जितिया व्रत : मां की ममता से तपस्या तक, जीवन-संरक्षण की लोक आस्था में अभिव्यक्‍त सनातन दर्शन

भारतीय संस्कृति में मातृत्व केवल एक मानवीय भावना नहीं, बल्कि सृजन, करुणा, त्याग और असीम संरक्षण की दिव्य शक्ति है। मां के हृदय में संतान के लिए पलने वाला स्नेह जब संकल्प और साधना का रूप लेता है, तब वह सामान्य भाव से ऊपर उठकर तपस्या बन जाता है। इसी अलौकिक वात्सल्य का अत्यंत मार्मिक और दैदीप्यमान रूप जितिया व्रत, जिसे जीमूतवाहन व्रत अथवा जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है, में दिखाई देता है। “जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो इस वर्ष 3 अक्टूबर 2026 को पड़ रही है।” यह व्रत संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुख और मंगलमय भविष्य की कामना से जुड़ा है। इस अवसर पर माताएं कठिन उपवास और संयम का पालन करते हुए संतान के कल्याण के लिए प्रार्थना करती हैं। इस प्रकार मां की ममता साधना का रूप लेती है और संतान के प्रति उसका प्रेम एक आध्यात्मिक संकल्प में बदल जाता है।

भारतीय संस्कृति में व्रत और पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि, आत्मसंयम और लोक मंगल की भावना के वाहक हैं। भारतीय लोक जीवन के अनेक पर्वों में धर्म और अध्यात्म के साथ परिवार, प्रकृति, लोक स्मृति और सामाजिक संबंधों की सुंदर अभिव्यक्ति दिखाई देती है। जितिया इसी जीवंत लोक परंपरा की ऐसी कड़ी है, जिसमें मातृत्व की ममता तपस्या बनती है और संतान के मंगल की कामना आस्था का स्वर ग्रहण करती है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रचलित इस व्रत की विधियों में क्षेत्रीय विविधताएं मिलती हैं, पर इसकी मूल भावना समान है। संतान की रक्षा, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की मंगल कामना। यही कारण है कि जितिया केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि भारतीय लोक चेतना में रची-बसी उस जीवन-दृष्टि का प्रतीक है, जहां प्रेम त्याग की शक्ति देता है और ममता तपस्या में बदलकर संतान के मंगल का संकल्प बन जाती है।

जीवित्पुत्रिका से जितिया तक : नाम में छिपा भाव

‘जीवित्पुत्रिका’ नाम अपने भीतर ही इस व्रत की मूल भावना को समेटे हुए है। लोक भाषाओं में यही नाम धीरे-धीरे ‘जितिया’ या ‘जिउतिया’ जैसे रूपों में प्रचलित हुआ। बिहार और मिथिला सहित अनेक क्षेत्रों में आज भी यह पर्व लोकभाषा, लोकगीत और पारिवारिक संस्कारों के साथ जीवंत है। नाम चाहे ‘जीवित्पुत्रिका’ हो या ‘जितिया’, इसके केंद्र में जीवन की रक्षा और संतान का मंगल है। पारंपरिक रूप से इसे पुत्र की दीर्घायु से जोड़ा गया, लेकिन वर्तमान लोकाचार में अनेक परिवारों में माताएं अपनी सभी संतानों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं। इसलिए इसके आध्यात्मिक अर्थ को केवल पुत्र तक सीमित करने के बजाय इसे संतान और जीवन के संरक्षण की मातृ कामना के व्यापक संदर्भ में देखना अधिक उचित है। यहां ‘जीवन’ केवल सांसों की निरंतरता नहीं है। भारतीय दर्शन में जीवन का अर्थ शरीर, चेतना, संबंध और संस्कारों की निरंतरता से भी जुड़ा है। इसीलिए जीवित्पुत्रिका व्रत को जीवन के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाली लोकपरंपरा के रूप में समझा जा सकता है।

