भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योग जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही अहम भूमिका सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) भी निभाते हैं। यदि बड़े उद्योग अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ हैं, तो एमएसएमई उसकी धड़कन हैं, जो देश के दूर-दराज़ इलाकों तक विकास और रोजगार की ऊर्जा पहुंचाते हैं। अक्सर हम बड़े कॉरपोरेट घरानों की ऊंची इमारतों और उनके विशाल कारोबार को देखकर आर्थिक प्रगति का आकलन करते हैं, लेकिन भारत की असली आर्थिक ताकत उन छोटे-छोटे उद्यमों में छिपी है, जहां कोई बुनकर, कोई लुहार, कोई खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) का उद्यमी या कोई छोटा सॉफ्टवेयर डेवलपर अपने परिश्रम और नवाचार से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रहा है।
हर वर्ष 27 जून को मनाया जाने वाला ‘अंतरराष्ट्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) दिवस’ केवल एक औपचारिक दिवस नहीं है। यह उन करोड़ों छोटे उद्यमियों, कारीगरों और नवप्रवर्तकों के योगदान को सम्मान देने का अवसर है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने साहस, मेहनत और संकल्प के बल पर न केवल अपनी आजीविका बना रहे हैं, बल्कि देश के आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
संस्कृत की एक प्रसिद्ध सूक्ति है “अमंत्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम्।” अर्थात् ऐसा कोई अक्षर नहीं जिससे मंत्र न बन सके और ऐसी कोई जड़ नहीं जिससे औषधि न बनाई जा सके। यह सूक्ति हमें सिखाती है कि इस सृष्टि में कोई भी वस्तु, व्यक्ति या विचार निरर्थक नहीं होता; आवश्यकता केवल उसकी क्षमता को पहचानने और उसे सही दिशा देने की होती है। ठीक यही दर्शन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र की कार्यशैली में भी दिखाई देता है। समाज का कोई भी वर्ग, कोई भी कौशल, कोई भी स्थानीय संसाधन अथवा कोई छोटा-सा विचार ऐसा नहीं है, जिसे यह क्षेत्र उद्यम, नवाचार और परिश्रम के बल पर आर्थिक समृद्धि के सूत्र में न बदल दे। MSME केवल उद्योगों का एक नेटवर्क भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था की वह सशक्त आधारशिला है, जो गांव और शहर, अमीर और गरीब, पारंपरिक कौशल और आधुनिक तकनीक, तथा स्थानीय उत्पादन और वैश्विक बाजार के बीच एक सुदृढ़ सेतु का कार्य करती है। यह क्षेत्र ‘अंत्योदय से सर्वोदय’ के भारतीय विकास-दर्शन को व्यवहार में उतारते हुए समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी आत्मनिर्भरता, सम्मानजनक आजीविका और आर्थिक भागीदारी का अवसर प्रदान करता है।
वस्तुतः MSME केवल आर्थिक गतिविधियों का माध्यम नहीं, बल्कि समावेशी विकास, रोजगार सृजन, सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय संतुलन, महिला सशक्तिकरण, नवाचार और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प का सबसे सशक्त वाहक है। प्रस्तुत आलेख इसी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र की ऐतिहासिक यात्रा, आर्थिक एवं सामाजिक योगदान, वर्तमान चुनौतियों, नीतिगत सुधारों, सरकारी पहलों तथा भविष्य की संभावनाओं का गहन, शोधपरक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। साथ ही यह समझने का प्रयास करता है कि किस प्रकार MSME भारत को एक समावेशी, आत्मनिर्भर और वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
परिभाषा का नया अवतार: वैधानिक वर्गीकरण और जमीनी बदलाव
