प्रतिक्रिया | Wednesday, April 24, 2024

10/08/23 | 2:58 pm

विश्व जैव ईंधन दिवस: जानिए जलवायु परिवर्तन में सुधार को लेकर अपने लक्ष्यों संग कहां तक पहुंचा भारत

जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है। आज यह वैश्विक चिंता का विषय हैं। कोई भी देश इसके दुष्प्रभावों से अछूता नहीं है, जलवायु परिवर्तन का असर हम सभी को झेलना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन की वजह से प्राकृतिक संकट आते हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से ही हमारा पारिस्थितिक तंत्र भी बिगड़ गया है। इंसान जिस तरह से जैव ईंधन का लगातार बड़े स्तर पर दोहन (इस्तेमाल) कर रहा है, उसका पर्यावरण पर खतरनाक असर देखने को मिल रहा है, इसीलिए, समय के साथ अपरंपरागत जीवाश्म ईंधन को इस्तेमाल करने की जरूरत समझी गई और लोगों को इस बारे में लगातार जागरूक भी किया जा रहा है।  

आज मनाया जा रहा विश्व जैव ईंधन दिवस 

विश्व जैव ईंधन दिवस को हर साल 10 अगस्त के दिन अपरंपरागत जीवाश्म ईंधन के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में काम कर सकता है।विश्व जैव ईंधन दिवस 2015 से पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा मनाया जा रहा है। यह दिन सर रुडोल्फ डीजल के शोध प्रयोगों का भी सम्मान करता है जिन्होंने 8 अगस्त वर्ष 1893 में मूंगफली के तेल से एक इंजन चलाया था। उनके शोध प्रयोग ने भविष्यवाणी की थी कि अगली शताब्दी में वनस्पति तेल विभिन्न यांत्रिक इंजनों को ईंधन देने के लिए जीवाश्म ईंधन की जगह लेने जा रहा है। 

बायोफ्यूल (जैव ईंधन) पर राष्ट्रीय नीति – 2018

भारत में जैव ईंधन रणनीतिक महत्व का है क्योंकि यह मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, कौशल विकास जैसी सरकार की चल रही पहलों को बढ़ावा देता है और किसानों की आय को दोगुना करने, आयात में कमी, रोजगार के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ एकीकृत होने का शानदार अवसर प्रदान करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति-2018 को मंजूरी दे दी है। 

इस नीति का क्या है उद्देश्य ? 

इस नीति का उद्देश्य वर्ष 2030 तक 20% इथेनॉल-सम्मिश्रण और 5% बायोडीजल-सम्मिश्रण तक पहुंचना है। इसके लिए सरकार ने आयात निर्भरता अर्थात जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी करने के लक्ष्य के साथ देश की ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने पर जोर दिया है। पर्यावरण प्रदूषण के मुद्दों और ईंधन की आवश्यकता के लिए आयात पर निर्भरता के बारे में बढ़ती चिंता के कारण वैकल्पिक ईंधन की आवश्यकता है जिनके पर्यावरण संबंधी बेहतर लाभ हैं और जीवाश्म ईंधन की तुलना में आर्थिक दृष्टि से प्रतिस्पर्धी हैं। इसमें ऊर्जा की भारतीय बास्‍केट में जैव ईंधन के लिए एक कार्यनीतिक भूमिका की परिकल्पना की गई है। इन संसाधनों में कृषि और वन अवशेष, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू), गोबर आदि शामिल हैं जिन्हें जैव ईंधन के उत्पादन हेतु इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार कच्चे तेल के आयात पर हमारी निर्भरता को कम करने, विदेशी मुद्रा की बचत करने के उद्देश्य से इनका उपयोग करने, किसानों को उनकी आय दोगुनी करने के लिए बेहतर पारिश्रमिक प्रदान करने, जीवाश्म ईंधन के उपयोग के कारण बढ़ते पर्यावरण के मुद्दों का समाधान करने/बायोमास/अपशिष्ट को जलाने, स्वच्छ भारत अभियान के अनुरूप अपशिष्ट प्रबंधन/कृषि-अवशेष प्रबंधन की चुनौतियों का समाधान करने और “मेक इन इंडिया” अभियान को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है ।

