गैंडा अपनी विशाल काया और विशिष्ट पहचान के साथ पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कभी एशिया और अफ्रीका के कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले गैंडों की विभिन्न प्रजातियां आज प्राकृतिक आवास के सिकुड़ने, अवैध शिकार, मानवीय गतिविधियों और बदलती जलवायु जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। हर वर्ष 22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस महत्वपूर्ण वन्यजीव के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। प्रकृति का संतुलन किसी एक प्रजाति पर निर्भर नहीं होता, बल्कि जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, जलस्रोतों, मिट्टी, जलवायु और मनुष्य के बीच बने परस्पर संबंधों से निर्मित होता है। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण प्रजाति का संकट पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।विश्व में गैंडे की पांच जीवित प्रजातियां ब्लैक, व्हाइट, ग्रेटर वन-हॉर्न्ड, सुमात्राई और जावन राइनो पाई जाती हैं। वर्ष 2010 में शुरू हुआ विश्व गैंडा दिवस अभियान इन सभी प्रजातियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का वैश्विक प्रयास है। गैंडे का संरक्षण केवल एक वन्यजीव को बचाने तक सीमित नहीं है। इसके प्राकृतिक आवास, घासभूमि, आर्द्रभूमि और जल स्रोतों की सुरक्षा भी इससे जुड़ी है। इसलिए गैंडे की रक्षा वास्तव में जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण और मानव-प्रकृति के संतुलित संबंधों को सुरक्षित रखने का संकल्प है।
पांच प्रजातियां, अलग-अलग आवास और साझा संकट
दुनिया में गैंडे की पांच जीवित प्रजातियां हैं। अफ्रीका में मुख्य रूप से ब्लैक और व्हाइट राइनो पाए जाते हैं, जबकि एशिया में ग्रेटर वन-हॉर्न्ड, जावन और सुमात्राई राइनो पाए जाते हैं। इनकी शारीरिक बनावट, आवास और व्यवहार अलग-अलग हैं, लेकिन इनके सामने कई चुनौतियां समान हैं। आवास का सिकुड़ना, अवैध शिकार, वन्यजीव तस्करी, मानवीय गतिविधियों का बढ़ता दबाव और जलवायु परिवर्तन इनके अस्तित्व के लिए खतरा हैं। गैंडा संरक्षण में केवल आबादी बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। पर्याप्त प्राकृतिक आवास, भोजन और पानी, सुरक्षित प्रजनन क्षेत्र, आनुवंशिक विविधता और आबादियों के बीच पारिस्थितिक संपर्क भी जरूरी हैं। इसलिए आधुनिक संरक्षण का लक्ष्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि गैंडे के प्राकृतिक जीवन-चक्र और उसके आवास को सुरक्षित रखना है।
भारतीय गैंडा : संरक्षण की एक महत्वपूर्ण सफलता
भारत के लिए गैंडा संरक्षण विशेष महत्व रखता है। ग्रेटर वन-हॉर्न्ड राइनो, जिसे भारतीय एक सींग वाला गैंडा कहा जाता है, मुख्य रूप से भारत और नेपाल में पाया जाता है। कभी-कभार इसकी सीमा-पार आवाजाही भूटान तक भी देखी जाती है। 2022 के आकलन के अनुसार इस प्रजाति की वैश्विक आबादी 4,014 थी, जिसमें भारत में 3,262 और नेपाल में 752 गैंडे दर्ज किए गए। यह आंकड़ा संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाता है, लेकिन इसकी ‘Vulnerable’ स्थिति बताती है कि चुनौती अभी बनी हुई है। आवास प्रबंधन, अवैध शिकार पर नियंत्रण, कानूनी संरक्षण और भारत-नेपाल सहयोग ने इसकी आबादी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत में असम इसका प्रमुख संरक्षण केंद्र है। 2022 की गणना में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में 2,613 गैंडे दर्ज किए गए थे। इसके अलावा ओरांग, पोबितोरा और मानस भी महत्वपूर्ण संरक्षण क्षेत्र हैं। पश्चिम बंगाल के जलदापाड़ा और गोरूमारा तथा उत्तर प्रदेश के दुधवा में भी भारतीय एक सींग वाले गैंडे पाए जाते हैं। गैंडे की बढ़ती आबादी संरक्षण प्रयासों की उपलब्धि है, लेकिन इसके प्राकृतिक आवास और सुरक्षित भविष्य के लिए निरंतर संरक्षण जरूरी है।