भारत में छोटे और कुटीर उद्योगों का इतिहास सदियों पुराना है। हमारे यहां वैदिक काल से ही अलग-अलग तरह के शिल्प और कुटीर उद्योग फलते-फूलते रहे हैं। लेकिन आधुनिक समय में इसे कानूनी और व्यवस्थित पहचान साल 2006 के MSMED अधिनियम से मिली। समय बदला, तकनीक बदली और वैश्विक बाजार की मांगें भी बदलीं। इसे देखते हुए भारत सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत इसकी पुरानी परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया। यह बदलाव एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ।
पुरानी परिभाषा में सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि वह ‘मैन्युफैक्चरिंग’ (सामान बनाने वाले) और ‘सर्विस’ (सेवा देने वाले) क्षेत्रों को अलग-अलग चश्मे से देखती थी। साथ ही, उसमें केवल इस बात को आंका जाता था कि आपने मशीनरी या प्लांट में कितना पैसा लगाया है। इसका एक नुकसान यह होता था कि छोटे उद्योग इस डर से अपनी कंपनी को बड़ा नहीं करते थे कि अगर वे थोड़े भी बड़े हुए, तो सरकार से मिलने वाले फायदे, सब्सिडी और टैक्स छूट हाथ से निकल जाएगी। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘बढ़ने का डर’ (Fear of Growing) या ‘बौनापन’ (Dwarfism) कहा जाता था। इस डर को खत्म करने के लिए सरकार ने निवेश (Investment) और सालाना कारोबार (Turnover) दोनों को मिलाकर एक नया और साझा मापदंड तैयार किया, जो आज के समय में इस प्रकार लागू है।
भारत में MSME का नया वर्गीकरण
भारत सरकार द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) का वर्गीकरण निवेश (Investment) और वार्षिक टर्नओवर (Turnover) के आधार पर किया गया है। इसके अनुसार, सूक्ष्म (Micro) उद्यम वे हैं, जिनमें संयंत्र, मशीनरी या उपकरणों में ₹1 करोड़ तक का निवेश तथा ₹5 करोड़ तक का वार्षिक टर्नओवर होता है। लघु (Small) उद्यम वे हैं, जिनमें ₹10 करोड़ तक का निवेश और ₹50 करोड़ तक का वार्षिक टर्नओवर होता है। इसी प्रकार, मध्यम (Medium) उद्यम वे हैं, जिनमें ₹50 करोड़ तक का निवेश तथा ₹250 करोड़ तक का वार्षिक टर्नओवर होता है। यह वर्गीकरण उद्यमों के आकार, उनकी आर्थिक क्षमता तथा सरकारी योजनाओं और प्रोत्साहनों के पात्रता निर्धारण का महत्वपूर्ण आधार है। इस नई परिभाषा ने छोटे उद्योगों को मानसिक आजादी दे दी। अब वे बिना किसी डर के अपना कारोबार बढ़ा सकते हैं, नई मशीनें खरीद सकते हैं और अपना टर्नओवर बढ़ा सकते हैं, जबकि उनका सरकारी लाभ भी सुरक्षित रहता है। इस एक कदम ने भारतीय उद्यमियों को वैश्विक स्तर पर सोचने और बड़ी छलांग लगाने के लिए नए पंख दे दिए हैं।
आर्थिक धड़कन: आंकड़ों और शोध के झरोखे से
जब हम भारतीय अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद (GDP), रोजगार और निर्यात के आंकड़ों को देखते हैं, तो समझ आता है कि MSME को क्यों इस देश का ‘साइलेंट हीरो’ कहा जाता है। आंकड़े सिर्फ सूखी संख्याएं नहीं होते, वे देश के आम लोगों के पसीने, उनकी मेहनत और उनके हौसले की कहानी बयां करते हैं। देश की जीडीपी में हिस्सेदारी: भारत की कुल जीडीपी में MSME क्षेत्र का योगदान लगभग 30% है। अगर हम सिर्फ विनिर्माण (Manufacturing Output) की बात करें, तो कुल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 45% से भी ज्यादा है। इसका मतलब है कि देश में बनने वाली लगभग आधी चीजें इन्हीं छोटे कारखानों से निकलती हैं। रोजगार का सबसे बड़ा समंदर: खेती के बाद अगर भारत में सबसे ज्यादा लोगों को कोई क्षेत्र काम देता है, तो वह MSME है। आज देश के लगभग 11 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन उद्योगों पर निर्भर हैं। भारत के पास दुनिया की सबसे युवा आबादी है, जिसे हम ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) कहते हैं। इस युवा ऊर्जा को काम देकर देश की ताकत में बदलने का सबसे बड़ा काम यही क्षेत्र कर रहा है।
