का उद्देश्य इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित, प्रभावी और टिकाऊ विकल्प विकसित करना है।
तीन वैकल्पिक तकनीकों का होगा परीक्षण
परियोजना के पहले चरण में तीन प्रमुख तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा। इनमें धातु के साइलो में रखे गेहूं के लिए 99% से अधिक शुद्धता वाली नाइट्रोजन गैस से धूमन शामिल है।
कार्बन डाइऑक्साइड और फॉस्फीन का संयुक्त इस्तेमाल
दूसरे परीक्षण के तहत एफसीआई और केंद्रीय भंडारण निगम (सीडब्ल्यूसी) के गोदामों में बोरियों में रखे गेहूं और चावल में कार्बन डाइऑक्साइड तथा फॉस्फीन गैस के संयुक्त धूमन की प्रभावशीलता का अध्ययन किया जाएगा। इसका उद्देश्य भंडारण से जुड़े कीटों का प्रभावी प्रबंधन और नियंत्रण करना है।
हर्मेटिक कवर में कार्बन डाइऑक्साइड का परीक्षण
तीसरे परीक्षण में वायुरुद्ध आवरण यानी हर्मेटिक कवर से ढकी बोरियों में रखे गेहूं और चावल के लिए कार्बन डाइऑक्साइड आधारित धूमन तकनीक का परीक्षण किया जाएगा। इससे सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण में कीट प्रबंधन की संभावनाओं का आकलन होगा।
अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में होगा विस्तार
दो-वर्षीय प्रथम चरण की प्रायोगिक परियोजना के बाद दूसरे चरण में अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में विभिन्न स्थानों पर एक वर्ष तक परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों के आधार पर क्षेत्र-विशेष के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) तैयार की जाएंगी।
वैज्ञानिक और टिकाऊ विकल्प विकसित करना लक्ष्य
इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक रासायनिक धूमन के वैज्ञानिक रूप से मान्य, विस्तार योग्य और टिकाऊ विकल्प विकसित करना है। इसके तहत कीटों में बढ़ते प्रतिरोध, व्यावसायिक जोखिम, पर्यावरणीय प्रभाव और धूमन से जुड़े अवशेषों की चिंताओं को दूर करने पर जोर दिया जाएगा।
विशेषज्ञों की मौजूदगी में हुआ एमओयू
एमओयू पर डीएआरई के सचिव एवं आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट, आईसीएआर के उप-महानिदेशक (एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग) डॉ. राजबीर सिंह, उप-महानिदेशक (क्रॉप साइंस) डॉ. डी. के. यादव और सहायक महानिदेशक (प्रोसेसिंग इंजीनियरिंग) डॉ. के. नरसैया की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए गए।
आईसीएआर-सीआईपीएचईटी और एफसीआई ने किया समझौते पर हस्ताक्षर
समझौता ज्ञापन पर आईसीएआर–सीआईपीएचईटी के निदेशक डॉ. नचिकेत कोतवालीवाले और एफसीआई के कार्यकारी निदेशक (क्वालिटी कंट्रोल) डॉ. ए. के. सिन्हा ने हस्ताक्षर किए। कार्यक्रम में डीएफपीडी की निदेशक प्रिया जैकब, एफसीआई के महाप्रबंधक (क्यूसी) राजगोपाल, आईसीएआर के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. देविंदर ढिंगरा और आईसीएआर–सीआईपीएचईटी के प्रिंसिपल साइंटिस्ट एवं परियोजना के लीड इन्वेस्टिगेटर डॉ. संदीप मान सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। (इनपुट: पीआईबी)