जीमूतवाहन की कथा : त्याग में निहित आध्यात्मिक शक्ति

जितिया व्रत की कथा परंपरा में जीमूतवाहन का चरित्र विशेष महत्व रखता है। लोक कथा में उन्हें ऐसे उदार और करुणाशील राजकुमार के रूप में स्मरण किया जाता है, जिन्होंने अपने प्राणों की चिंता किए बिना दूसरे के जीवन की रक्षा का संकल्प लिया। प्रचलित कथा के अनुसार, नागवंश के एक युवक को गरुड़ के लिए बलि के रूप में प्रस्तुत किया जाना था। उसकी मां का विलाप सुनकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने उस युवक के स्थान पर स्वयं को प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। वे गरुड़ के सामने स्वयं को समर्पित कर देते हैं। उनकी निस्वार्थ भावना और आत्मबलिदान से प्रभावित होकर गरुड़ अंततः उनके जीवन और नाग युवक दोनों की रक्षा करता है। इस कथा के विभिन्न लोक और धार्मिक संस्करण प्रचलित हैं। जीमूतवाहन की कथा का साहित्यिक इतिहास भी व्यापक है। यह कथा संस्कृत साहित्य के नागानंद तथा बाद की कथा-साहित्य परंपरा में मिलती है और बाद में लोक परंपराओं के माध्यम से जितिया व्रत की कथा से जुड़ी। इसलिए इसे किसी एक ग्रंथ की अपरिवर्तनीय कथा मानने के बजाय शास्त्रीय कथा-साहित्य और लोक परंपरा के परस्पर संवाद के रूप में देखना अधिक शोधपरक होगा। इस कथा का आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहरा है, जिस मनुष्य के भीतर करुणा जाग जाती है, वह अपने स्वार्थ की सीमा से बाहर निकल जाता है। जीमूतवाहन का त्याग यही बताता है कि किसी दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को संकट में डालना केवल वीरता नहीं, बल्कि उच्चतर करुणा की अवस्था है।

मातृत्व और जीमूतवाहन : दो त्यागों का अद्भुत संगम

जितिया की आध्यात्मिकता को समझने के लिए जीमूतवाहन की कथा और मातृत्व की साधना को साथ देखना आवश्यक है। कथा में जीमूतवाहन दूसरे के जीवन की रक्षा के लिए अपने जीवन का त्याग करने को तैयार होते हैं। दूसरी ओर व्रती मां अपनी संतान के जीवन और कल्याण की कामना करते हुए कठिन संयम धारण करती है। इन दोनों के बीच एक गहरा आध्यात्मिक सूत्र दिखाई देता है। अपने से पहले दूसरे का मंगल। मां के लिए संतान केवल परिवार का सदस्य नहीं होती; वह उसके अस्तित्व, आशा और भविष्य का विस्तार होती है। इसलिए संतान के लिए किया गया व्रत उसके भीतर निहित प्रेम को अनुशासन में बदल देता है। भूख-प्यास पर नियंत्रण बाहरी साधना है, लेकिन उसके पीछे जो भाव है, वह आंतरिक साधना है। यही कारण है कि जितिया को केवल ‘उपवास’ कहना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। “यह ममता के तपस्या में रूपांतरण की जीवंत अभिव्यक्ति है।”

व्रत : शरीर के संयम से मन की साधना तक

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ‘व्रत’ का अर्थ केवल भोजन का त्याग नहीं है। व्रत मूलतः किसी संकल्प को धारण करने का नाम है। मनुष्य जब किसी उद्देश्य के प्रति स्वयं को अनुशासित करता है, तो वह अपने भीतर की चंचलता को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। जितिया में यह भावना विशेष रूप से दिखाई देती है। व्रती महिला एक निश्चित अवधि तक भोजन और जल का त्याग करती है। यह शारीरिक रूप से कठिन साधना है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसका मूल उद्देश्य मन को एकाग्र करना और संकल्प को दृढ़ बनाना है। व्रत के दौरान कथा-श्रवण, पूजा और प्रार्थना इसी आंतरिक एकाग्रता को मजबूत करते हैं। इस संदर्भ में व्रत हमें यह संदेश देता है कि मनुष्य की इच्छाशक्ति उसके शरीर की सहज सीमाओं से बड़ी हो सकती है। जब कोई संकल्प प्रेम से जुड़ता है, तो कठिनाई भी साधना का रूप ले लेती है। हालांकि आधुनिक संदर्भ में यह भी समझना आवश्यक है कि कठोर निर्जला उपवास प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से सुरक्षित नहीं हो सकता। धार्मिक आस्था अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी व्यक्तिगत परिस्थितियों का ध्यान रखना भी आवश्यक है। आध्यात्मिकता का अर्थ शरीर की उपेक्षा नहीं, बल्कि शरीर और मन दोनों के प्रति सजगता है।