काजीरंगा मॉडल और संरक्षण की सीख
काजीरंगा का उदाहरण यह दिखाता है कि वन्यजीव संरक्षण केवल किसी क्षेत्र को संरक्षित घोषित करने से संभव नहीं होता। इसके लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, वनकर्मियों की सक्रिय भूमिका, अवैध शिकार पर नियंत्रण, आवास प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी की आवश्यकता होती है। काजीरंगा में बाढ़ का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। ब्रह्मपुत्र और उससे जुड़े नदी तंत्र के कारण क्षेत्र में नियमित बाढ़ आती है। पहली नजर में बाढ़ वन्यजीवों के लिए संकट दिखाई दे सकती है, लेकिन प्राकृतिक बाढ़ इस पारिस्थितिकी तंत्र की प्रक्रिया का हिस्सा भी है। चुनौती यह है कि असामान्य बाढ़, आवास परिवर्तन और आसपास के मानवीय दबाव के बीच वन्यजीवों के लिए सुरक्षित रास्ते और पर्याप्त ऊंचे क्षेत्र उपलब्ध रहें। इसलिए संरक्षण का अर्थ प्रकृति की प्रत्येक प्राकृतिक प्रक्रिया को रोकना नहीं, बल्कि उसके साथ ऐसा प्रबंधन करना है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक गतिशीलता बनी रहे और वन्यजीवों के लिए जोखिम कम हो।
गैंडा और घासभूमि का पारिस्थितिकी तंत्र
गैंडा एक बड़ा शाकाहारी जीव है और घासभूमि, दलदली क्षेत्रों तथा नदी-बाढ़ मैदानों से उसका गहरा संबंध है। ऐसे बड़े शाकाहारी जीव वनस्पति संरचना को प्रभावित करते हैं और उनके आवागमन से पारिस्थितिकी तंत्र में अनेक छोटे-बड़े परिवर्तन होते हैं। इसलिए गैंडे का संरक्षण केवल एक विशाल स्तनपायी की रक्षा नहीं, बल्कि उसके पूरे आवास की रक्षा है। यह दृष्टिकोण आधुनिक जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि केवल गैंडे की संख्या बढ़ाई जाए लेकिन उसके लिए पर्याप्त घासभूमि, जलस्रोत और सुरक्षित गलियारे उपलब्ध न हों तो दीर्घकाल में संरक्षण की सफलता कमजोर पड़ सकती है। इसीलिए संरक्षण योजनाओं में प्रजाति और आवास को अलग-अलग देखने के बजाय एक इकाई के रूप में देखना आवश्यक है।
जैव विविधता : प्रकृति की जीवन-व्यवस्था
जैव विविधता का अर्थ केवल अलग-अलग पशु-पक्षियों की संख्या नहीं है। इसमें आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता शामिल है। एक स्वस्थ जंगल में बड़े स्तनधारियों से लेकर सूक्ष्म जीवों तक अनेक जीव एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। मधुमक्खियां और अन्य परागणकर्ता खाद्य उत्पादन में योगदान करते हैं। पक्षी और स्तनधारी बीजों के प्रसार में भूमिका निभाते हैं। शिकारी प्रजातियां शिकार की आबादी को नियंत्रित करती हैं। आर्द्रभूमियां जल को संचित करने, प्रदूषकों को रोकने और अनेक जलीय एवं प्रवासी प्रजातियों को आश्रय देने में मदद करती हैं। जंगल मिट्टी, जल और स्थानीय जलवायु को प्रभावित करते हैं। इसलिए जैव विविधता का क्षरण केवल वन्यजीवों का नुकसान नहीं है। इसका प्रभाव कृषि, जल सुरक्षा, खाद्य व्यवस्था, आजीविका और मानव स्वास्थ्य तक पहुंच सकता है।
भारत : जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण देश
