ग्रीन एनर्जी और शिपिंग में भारत-नॉर्वे सहयोग को मिली नई दिशा

पूर्वी नॉर्वे जलवायु एवं पर्यावरण मंत्री एरिक सोल्हेम ने कहा है कि भारत और नॉर्वे के बीच बढ़ती हरित रणनीतिक साझेदारी वैश्विक जलवायु सहयोग के लिए एक व्यावहारिक और विस्तार योग्य मॉडल प्रस्तुत करती है।

उन्होंने एक लेख में कहा कि यह साझेदारी दोनों देशों की पूरक क्षमताओं को जोड़ती है — नॉर्वे की वित्तीय ताकत और तकनीकी विशेषज्ञता के साथ भारत का बड़ा पैमाना और विकास क्षमता।

एरिक सोल्हेम ने कहा कि जलवायु संकट, भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर वैश्विक सहयोग के दौर में भारत-नॉर्वे साझेदारी साझा उद्देश्य के साथ आगे बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि यह सहयोग उन क्षेत्रों पर केंद्रित है जो वैश्विक विकास के अगले चरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने कहा कि नॉर्वे की संप्रभु संपत्ति निधि, औद्योगिक विशेषज्ञता और ऊर्जा संसाधनों के जिम्मेदार प्रबंधन का अनुभव भारत को उसके महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने और ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में तेजी से विस्तार का लक्ष्य तय किया है।

एरिक सोल्हेम ने कहा कि नॉर्वे की कंपनियां पहले से ही ऑफशोर विंड, जलविद्युत और समुद्री क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन में सक्रिय हैं, जो भारत की भविष्य की जरूरतों से सीधे जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा कि यह पारंपरिक सहायता नहीं बल्कि रणनीतिक तालमेल का उदाहरण है।

ग्रीन शिपिंग को डीकार्बोनाइजेशन के सबसे कठिन क्षेत्रों में से एक बताते हुए उन्होंने कहा कि नॉर्वे इस क्षेत्र में अग्रणी बनकर उभरा है।

उन्होंने कहा कि भारत की लंबी समुद्री तटरेखा और तेजी से बढ़ता व्यापार नेटवर्क ग्रीन शिपिंग नवाचारों के लिए बड़ा अवसर प्रदान करता है।

एरिक सोल्हेम ने कहा कि भारतीय बंदरगाहों को वैश्विक मार्गों से जोड़ने वाला ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर न केवल उत्सर्जन कम करेगा बल्कि टिकाऊ व्यापार की नई दिशा तय करेगा।

उन्होंने कहा कि वैश्विक जलवायु सहयोग अक्सर ऐतिहासिक जिम्मेदारियों और वित्तीय दायित्वों की बहस में उलझ जाता है, लेकिन भारत और नॉर्वे एक अधिक व्यावहारिक मॉडल पर काम कर रहे हैं।

उनके अनुसार यह मॉडल बोझ बांटने की बजाय साझा हितों और प्रोत्साहनों के तालमेल पर आधारित है।

-(इनपुटःएजेंसी)