नहाय-खाय से पारण तक : साधना की क्रमिक यात्रा

जितिया की परंपरा कई क्षेत्रों में तीन दिनों के क्रम से जुड़ी दिखाई देती है। आरंभिक चरण में शुद्धि और तैयारी का भाव रहता है। इसके बाद मुख्य व्रत का दिन आता है, जब व्रती कठोर उपवास करती है। अंत में पारण के साथ व्रत पूर्ण होता है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इन चरणों के नाम और विधि में अंतर हो सकता है। यह क्रम आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। शुद्धि, संकल्प, साधना और पूर्णता ये किसी भी आध्यात्मिक यात्रा के चार प्रमुख चरण माने जा सकते हैं। नहाय-खाय शरीर और मन को तैयार करने का प्रतीक है। मुख्य व्रत आत्म संयम और संकल्प की परीक्षा है। कथा और पूजा मन को लक्ष्य से जोड़े रखते हैं। पारण उस साधना के पूर्ण होने का संकेत देता है। इस प्रकार जितिया की अनुष्ठान-पद्धति को केवल कर्मकांड के रूप में देखने के बजाय उसे एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें मनुष्य अपने भीतर धैर्य और विश्वास को मजबूत करता है।

मातृत्व : ममता से महातप तक

भारतीय संस्कृति में मां को केवल जन्म देने वाली शक्ति के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे त्याग, करुणा और संरक्षण की मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। जितिया इस सांस्कृतिक दृष्टि को लोक जीवन में प्रत्यक्ष रूप देती है। व्रत के दौरान मां की प्रार्थना में केवल यह भावना नहीं होती कि उसकी संतान लंबी आयु पाए। उसके भीतर यह भी कामना होती है कि संतान स्वस्थ रहे, सुखी रहे, सही मार्ग पर चले और जीवन में उन्नति करे। इस प्रकार मातृत्व भविष्य के प्रति जिम्मेदारी में बदल जाता है। मां का व्रत हमें यह भी याद दिलाता है कि भारतीय परिवार व्यवस्था में मातृशक्ति ने केवल घर की देखभाल नहीं की, बल्कि पीढ़ियों के संस्कारों और सांस्कृतिक स्मृतियों को भी सुरक्षित रखा। जितिया की कथा, गीत और अनुष्ठान आज तक जीवित हैं तो इसके पीछे महिलाओं की मौखिक परंपरा की बड़ी भूमिका है।

मिथिला में जितिया : लोक संस्कृति की जीवित धारा

मिथिला की सांस्कृतिक चेतना में लोकजीवन और अध्यात्म एक-दूसरे से पृथक नहीं, बल्कि एक ही जीवनधारा के दो प्रवाह हैं। यहां पर्व केवल कैलेंडर की तिथियां नहीं, बल्कि पीढ़ियों से प्रवाहित लोक स्मृति, आस्था, संस्कार और सामुदायिक आत्मीयता के जीवंत उत्सव हैं। समृद्ध लोक परंपराओं, गीतों, कथाओं, लोकाचार और स्त्री-केंद्रित अनुष्ठानों से सजी मिथिला की संस्कृति में जितिया इसी गहरी जीवन-दृष्टि का सशक्त प्रतीक है। मिथिला में जितिया केवल संतान की दीर्घायु और मंगल की कामना का व्रत नहीं, बल्कि मातृशक्ति, लोक आस्था और पारिवारिक आत्मीयता का संगम है। व्रती महिलाएं सामूहिक रूप से कथा सुनती-सुनाती हैं, लोकगीतों में अपनी भावनाओं को स्वर देती हैं और पारंपरिक विधि-विधानों के माध्यम से उस सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं, जो पुस्तकों से अधिक स्मृति, संस्कार और लोक अनुभव में जीवित रहती है। यहां एक मां का संकल्प केवल निजी आस्था नहीं रहता, बल्कि परिवार और समुदाय की सामूहिक मंगल कामना का रूप ले लेता है। मिथिला की लोक संस्कृति की विशिष्टता यह है कि यहां धर्म जीवन से अलग कोई अमूर्त सत्ता नहीं, बल्कि जीवन की सहज अनुभूति है। आस्था घर के आंगन में उतरती है, लोकगीतों में गूंजती है, अरिपन के रंगों में आकार लेती है और प्रकृति के साथ संवाद करती है। खेत, नदी, वृक्ष, पशु-पक्षी, ऋतुएं और पारिवारिक संबंध सब मिलकर यहां के पर्वों की आध्यात्मिक भूमि तैयार करते हैं। इसीलिए मिथिला में जितिया की आध्यात्मिकता मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। वह मां के संकल्प से आंगन तक और लोकगीत से आने वाली पीढ़ियों तक एक अखंड सांस्कृतिक धारा की तरह प्रवाहित होती है। जितिया यहां मातृ चेतना, लोक आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत उत्सव है।