वैश्विक बाजार में धाक: भारत से विदेशों को होने वाले कुल निर्यात (Exports) में MSME की हिस्सेदारी लगभग 40% से 45% के बीच है। हमारे पारंपरिक हस्तशिल्प, कपड़े, चमड़े का सामान, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ (Processed Food) और यहां तक कि रक्षा क्षेत्र के बड़े उपकरणों के छोटे-छोटे कलपुर्जे भी इन्हीं लघु उद्योगों में बनते हैं और दुनिया भर में भेजे जाते हैं। औपचारिकता की ओर बढ़ते कदम: सरकार के ‘उद्यम पोर्टल’ (Udyam Portal) पर करोड़ों छोटे-बड़े उद्योगों का रजिस्ट्रेशन इस बात का सबूत है कि जो अर्थव्यवस्था पहले बिना किसी कागज़ात के अनौपचारिक रूप से चल रही थी, वह अब तेजी से संगठित और डिजिटल ढांचे में बदल रही है। इससे इन छोटे व्यापारियों के लिए बैंकों से लोन लेना और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना बेहद आसान हो गया है।
सामाजिक समरसता और क्षेत्रीय संतुलन का असली संवाहक
कोई भी आर्थिक विकास तब तक सच्चा नहीं माना जा सकता, जब तक उसका फायदा समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति और देश के सबसे पिछड़े इलाके तक न पहुंचे। अक्सर देखा जाता है कि बड़े-बड़े उद्योग वहीं लगते हैं जहां बंदरगाह हों, बड़े हाईवे हों या बड़े महानगर हों। इसकी वजह से कुछ गिने-चुने शहरों में तो खूब तरक्की हो जाती है, लेकिन हमारे गांव और कस्बे विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं। इससे शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ता है और गांवों से पलायन होने लगता है। MSME इस गंभीर समस्या का सबसे व्यावहारिक और सुंदर समाधान है। यह देश के भीतर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने का काम बड़ी खामोशी से करता है।
ग्रामीण और शहरी असंतुलन को कम करना
लघु उद्योग देश के सुदूर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में फैले हुए हैं। ये उद्योग किसी बाहरी मदद पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय स्तर पर मिलने वाले कच्चे माल, स्थानीय लोगों के हुनर और हमारी पारंपरिक कलाओं को आधार बनाते हैं। चाहे बनारस की प्रसिद्ध रेशमी साड़ियां हों, मुरादाबाद का पीतल उद्योग हो, या चंदेरी का सिल्क ये सभी स्थानीय पूंजी को वैश्विक मूल्य में बदलते हैं। जब लोगों को उनके घर के पास ही रोजगार मिल जाता है, तो वे अपने परिवार को छोड़कर शहरों की झुग्गियों में रहने को मजबूर नहीं होते। यह क्षेत्र गांवों से शहरों की ओर होने वाले अंधाधुंध पलायन को रोकने वाली एक मजबूत दीवार है।
महिला सशक्तिकरण की नई इबारत
MSME क्षेत्र ने भारत की महिलाओं को सिर्फ एक ‘मजदूर’ या ‘श्रम शक्ति’ के दायरे से बाहर निकालकर खुद अपनी किस्मत लिखने वाली ‘मालकिन और नियोक्ता’ (Employer) के आसन पर बैठाया है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी वित्तीय योजनाओं का लाभ उठाने वालों में सबसे बड़ी संख्या महिलाओं की है। आज गांव की महिलाओं के छोटे स्वयं सहायता समूहों (SHGs) द्वारा बनाए जा रहे अचार, पापड़ और हस्तशिल्प से लेकर शहरों में महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे बुटीक, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और आईटी स्टार्टअप्स तक, हर जगह महिलाएं अपनी वित्तीय स्वतंत्रता की नई कहानी लिख रही हैं। जब एक महिला उद्यमी बनती है, तो वह केवल एक परिवार को नहीं संभालती, बल्कि पूरे समाज की सोच को बदल देती है।
हाशिए के समाज को मुख्यधारा में लाना
