गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास बसे आदिवासी परिवारों के लिए 665 बायोगैस संयंत्र स्थापित किए गए

गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास के गांवों में रहने वाले लगभग 1,000 आदिवासी परिवारों को सरकार की एक पहल के तहत बायोगैस संयंत्रों से लैस किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य घरेलू ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना और एलपीजी सिलेंडर व लकड़ी पर निर्भरता को कम करना है। परियोजना के अंतिम चरण में पहुंचने के साथ ही 665 इकाइयां पहले ही स्थापित की जा चुकी हैं।

1,000 आदिवासी परिवारों में बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जाएंगे

इस योजना की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल एकता नगर में आयोजित राष्ट्रीय एकता दिवस परेड के दौरान की थी, जब उन्होंने कहा था कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास के क्षेत्रों में 1,000 आदिवासी परिवारों में बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। यह परियोजना नर्मदा जिले के गरुड़ेश्वर तालुका के 38 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आने वाले 89 गांवों में कार्यान्वित की जा रही है और इसकी निगरानी जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (डीआरडीए) द्वारा की जा रही है।

यह पहल घरेलू स्तर पर ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप

अधिकारियों ने कहा कि यह पहल घरेलू स्तर पर ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है, जिसके तहत जैविक कचरे का उपयोग खाना पकाने के ईंधन और कृषि इनपुट के रूप में किया जा सकेगा। स्थापना की पूरी लागत सरकार द्वारा वहन की जा रही है, जबकि लाभार्थियों को संयंत्र स्थापित करने के लिए आवश्यक गड्ढे खोदने के लिए श्रमदान करना होगा। खबरों के मुताबिक, इन संयंत्रों के निर्माण से क्षेत्र में खाना पकाने की प्रथाओं और घरेलू ईंधन के उपयोग में बदलाव आ रहे हैं।

LPG सिलेंडरों की चिंता नहीं

आपको बता दें, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित वाघपुरा गांव की निवासी रवीना ताडवी ने कहा कि इस प्रणाली ने एलपीजी आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितता को दूर कर दिया है और स्वच्छ ईंधन का एक निरंतर स्रोत प्रदान किया है। गांववालों ने कहा, “अब हमें एलपीजी सिलेंडरों की चिंता नहीं करनी पड़ती। बायोगैस संयंत्र प्रतिदिन स्वच्छ ईंधन प्रदान करता है और इससे निकलने वाला बायोगैस संयंत्र का अपशिष्ट कृषि में रासायनिक उर्वरकों का एक उत्कृष्ट विकल्प बन गया है। जैविक उर्वरक के कारण फसल उत्पादन में भी वृद्धि हुई है।”

बायोगैस के इस्तेमाल से वे धुएं से मुक्ति मिली

एक अन्य स्थानीय निवासी चंदू ताडवी ने कहा कि इस पहल से उन महिलाओं पर दैनिक बोझ कम हो गया है जो पहले जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने और पारंपरिक खाना पकाने के तरीकों पर निर्भर थीं। उन्होंने कहा, “पहले खेतों में काम करने के बाद उन्हें जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। पारंपरिक चूल्हों पर खाना पकाने से धुआं निकलता था और उनकी आंखों को भी नुकसान पहुंचता था, लेकिन अब बायोगैस के इस्तेमाल से वे धुएं से मुक्त हो गए हैं और खाना पकाने के लिए गैस के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं।”

665 से अधिक संयंत्र पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं

अधिकारियों के अनुसार, बायोगैस इकाइयां एक स्लरी भी उत्पन्न करती हैं जिसका उपयोग जैविक खाद के रूप में किया जा रहा है, जिससे कृषि में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो रही है। वहीं, 665 से अधिक संयंत्र पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं, शेष इकाइयों को चिन्हित गांवों में चल रहे विस्तार के हिस्से के रूप में पूरा किए जाने की उम्मीद है। (इनपुट-आईएएनएस)