भारत की भौगोलिक विविधता उसे जैव विविधता की दृष्टि से विशेष बनाती है। हिमालय, पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत, सुंदरबन, थार, मध्य भारतीय वन, तटीय क्षेत्र, द्वीप और नदी तंत्र अलग-अलग प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र उपलब्ध कराते हैं। बाघ, हाथी, गैंडा, एशियाई शेर, हिम तेंदुआ, लाल पांडा, गंगा डॉल्फिन, मगरमच्छ, विभिन्न प्राइमेट, पक्षी और असंख्य वनस्पति प्रजातियां इस प्राकृतिक विविधता का हिस्सा हैं। इन प्रजातियों की आवश्यकताएं अलग हैं, इसलिए संरक्षण नीति भी एक जैसी नहीं हो सकती। भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 एक प्रमुख कानूनी आधार है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार देश में संरक्षित क्षेत्रों का व्यापक नेटवर्क है और संरक्षण प्रयास संरक्षित क्षेत्रों के बाहर मौजूद महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन तक भी विस्तारित हैं।
संरक्षित क्षेत्र जरूरी, लेकिन पर्याप्त नहीं
राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य वन्यजीव संरक्षण की आधारभूत संस्थाएं हैं, लेकिन अनेक प्रजातियों का जीवन केवल इन सीमाओं के भीतर नहीं चलता। वन्यजीव भोजन, पानी और प्रजनन के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में जाते हैं। इसीलिए वन्यजीव गलियारों और संरक्षित क्षेत्रों के बीच संपर्क का महत्व बढ़ जाता है। भारत सरकार भी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्रों और गलियारों के संरक्षण की आवश्यकता को मान्यता देती है। मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने, गलियारों की सुरक्षा और रैखिक बुनियादी ढांचे के प्रभाव को घटाने के लिए विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं। सड़क, रेल लाइन, बिजली की लाइन और अन्य बुनियादी ढांचा विकास आवश्यक है, लेकिन उसके निर्माण की योजना बनाते समय वन्यजीवों की आवाजाही और पारिस्थितिक संपर्क को ध्यान में रखना भी जरूरी है। अंडरपास, ओवरपास, सुरक्षित क्रॉसिंग और वैज्ञानिक लैंडस्केप प्लानिंग जैसे उपाय इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष : संरक्षण की सबसे कठिन परीक्षा
जब जंगल और वन्यजीवों के आवास के आसपास मानव बस्तियां और कृषि क्षेत्र बढ़ते हैं तो संघर्ष की संभावना भी बढ़ती है। हाथियों द्वारा फसल नुकसान, तेंदुओं की आबादी वाले क्षेत्रों में मानव बस्तियों तक पहुंच, बाघों से जुड़े जोखिम या अन्य वन्यजीवों के कारण संपत्ति और आजीविका पर प्रभाव स्थानीय लोगों के लिए वास्तविक चिंता हैं। इसलिए संरक्षण नीति में वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ प्रभावित समुदायों की सुरक्षा को समान महत्व देना आवश्यक है। भारत सरकार की रणनीतियों में संघर्ष वाले क्षेत्रों की पहचान, त्वरित प्रतिक्रिया दल, मुआवजा व्यवस्था और विभागों के बीच समन्वय जैसे उपाय शामिल हैं। यहां संरक्षण की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी होना चाहिए कि स्थानीय समुदाय वन्यजीवों को अपने लिए खतरे के बजाय साझा प्राकृतिक विरासत के रूप में कितना स्वीकार करते हैं। इसके लिए संरक्षण से मिलने वाले आर्थिक और सामाजिक लाभ स्थानीय स्तर तक पहुंचाना आवश्यक है।
अवैध वन्यजीव व्यापार : जैव विविधता के लिए संगठित खतरा
वन्यजीव संरक्षण के सामने सबसे गंभीर वैश्विक चुनौतियों में अवैध शिकार और वन्यजीवों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार शामिल है। गैंडे के मामले में उसके सींग की मांग ने इस संकट को लंबे समय तक बढ़ाया है। विश्व गैंडा दिवस के प्रमुख उद्देश्यों में गैंडे के सींग से जुड़े मिथकों को दूर करना और उसकी मांग कम करना भी शामिल है। गैंडे का सींग केराटिन से बना होता है, वही प्रोटीन जो मानव बाल और नाखूनों में पाया जाता है। इसके कथित औषधीय या चमत्कारी गुणों के बारे में वैज्ञानिक आधारहीन धारणाओं ने अवैध मांग को बढ़ाया है। इसलिए कानून लागू करने के साथ-साथ मांग कम करने के लिए वैज्ञानिक जन जागरूकता भी जरूरी है। भारत में वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो खुफिया जानकारी के संग्रहण, प्रवर्तन एजेंसियों के समन्वय, वन्यजीव अपराध डेटाबेस और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे कार्यों में भूमिका निभाता है।