विभिन्न शोध और सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश के पंजीकृत MSMEs के मालिकाना हक का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भाई-बहनों के पास है। बड़े उद्योगों में जहां पूंजी की भारी जरूरत होती है, वहीं लघु उद्योग कम पैसे में भी शुरू किए जा सकते हैं। इस वजह से समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों के लोगों के लिए यह क्षेत्र सम्मान और तरक्की का रास्ता खोलता है। यह डॉ. भीमराव आंबेडकर के उस सपने को हकीकत में बदलने जैसा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दलितों और पिछड़ों का असली सशक्तिकरण राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ उनके आर्थिक रूप से मजबूत होने से ही आएगा।
सरकारी नीतियों का सुरक्षा कवच: ‘आत्मनिर्भरता’ की संजीवनी
सरकार ने इस क्षेत्र की अहमियत को बखूबी समझा है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में MSME को सिर्फ कागजी सुरक्षा नहीं दी गई, बल्कि एक पूरा ऐसा माहौल (Ecosystem) तैयार करने की कोशिश की गई है जिससे ये वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर सकें। सरकार की कुछ प्रमुख नीतियां और योजनाएं इस क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी साबित हुई हैं।सबसे पहले बात करते हैं ‘आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना’ (ECLGS) की। कोरोना महामारी के उस भयावह दौर में जब पूरी दुनिया की सप्लाई चेन टूट गई थी और छोटे धंधे बंद होने की कगार पर थे, तब इस योजना ने लाखों डूबते हुए MSMEs को बिना किसी अड़चन के नकदी (Liquidity) देकर संजीवनी बूटी की तरह काम किया। इसके कारण करोड़ों लोगों की नौकरियां जाने से बच गईं।
इसी तरह, छोटे व्यापारियों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत होती थी बैंकों को गारंटी (Collateral) देना। लोन चाहिए तो जमीन या मकान के कागज़ात दिखाओ इस शर्त के चलते कई होनहार युवाओं के विचार सिर्फ विचार बनकर रह जाते थे। सरकार के ‘क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट’ (CGTMSE) ने इस मुश्किल को आसान कर दिया। अब इस फंड की गारंटी पर बैंक बिना किसी जमानत के भी छोटे लोन दे देते हैं।
विपणन यानी बाजार तक पहुंच के मामले में ‘गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस’ (GeM Portal) ने एक बड़ा खेल बदल दिया है। पहले सरकारी विभागों में सप्लाई का ठेका सिर्फ बड़े-बड़े रसूखदार ठेकेदारों को ही मिलता था। लेकिन इस डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों के खेल को पूरी तरह खत्म कर दिया है। आज देश के किसी भी सुदूर हिस्से का छोटा बुनकर, बढ़ई या शिल्पकार सीधे भारत सरकार के मंत्रालयों और विभागों को अपना सामान बेच सकता है। इसने बाजार का पूरी तरह से लोकतंत्रीकरण कर दिया है।
इसके अलावा, विश्व बैंक की सहायता से चल रही ‘RAMP योजना’ (Raising and Accelerating MSME Performance) राज्यों के स्तर पर छोटे उद्योगों के ढांचे को मजबूत कर रही है। वहीं, ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) नीति ने तो कमाल ही कर दिया है। इस योजना ने भारत के हर जिले की एक खास पहचान और वहां के पारंपरिक शिल्प को वैश्विक ब्रांड में बदल दिया है। आज जब विदेशी मेहमान भारत आते हैं, तो उन्हें उपहार में यही स्थानीय उत्पाद दिए जाते हैं, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ की वैश्विक गवाही देते हैं।
समकालीन चुनौतियां: आज की जमीनी मुश्किलें
ऐसा नहीं है कि सब कुछ बिल्कुल हरा-भरा और आसान है। अगर हम व्यावहारिक धरातल पर देखें, तो आज भी हमारा MSME क्षेत्र कई ऐसी दिक्कतों और चक्रव्यूह से जूझ रहा है, जिनका समय रहते समाधान करना बेहद जरूरी है। जब तक हम इन कमजोरियों को नहीं समझेंगे, तब तक हम इसका पूरा फायदा नहीं उठा पाएंगे।
MSME के समक्ष चुनौतियां : वर्तमान समय में MSME क्षेत्र अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनमें समय पर बैंक ऋण न मिलना (क्रेडिट गैप), बड़े कॉरपोरेट्स द्वारा भुगतान में देरी, आधुनिक तकनीक एवं मशीनों के अभाव में तकनीकी पिछड़ापन तथा वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण कच्चे माल की बढ़ती कीमतें प्रमुख हैं।
