रांची में 335वीं ऐतिहासिक जगन्नाथ रथ यात्रा, लाखों श्रद्धालुओं ने खींचा महाप्रभु का रथ

झारखंड की राजधानी रांची में गुरुवार को भगवान जगन्नाथ की 335वीं ऐतिहासिक रथ यात्रा श्रद्धा, परंपरा और सामाजिक सौहार्द के वातावरण में निकाली गई। ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर से शुरू हुई इस भव्य यात्रा में लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

‘जय जगन्नाथ’ के जयघोष, शंखनाद और भजनों के बीच भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को सुसज्जित रथ पर विराजमान कर मौसीबाड़ी के लिए रवाना किया गया। पारंपरिक पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठानों के बाद रथ यात्रा का शुभारंभ हुआ।

रथ यात्रा शुरू होते ही श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर पहुंच गया। हजारों भक्तों ने रस्सियों से रथ खींचकर लगभग आधा किलोमीटर की दूरी तय कर भगवान को मौसीबाड़ी पहुंचाया। भगवान जगन्नाथ नौ दिनों तक वहीं विराजमान रहेंगे और श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे। इसके बाद पारंपरिक घुरती रथ यात्रा के साथ उनकी मंदिर वापसी होगी।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी रथ यात्रा में शामिल हुए। उन्होंने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा से प्रदेशवासियों के सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की। उन्होंने कहा कि रथ यात्रा सेवा, सामाजिक सद्भाव, आस्था और मानवता का संदेश देती है।

रांची की रथ यात्रा देश की सबसे प्राचीन रथ यात्राओं में से एक मानी जाती है। इसकी शुरुआत वर्ष 1691 में नागवंशी शासक अनिनाथ शाहदेव ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर से प्रेरित होकर जगन्नाथपुर मंदिर के निर्माण के साथ की थी। तभी से यह परंपरा तीन शताब्दियों से अधिक समय से निरंतर चली आ रही है और आज झारखंड की सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापत्य शैली और धार्मिक परंपराएं पुरी के जगन्नाथ मंदिर से काफी मिलती-जुलती हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ प्रतिमाओं की पारंपरिक विधि से पूजा की जाती है। श्रद्धालु रथ खींचने को अत्यंत पुण्यदायी मानते हैं।

रांची रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता सामाजिक समरसता का संदेश है। वर्षों से विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग इस आयोजन में पारंपरिक जिम्मेदारियां निभाते आ रहे हैं। यही कारण है कि यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक बन गया है।

रथ यात्रा के साथ लगने वाला नौ दिवसीय मेला भी झारखंड और आसपास के राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है।

(इनपुट-आईएएनएस)