जलवायु परिवर्तन : संरक्षण की बदलती चुनौती
वन्यजीव संरक्षण को जलवायु परिवर्तन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। तापमान में बदलाव, वर्षा के स्वरूप में परिवर्तन, सूखा, बाढ़, जंगल की आग और जल स्रोतों में बदलाव वन्यजीवों के आवास को प्रभावित कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि जिन परिस्थितियों में किसी प्रजाति ने हजारों वर्षों में अपने जीवन-चक्र को अनुकूलित किया है, वे तेजी से बदल सकती हैं। इससे भोजन की उपलब्धता, प्रजनन, प्रवास और रोगों का स्वरूप प्रभावित हो सकता है। इसलिए भविष्य का संरक्षण केवल वर्तमान आवास बचाने तक सीमित नहीं रह सकता। ऐसे पारिस्थितिक गलियारों और परिदृश्यों को सुरक्षित करना होगा जिनसे प्रजातियां बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्थानांतरित हो सकें। कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क ने भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने और जैव विविधता की लचीलापन क्षमता बढ़ाने को अपने 2030 लक्ष्यों में शामिल किया है।
आर्द्रभूमि और नदियां : जैव विविधता की जीवन रेखा
भारत की जैव विविधता में नदियों और आर्द्रभूमियों का विशेष महत्व है। ये क्षेत्र मछलियों, जलीय स्तनधारियों, सरीसृपों और प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास हैं। गंगा डॉल्फिन जैसे जीवों का संरक्षण यह बताता है कि नदी संरक्षण केवल जल की गुणवत्ता का विषय नहीं है। नदी का प्राकृतिक प्रवाह, तटीय क्षेत्र, सहायक नदियां, मछलियों की उपलब्धता और मानव गतिविधियों का स्तर सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसी तरह आर्द्रभूमियों को केवल खाली या दलदली जमीन मानना गंभीर भूल होगी। वे बाढ़ नियंत्रण, जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए विकास योजना में इन पारिस्थितिक तंत्रों का आर्थिक और पर्यावरणीय मूल्य भी शामिल किया जाना चाहिए।
वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदाय
किसी भी संरक्षण नीति की स्थायी सफलता स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना कठिन है। जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोग वन्यजीवों के सबसे निकट होते हैं। उन्हें संरक्षण का साझेदार बनाया जाए तो निगरानी, जागरूकता और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। साथ ही, संरक्षण के कारण यदि स्थानीय लोगों की आजीविका पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है तो उसका समाधान भी जरूरी है। सामुदायिक भागीदारी, वैकल्पिक रोजगार, इको-टूरिज्म से आय, स्थानीय उत्पादों को बाजार और उचित मुआवजा व्यवस्था इस संतुलन को मजबूत कर सकते हैं। जैव विविधता के वैश्विक ढांचे में भी स्थानीय और आदिवासी समुदायों के अधिकारों तथा उनकी भागीदारी को महत्व दिया गया है। कुनमिंग-मॉन्ट्रियल फ्रेमवर्क के लक्ष्य संरक्षित क्षेत्रों और अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों में स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान करने पर जोर देते हैं।
तकनीक और विज्ञान की बढ़ती भूमिका