लोकगीत : स्त्री मन की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति

जितिया के लोकगीत इस पर्व की आत्मा हैं। लिखित इतिहास अक्सर राजाओं, युद्धों और राजनीतिक घटनाओं को सुरक्षित रखता है, लेकिन लोकगीत सामान्य मनुष्य की भावनाओं को सुरक्षित रखते हैं। विशेष रूप से महिलाओं के लोकगीतों में परिवार, संतान, पीड़ा, आशा, भय और आशीर्वाद की भावनाएं पीढ़ियों तक संचित रहती हैं। जितिया के गीतों में मां की प्रार्थना केवल व्यक्तिगत नहीं होती। वह अपने बच्चे के लिए मंगल कामना करते हुए पूरे परिवार और समाज के सुख की आकांक्षा करती है। इस प्रकार लोकगीत धार्मिक अनुष्ठान को भावनात्मक गहराई प्रदान करते हैं। मौखिक परंपरा का यह संसार भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण प्रमाण है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को केवल गीत नहीं देती, बल्कि उसके साथ जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण भी देती है।

प्रकृति और जीवन के प्रति सम्मान

भारतीय लोक पर्वों में प्रकृति का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। खेत, नदी, तालाब, वृक्ष, पशु-पक्षी और ऋतुएं लोक जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। बिहार की विभिन्न पर्व परंपराओं में भी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सह-अस्तित्व की भावना दिखाई देती है। जितिया की कथा में नाग और गरुड़ जैसे जीव-जगत से जुड़े प्रतीक आते हैं। यह केवल पौराणिक कथा का हिस्सा नहीं है, बल्कि भारतीय कल्पना में मनुष्य और अन्य जीवों के संबंध की ओर भी संकेत करता है। जीमूतवाहन का त्याग किसी एक मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसे जीव की रक्षा के लिए है जिसे उस समय बलि का भाग बनना था। इस दृष्टि से जितिया की कथा जीवन को केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं करती। वह करुणा के विस्तार की ओर संकेत करती है, जहां प्राण है, वहां संवेदना का अधिकार है।

लोक विश्वास और आध्यात्मिकता का संबंध

जितिया का मूल आधार लोक विश्वास है। लोक विश्वास को आधुनिक वैज्ञानिक कसौटी पर मापना और उसकी धार्मिक अनुभूति को वैज्ञानिक तथ्य घोषित करना दोनों अलग बातें हैं। शोधपरक दृष्टि का दायित्व है कि वह धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए उसके सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थों को समझे। जितिया के संदर्भ में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि लोक विश्वास ने मातृत्व की भावनाओं को एक सामूहिक धार्मिक रूप दिया। व्यक्तिगत चिंता सामूहिक प्रार्थना बन गई और व्यक्तिगत त्याग सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा में बदल गया। यही लोकधर्म की शक्ति है। वह बड़े दार्शनिक सिद्धांतों को सामान्य जीवन के छोटे-छोटे अनुष्ठानों में उतार देता है। मां जब संतान के लिए व्रत करती है, तो वह किसी दार्शनिक ग्रंथ का पाठ नहीं कर रही होती, लेकिन उसका व्यवहार त्याग, संयम, करुणा और विश्वास जैसे दार्शनिक मूल्यों को जीवंत कर देता है।

जितिया और भारतीय करुणा-दर्शन

भारतीय अध्यात्म में करुणा को केवल भावुकता नहीं माना गया। करुणा मनुष्य को अपने अहंकार से बाहर निकालने वाली शक्ति है। जीमूतवाहन की कथा इसी करुणा को चरम रूप में प्रस्तुत करती है। वे उस व्यक्ति को नहीं जानते, जिसकी रक्षा के लिए स्वयं को संकट में डालते हैं। फिर भी उसके जीवन का मूल्य उन्हें अपने जीवन जितना ही महत्वपूर्ण लगता है। यही भाव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसी व्यापक भारतीय चिंतन-परंपरा से संवाद करता है। जितिया के माध्यम से जीमूतवाहन का चरित्र लोकजीवन में इसलिए जीवित रहा क्योंकि उनकी कथा मां के अपने त्याग से सहज रूप से जुड़ गई। एक ओर पुत्र की रक्षा के लिए मां का तप है, दूसरी ओर दूसरे के जीवन के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण। दोनों मिलकर करुणा और संरक्षण के एक ही आध्यात्मिक सूत्र को सामने लाते हैं।