बायोफ्यूल को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा की गई पहल

भारत ने 2001 में पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण पायलट आधार पर शुरू किया था, जिसे देश की जीवाश्म ईंधन निर्भरता को कम करने और अपने विशाल कच्चे तेल आयात बिल को कम करने के लिए डिजाइन किया गया था और आज यह  2023 में अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने के करीब है। भारत सरकार ने जैव ईंधन के मिश्रण को बढ़ाने के लिए कई पहल की हैं। प्रमुख हस्तक्षेपों में इथेनॉल के लिए प्रशासनिक मूल्य तंत्र, ओएमसी की खरीद प्रक्रियाओं को सरल बनाना, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के प्रावधानों में संशोधन करना और इथेनॉल खरीद के लिए लिग्नोसेल्यूलोसिक मार्ग को सक्षम करना शामिल है।

कुछ अन्य पहलें

भारत ने जैव-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए एक रोडमैप के साथ ही एक ऐसी रणनीति विकसित की है जो वर्ष 2025 तक 150 अरब (बिलियन) अमेरिकी डॉलर की ओर बढ़ रही है। इससे कम कार्बन वाले जैव-आधारित उत्पादों के जैव-विनिर्माण के लिए बुनियादी ढांचे की सुविधा मिलेगी।

भारत, “मिशन इनोवेशन” के माध्यम से, प्रेरक नवाचार लक्ष्यों को उत्प्रेरित करने के लिए सहयोगात्मक प्रयासों में सक्रिय रूप से लगा हुआ है। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया, ग्रीन इंडिया और स्मार्ट सिटीज जैसी राष्ट्रीय मिशन पहलों ने पूरे देश में स्वच्छ ऊर्जा नवाचार के केंद्रों को प्रोत्साहित किया है। भारत जलवायु कार्रवाई की दिशा में अपने लक्ष्यों जैसे- 2030 तक 500 गीगावॉट की गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता तक पहुंचना; 2030 तक 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकताओं को नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से पूरा करने ; 2030 तक कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2)  उत्सर्जन में 1 अरब (बिलियन टन की कमी) लाने; 2030 तक कार्बन की तीव्रता को 45 प्रतिशत से कम करने और 2070 तक शुद्ध -शून्य उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करने के मार्ग को प्रशस्त करने इत्यादि को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है ।

जैव ईंधन से क्या लाभ हुआ 

जैव ईंधन से आयात निर्भरता में कमी, स्वच्छ पर्यावरण, किसानों को अतिरिक्त आय और रोजगार सृजन जैसे लाभ मिलते हैं। पिछले सात वर्षों में, इथेनॉल की आपूर्ति 2013-14 के 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 2020-21 में 322 करोड़ लीटर (अनुबंधित) हो गई है। इसी तरह, इथेनॉल सम्मिश्रण प्रतिशत भी 2013-14 के अल्प 1.53% से बढ़कर 2020-21 में 8.50% हो जाने की उम्मीद है। मांग में वृद्धि के कारण, इथेनॉल आसवन क्षमता भी 215 करोड़ लीटर से दोगुना होकर 427 करोड़ लीटर सालाना हो गई है; जबकि डिस्टिलरीज की संख्या 5 साल में 40% बढ़कर 2019-20 में 231 हो गई है, जो 2014-15 में 157 थी।

वैश्विक ऊर्जा खपत में भारत की हिस्सेदारी 2050 तक दोगुनी होने की संभावना है। भारत सरकार ने मूल रूप से निर्धारित वर्ष 2025 के बजाय इसे अग्रानीत करते हुए इथेनॉल के साथ इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को 20% तक बेचने का लक्ष्य वर्ष 2023 कर दिया है। 20% सम्मिश्रण स्तर पर, इथेनॉल की मांग 2025 तक बढ़कर 1,016 करोड़ लीटर हो जाने की उम्मीद है। इसलिए इथेनॉल उद्योग का मूल्य 500% से अधिक बढ़कर लगभग ₹ 9,000 करोड़ से बढ़कर ₹ 50,000 करोड़ से अधिक हो जाएगा।

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आखरी अपडेट: 23rd Apr 2024