पैसों की तंगी और क्रेडिट गैप: आज भी हमारे देश की औपचारिक बैंकिंग प्रणाली (बैंक और वित्तीय संस्थान) छोटे और सूक्ष्म उद्यमों को लोन देने में बहुत कतराती है। कागजी कार्रवाई की जटिलता, सिविल स्कोर की शर्तें और क्रेडिट रेटिंग न होने की वजह से ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के छोटे दुकानदार या उद्यमी मजबूरन गांव के साहूकारों और अनौपचारिक स्रोतों के चंगुल में फंस जाते हैं। वहां उन्हें इतना भारी ब्याज देना पड़ता है कि उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा उसी ब्याज को चुकाने में चला जाता है।
देरी से भुगतान का दंश: यह इस क्षेत्र की सबसे दुखती रग और एक तरह का कैंसर है। छोटे उद्यमी बड़े कॉरपोरेट घरानों या सरकारी विभागों को माल की सप्लाई तो कर देते हैं, लेकिन उनका भुगतान महीनों तक अटका रहता है। कानून के मुताबिक 45 दिनों के भीतर भुगतान हो जाना चाहिए, लेकिन जमीन पर ऐसा बहुत कम होता है। इन छोटे व्यापारियों के पास बहुत ज्यादा पूंजी नहीं होती कि वे महीनों बिना पैसों के काम चला सकें। रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए पैसे न होने के कारण कई अच्छी-भली फैक्ट्रियां समय से पहले ही दम तोड़ देती हैं। हालांकि सरकार ने इसके लिए ‘समाधान पोर्टल’ बनाया है, लेकिन इसका डर अभी बड़े खरीदारों के मन में पूरी तरह नहीं बैठा है।
तकनीकी आधुनिकीकरण का अभाव : आज दुनिया चौथी औद्योगिक क्रांति (Industry 4.0) के दौर में जी रही है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और ऑटोमेशन की बातें हो रही हैं। लेकिन हमारे देश के बहुसंख्यक MSME आज भी दशकों पुरानी मशीनों और पारंपरिक तौर-तरीकों पर काम कर रहे हैं। तकनीक पुरानी होने की वजह से सामान बनाने में समय ज्यादा लगता है, लागत (Cost) बढ़ जाती है और फिनिशिंग वैसी नहीं आ पाती जैसी विदेशी प्रोडक्ट्स (विशेषकर चीनी उत्पादों) की होती है। इस वजह से वे अंतरराष्ट्रीय बाजार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं।
कच्चे माल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव: वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनावों और युद्ध जैसी स्थितियों के कारण कच्चे माल जैसे स्टील, एल्यूमीनियम, प्लास्टिक और रसायनों की कीमतें अचानक बहुत बढ़ जाती हैं। बड़े उद्योगों के पास तो इतना पैसा और स्टॉक होता है कि वे इस झटके को बर्दाश्त कर लेते हैं, लेकिन छोटे उद्योगों के पास ऐसा कोई वित्तीय बफर नहीं होता। कच्चे माल की कीमत थोड़ी भी बढ़ी नहीं कि उनका पूरा बजट गड़बड़ा जाता है और वे घाटे में चले जाते हैं।
हरित, डिजिटल और वैश्विक विकास की ओर MSME
अगर हमें 21वीं सदी के इस दौर में भारतीय MSME को दुनिया का लीडर बनाना है, तो हमें एक त्रियामी मंत्र को अपनी रग-रग में बसाना होगा। यह मंत्र है: हरित (Green), डिजिटल (Digital) और वैश्विक (Global)। अब छोटे उद्योगों को अपनी पुरानी सोच से बाहर निकलकर इन तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। शून्य दोष, शून्य प्रभाव : आज पूरी दुनिया पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर बेहद संवेदनशील हो चुकी है। अब केवल सामान बनाना काफी नहीं है, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसे बनाने में पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा। हमारे उद्योगों को ‘शून्य दोष’ (ताकि उत्पाद की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की हो और वह कहीं रिजेक्ट न हो) और ‘शून्य प्रभाव’ (ताकि कारखाने से निकलने वाला प्रदूषण पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए) की संस्कृति को अपनाना होगा। जो उद्योग पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) होंगे, आने वाले समय में दुनिया उन्हीं के उत्पादों को हाथों-हाथ लेगी।