वन्यजीव संरक्षण अब केवल जंगल की गश्त तक सीमित नहीं है। कैमरा ट्रैप, ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी, GPS आधारित निगरानी, GIS मैपिंग, DNA फोरेंसिक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकें संरक्षण की क्षमता बढ़ा रही हैं। इन तकनीकों से वन्यजीवों की संख्या और आवाजाही का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है। कैमरा ट्रैप से दुर्लभ प्रजातियों की पहचान संभव होती है। सेटेलाइट से आवास में बदलाव का अध्ययन किया जा सकता है। DNA आधारित जांच वन्यजीव अपराध की जांच में मदद कर सकती है। लेकिन तकनीक स्वयं समाधान नहीं है। सही आंकड़े तभी उपयोगी हैं जब उनका विश्लेषण वैज्ञानिक तरीके से हो और उसके आधार पर संरक्षण प्रबंधन में बदलाव किया जाए। इसलिए भविष्य का वन्यजीव संरक्षण डेटा, विज्ञान और स्थानीय अनुभव के समन्वय पर आधारित होना चाहिए।
क्या केवल वन्यजीवों की संख्या बढ़ना पर्याप्त है?
यह प्रश्न आधुनिक संरक्षण विमर्श के केंद्र में होना चाहिए। किसी प्रजाति की आबादी बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उसका पूरा पारिस्थितिक भविष्य सुरक्षित हो गया है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में गैंडों की संख्या बढ़ रही है लेकिन उनके लिए पर्याप्त घासभूमि नहीं है, जल स्रोत सीमित हैं या उनके आवास आपस में जुड़े नहीं हैं तो भविष्य में नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसी तरह किसी प्रजाति की छोटी-छोटी अलग आबादियों में आनुवंशिक विविधता और उनके बीच संपर्क भी महत्वपूर्ण है। कुनमिंग-मॉन्ट्रियल फ्रेमवर्क इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाता है। इसमें केवल प्रजातियों के विलुप्त होने के जोखिम को कम करने की बात नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता, संपर्क और लचीलेपन तथा आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने पर भी जोर है।
वैश्विक जैव विविधता संरक्षण की नई दिशा
दिसंबर 2022 में अपनाए गए कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क में 2050 के लिए चार दीर्घकालिक लक्ष्य और 2030 के लिए 23 कार्रवाई-उन्मुख लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण लक्ष्य 2030 तक दुनिया के कम से कम 30 प्रतिशत स्थलीय, अंतर्देशीय जल, तटीय और समुद्री क्षेत्रों के प्रभावी संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित है। दूसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र के कम से कम 30 प्रतिशत हिस्से को 2030 तक प्रभावी पुनर्स्थापन के दायरे में लाना है। इन लक्ष्यों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि जैव विविधता का संकट किसी एक देश की सीमा में सीमित नहीं है। प्रवासी पक्षी, समुद्री जीव, सीमा-पार वन्यजीव गलियारे और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव व्यापार कई देशों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं। इसलिए वन्यजीव संरक्षण में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वैज्ञानिक जानकारी का आदान-प्रदान, संयुक्त निगरानी और वन्यजीव अपराध के विरुद्ध समन्वित कार्रवाई आवश्यक है।
संरक्षण और विकास के बीच संतुलन
आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। सड़क, रेल, ऊर्जा, आवास और उद्योग की जरूरतें वास्तविक हैं, लेकिन उनका नियोजन ऐसे तरीके से किया जा सकता है जिससे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर अनावश्यक दबाव कम हो। भारत में पर्यावरणीय स्वीकृति, संरक्षित क्षेत्रों, इको-सेंसिटिव जोन और वन्यजीव प्रबंधन से संबंधित व्यवस्थाएं इसी व्यापक संतुलन का हिस्सा हैं। इको-सेंसिटिव जोन का उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के आसपास एक संक्रमण क्षेत्र के रूप में काम करना और विकास गतिविधियों को पर्यावरणीय संवेदनशीलता के अनुरूप विनियमित करना है। वास्तविक चुनौती यह है कि विकास परियोजनाओं के मूल्यांकन में केवल आर्थिक लागत और लाभ नहीं, बल्कि जंगल, नदी, आर्द्रभूमि, वन्यजीव गलियारे और स्थानीय समुदाय पर दीर्घकालिक प्रभाव भी शामिल किए जाएं।
आगे की राह : संरक्षण को व्यापक बनाना होगा
विश्व गैंडा दिवस का संदेश आज पहले से अधिक व्यापक हो गया है। गैंडे को बचाने के लिए उसके सींग की मांग कम करनी होगी, अवैध शिकार रोकना होगा, लेकिन साथ ही उसके आवास को सुरक्षित और विस्तारित करना होगा। जहां संभव हो वहां अलग-अलग आबादियों को सुरक्षित गलियारों से जोड़ना होगा। इसी तरह अन्य वन्यजीवों के संरक्षण में भी केवल संकटग्रस्त प्रजाति पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। जंगल, घासभूमि, आर्द्रभूमि, नदियां, समुद्री क्षेत्र और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसलिए संरक्षण नीति को पूरे परिदृश्य पर आधारित होना चाहिए। स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाना, वैज्ञानिक संस्थानों और वन विभागों के बीच सहयोग बढ़ाना, तकनीक का जिम्मेदार इस्तेमाल, वन्यजीव अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई और जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर आवास प्रबंधन भविष्य की प्रमुख प्राथमिकताएं होनी चाहिए।
गैंडे का संरक्षण, प्रकृति और मानव के साझा भविष्य की सुरक्षा
विश्व गैंडा दिवस हमें ऐसे जीव की याद दिलाता है, जो पृथ्वी पर मानव से बहुत पहले अस्तित्व में आया और आज मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न अनेक संकटों का सामना कर रहा है। हालांकि, इस दिवस का संदेश केवल गैंडे के संरक्षण तक सीमित नहीं है। यह हमें उस जटिल पारिस्थितिकी तंत्र को समझने का अवसर देता है, जिसमें हर प्रजाति की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। किसी एक कड़ी के कमजोर होने का असर पूरे प्राकृतिक संतुलन पर पड़ सकता है। भारतीय एक सींग वाले गैंडे की संरक्षण यात्रा उम्मीद जगाती है। पिछले दशकों में इसकी आबादी में हुई वृद्धि बताती है कि वैज्ञानिक प्रबंधन, कानूनी संरक्षण, अवैध शिकार पर नियंत्रण, आवास संरक्षण और भारत-नेपाल सहयोग से सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। 2022 के आकलन में इसकी वैश्विक आबादी 4,014 तक पहुंचना इन प्रयासों की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हालांकि, इसकी ‘Vulnerable’ स्थिति बताती है कि संरक्षण की चुनौती अभी बनी हुई है। आज वन्यजीव संरक्षण को केवल राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों तक सीमित रखने के बजाय जैव विविधता को कृषि, जल प्रबंधन, बुनियादी ढांचे, जलवायु नीति और स्थानीय आजीविका से जोड़ना जरूरी है। वन्यजीव गलियारों और आसपास के प्राकृतिक परिदृश्यों को भी संरक्षण रणनीति में शामिल करना होगा। गैंडे, बाघ, हाथी या डॉल्फिन का संरक्षण दरअसल उस प्राकृतिक व्यवस्था को बचाना है, जिसमें मनुष्य भी शामिल है। स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल, उपजाऊ मिट्टी, स्वस्थ जंगल और संतुलित जलवायु मानव जीवन के लिए भी अनिवार्य हैं। इसलिए जैव विविधता का संरक्षण प्रकृति पर उपकार नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य में निवेश है। वन्यजीवों का भविष्य और मनुष्य का भविष्य अलग-अलग नहीं हैं।