बदलते समय में जितिया की प्रासंगिकता

आज जीवन की गति तेज है। परिवारों का स्वरूप बदल रहा है, संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार ले रहे हैं और पारंपरिक जीवन-पद्धतियां भी बदल रही हैं। इसके बावजूद जितिया जैसी परंपराएं अनेक क्षेत्रों में आज भी जीवित हैं। इसका कारण केवल धार्मिक आस्था नहीं है; इसके पीछे भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी है। आज की पीढ़ी के लिए जितिया का महत्व इस बात में भी है कि यह उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराता है। जब बच्चे अपनी मां और परिवार की महिलाओं को इस कठिन साधना में देखते हैं, कथा सुनते हैं और लोकगीतों से परिचित होते हैं, तो वे केवल एक पर्व के बारे में नहीं सीखते, बल्कि परिवार, त्याग और परंपरा के अर्थ को समझते हैं। हालांकि परंपरा को जीवित रखने का अर्थ यह नहीं कि उसके हर बाहरी रूप को अपरिवर्तनीय माना जाए। समय के साथ अनुष्ठानों में परिवर्तन स्वाभाविक है। महत्वपूर्ण यह है कि मूल मानवीय और आध्यात्मिक मूल्य जीवित रहें।

जितिया का व्यापक आध्यात्मिक संदेश

जितिया का आध्यात्मिक संदेश कई स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला, यह प्रेम को त्याग में बदलने की प्रेरणा देता है। दूसरा, यह बताता है कि सच्चा संकल्प कठिन परिस्थितियों में ही परखा जाता है। तीसरा, जीमूतवाहन की कथा मनुष्य को परोपकार और प्राण रक्षा का संदेश देती है। चौथा, व्रत आत्म संयम और धैर्य की साधना का प्रतीक है। पांचवां, लोकगीत और सामूहिक अनुष्ठान सामाजिक संबंधों को मजबूत करते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण, यह पर्व मनुष्य को जीवन के प्रति श्रद्धा करना सिखाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो जितिया में मां अपने बच्चे के लिए केवल लंबी आयु नहीं मांगती। वह उसके जीवन में मंगल, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि और सुरक्षा की कामना करती है। इस प्रार्थना में व्यक्तिगत स्वार्थ से अधिक दूसरे के सुख की आकांक्षा है। यही वह बिंदु है जहां लोकपर्व आध्यात्मिक साधना बन जाता है।

ममता जब साधना बन जाती है

जितिया व्रत भारतीय लोक जीवन की उस गहरी आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है, जिसमें प्रेम केवल भावना नहीं रहता, बल्कि संकल्प और तपस्या का रूप धारण कर लेता है। जीवित्पुत्रिका की परंपरा में मां की ममता, जीमूतवाहन का त्याग, लोकगीतों की संवेदना और सामूहिक आस्था एक ही आध्यात्मिक धारा में प्रवाहित होते हैं। इस व्रत का वास्तविक सौंदर्य बाहरी अनुष्ठानों से कहीं अधिक उसके अंतरभाव में निहित है। भूख-प्यास सहना साधना का एक रूप हो सकता है, लेकिन किसी दूसरे के जीवन और कल्याण को अपने सुख से ऊपर रखना उससे भी बड़ी साधना है। जीमूतवाहन की कथा इसी त्याग और परोपकार के सत्य को लोकचेतना में प्रतिष्ठित करती है, जबकि मां का व्रत उस आदर्श को अपने जीवन में उतारने का संकल्प बन जाता है। मिथिला और बिहार जैसे क्षेत्रों में ऐसी परंपराएं इसलिए जीवित हैं कि वे केवल धार्मिक स्मृतियां नहीं, बल्कि समाज की संवेदना और सांस्कृतिक निरंतरता की वाहक हैं। वे पीढ़ियों को जोड़ती हैं, लोकस्मृति को संजोती हैं और जीवन के प्रति करुणा को गहरा करती हैं। आज जब भौतिक उपलब्धियों के बीच मनुष्य तनाव, संबंधों की दूरी और बढ़ती व्यक्तिवादिता से जूझ रहा है, तब जितिया का संदेश और अधिक अर्थपूर्ण हो उठता है। यह स्मरण कराता है कि जीवन की सार्थकता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि करुणा, संयम, त्याग और निस्वार्थ प्रेम में भी निहित है। इस अर्थ में जितिया केवल संतान की दीर्घायु का व्रत नहीं, बल्कि मातृत्व की तपस्या, करुणा की साधना और जीवन के प्रति श्रद्धा का लोक पर्व है। जहां प्रेम निस्वार्थ हो जाता है, वहां ममता स्वयं अध्यात्म का रूप धारण कर लेती है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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