डिजिटल साक्षरता और ई-कॉमर्स का हाथ थामना
आज के जमाने में डिजिटलाइजेशन कोई शौक नहीं, बल्कि जिंदा रहने की पहली शर्त है। अगर आपका बिजनेस इंटरनेट पर नहीं है, तो मानकर चलिए कि आप रेस से बाहर हैं। हमारे छोटे उद्यमियों को स्मार्टफोन और इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए करना होगा। सरकार के ‘ओएनडीसी’ (ONDC – Open Network for Digital Commerce) जैसे ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म्स का फायदा उठाकर छोटे से छोटा दुकानदार भी बिना किसी बड़ी फीस के देश भर के ग्राहकों तक पहुंच सकता है। डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन बहीखाता और सोशल मीडिया के जरिए मार्केटिंग को अपनाकर ही ये उद्योग बड़े बन सकते हैं।
क्लस्टर आधारित विकास: एक साथ मिलकर आगे बढ़ना
कहते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, लेकिन जब बहुत सी कड़ियां आपस में जुड़ जाती हैं, तो एक मजबूत जंजीर बन जाती है। जब एक ही तरह का काम करने वाले कई छोटे उद्योग एक ‘क्लस्टर’ (समूह) में आकर काम करते हैं, तो उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। वे सब मिलकर एक साझी टेस्टिंग लैब बना सकते हैं, कच्चे माल का एक बड़ा बैंक स्थापित कर सकते हैं और प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक साझा प्लांट (CETP) लगा सकते हैं। इससे हर एक उद्यमी का व्यक्तिगत खर्च बहुत कम हो जाएगा और वे बड़े उद्योगों की तरह कम लागत पर बेहतरीन उत्पादन कर पाएंगे।
‘लोकल से ग्लोबल’ होते भारत का उज्ज्वल क्षितिज
अंततः, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम दिवस केवल भाषण देने या सरकारी आंकड़े गिनाने का औपचारिक आयोजन नहीं है। यह भारत के उस अटूट संकल्प को दोहराने का दिन है जिसके केंद्र में “श्रम एव जयते” और “आत्मनिर्भरता” का सच्चा भाव छिपा है। MSME क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का वह छुपा हुआ कल्पवृक्ष है, जिसे यदि सही नीतियों का साफ पानी, समय पर बैंक लोन की खाद और आधुनिक तकनीक की सही धूप मिल जाए, तो यह भारत को एक विकसित राष्ट्र (विकसित भारत @2047) बनाने के संकल्प को बहुत आसानी से हकीकत में बदल सकता है।
हमें यह बात गहराई से समझनी होगी कि भारत की असली आत्मा सिर्फ दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों के चमचमाते कॉरपोरेट टावरों या शीशे के दफ्तरों में नहीं बसती। भारत की असली आत्मा हमारे टियर-2, टियर-3 शहरों और गांवों की उन संकरी गलियों में धड़कती है, जहां कोई आम हिंदुस्तानी अपनी छोटी सी लेथ मशीन, अपने हैंडलूम या अपनी छोटी सी दुकान पर दिन-रात पसीना बहा रहा है। ये लोग सिर्फ सामान नहीं बनाते, ये हर रोज भारत का भाग्य बनाते हैं।
किसी कवि ने बहुत सुंदर लिखा है: “लघुता को न तुम हेय समझो, यह तो सृष्टि का सार है, सिंधु की हर एक बूंद में, छिपा अनंत संसार है।” इस MSME दिवस पर सबसे बड़ी जरूरत इसी बात की है कि हम इन छोटी इकाइयों को ‘छोटा’ समझकर उनके प्रति हीनभावना रखना छोड़ें और उनकी छिपी हुई विराट ताकत को पहचानें। जब हमारे देश के इस ‘लोकल’ हुनर को सही मायने में सरकार, समाज और बैंकों का पूरा सहयोग (वोकल) मिलेगा, तभी यह पूरी शान से ‘ग्लोबल’ बन पाएगा। जब देश के हर हाथ को काम मिलेगा और हर छोटे विचार को उद्योग बनने का मौका मिलेगा, तभी हमारी आर्थिक आजादी अक्षुण्ण रहेगी। यही इस दिवस की असली सार्थकता है और यही हमारे प्यारे भारत के आर्थिक भविष्य का सबसे सुंदर और सुनहरा रास्ता है।


