उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने मंगलवार को नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत सरकार के पूर्व सचिव सुरेंद्र कुमार पचौरी द्वारा लिखित पुस्तक ‘चैलिस ऑफ एम्ब्रोसिया: राम जन्मभूमि– चुनौती और प्रतिक्रिया’ का विमोचन किया।
सदियों के संघर्ष की संतुलित प्रस्तुति
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह पुस्तक भगवान श्रीराम के जन्मस्थल को पुनः प्राप्त करने के लिए सदियों से चले आ रहे संघर्ष की सम्पूर्ण कहानी प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि लेखक ने इस ऐतिहासिक विषय को संतुलित, सहानुभूतिपूर्ण और विद्वतापूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है, जिसमें न तो सनसनी है और न ही तथ्यात्मक विकृति।
सभ्यतागत यात्रा का निर्णायक पड़ाव
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को भारत की सभ्यतागत यात्रा का एक निर्णायक पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में आस्था, इतिहास, कानून और लोकतंत्र- सभी गरिमा के साथ एक मंच पर आए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही देश में हजारों मंदिर हों, लेकिन जन्मस्थल पर बना राम मंदिर अपनी विशिष्ट महत्ता रखता है।
श्रीराम भारत की आत्मा
राधाकृष्णन ने कहा कि भगवान श्रीराम भारत की आत्मा हैं और भारतीय धर्म की चेतना हैं। सत्य की हमेशा विजय होती है और धर्म कभी हार नहीं मानता। महात्मा गांधी के राम राज्य की अवधारणा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह न्याय, समानता और मानवीय गरिमा का प्रतीक है।
कानूनी प्रक्रिया ने दिखाई लोकतंत्र की ताकत
उपराष्ट्रपति ने राम जन्मभूमि से जुड़े लंबे कानूनी संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पीड़ादायक थी। उन्होंने कहा कि अन्य देशों में ऐसी स्थिति की कल्पना भी कठिन होती, लेकिन भारत में करोड़ों लोगों की आस्था होने के बावजूद भूमि का निर्णय केवल साक्ष्यों और विधिसम्मत प्रक्रिया के आधार पर हुआ, जो भारतीय लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाता है।
2019 का फैसला ऐतिहासिक मोड़
सीपी राधाकृष्णन ने 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इस निर्णय ने लाखों भारतीयों के लंबे समय से देखे जा रहे सपनों को साकार किया। राम मंदिर के निर्माण ने भारतीयों का आत्म-सम्मान बहाल किया है।
भावनात्मक संतुलन और सत्य के प्रति निष्ठा आवश्यक
उपराष्ट्रपति ने इतिहास लेखन की जटिलताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसमें भावनात्मक संतुलन और सत्य के प्रति निष्ठा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सुरेंद्र कुमार पचौरी ने राम जन्मभूमि आंदोलन के सार को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस संघर्ष, बलिदानों और प्रयासों को समझ सकें।
एएसआई रिपोर्ट और जनभागीदारी
राधाकृष्णन ने एएसआई की खोजों का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले से मौजूद संरचना के प्रमाणों ने न्यायिक निर्णय को प्रभावित किया। फैसले के बाद देशभर में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली। उन्होंने राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के क्राउड-फंडिंग अभियान की भी सराहना की, जिसके तहत दुनिया भर से 3,000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जुटाई गई।
निजी स्मृतियां और नेतृत्व की सराहना
उपराष्ट्रपति ने 1990 के दशक में शिला पूजा में अपनी मां की भागीदारी की निजी स्मृति साझा की। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि राम मंदिर के पुनरुद्धार को परिपक्व लोकतंत्र और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
भगवान श्रीराम की वैश्विक स्वीकार्यता
सीपी राधाकृष्णन ने भगवान श्रीराम की वैश्विक स्वीकार्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी आस्था अयोध्या और रामेश्वरम से लेकर फिजी और कंबोडिया के अंकोरवाट तक फैली हुई है। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि सच्ची महानता सद्गुणों और दिल जीतने में है, न कि सत्ता के विस्तार में। (इनपुट: आईएएनएस)


