अमेरिका और यूरोप इस समय वर्ष की सबसे भीषण हीटवेव में से एक का सामना कर रहे हैं। रिकॉर्ड तोड़ तापमान, कई लोगों की मौत, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव, जंगलों में आग, परिवहन व्यवस्था में बाधा और बिजली उत्पादन पर असर ने इसे वैश्विक जलवायु संकट का गंभीर संकेत बना दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम संबंधी घटनाएं पहले की तुलना में अधिक हो गई हैं। ये घटनाएं अब पहले की तुलना में अधिक समय तक और अधिक तीव्रता के साथ सामने आ रही हैं।
अमेरिका में स्वतंत्रता दिवस (4 जुलाई) समारोह के दौरान भीषण गर्मी ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। न्यू जर्सी में ही हीटवेव से जुड़ी कई घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें अधिकांश ऐसे लोग थे जिनके घरों में एयर कंडीशनिंग की सुविधा नहीं थी। मृतकों में बुजुर्गों के साथ युवा भी शामिल हैं। 20 से अधिक राज्यों में तापमान 37.8 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया और 30 जून से 5 जुलाई के बीच कई स्थानों पर दैनिक तापमान के रिकॉर्ड टूट गए।
अमेरिकी राजधानी वॉशिंगटन डी.सी. में 4 जुलाई को अब तक का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया, जहां तापमान 39.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। भीषण गर्मी के कारण ग्रेट अमेरिकन स्टेट फेयर को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा, जबकि शिकागो, मिसिसिपी और न्यूयॉर्क सहित कई शहरों में हीट स्ट्रोक के मामलों में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई और अस्पतालों की आपातकालीन सेवाओं पर भारी दबाव देखा गया।
उधर, यूरोप भी अभूतपूर्व हीटवेव से जूझ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 21 जून के बाद से पूरे महाद्वीप में 1,300 से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। इनमें अकेले फ्रांस में लगभग 1,000 लोगों की मौत हुई है, जिनमें अधिकांश 65 वर्ष से अधिक आयु के थे। पेरिस के अस्पतालों में आपातकालीन कॉल में लगभग 80 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
यूरोप के कई देशों में तापमान ने नए रिकॉर्ड बने हैं। जर्मनी में तापमान 41.7 डिग्री सेल्सियस, हंगरी में 42 डिग्री सेल्सियस और स्लोवाकिया में 41.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो इन देशों के इतिहास का सर्वाधिक तापमान है। पुर्तगाल के कई क्षेत्रों में 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुंचने की आशंका के बीच रेड अलर्ट जारी किया गया है। वहीं, इंग्लैंड में वर्ष 1884 के बाद सबसे गर्म जून दर्ज किया गया और जून 2026 देश के इतिहास का सबसे गर्म जून बन गया।
ऑस्ट्रिया में जून महीने की सबसे लंबी हीटवेव दर्ज की गई, जबकि डेनमार्क, क्रोएशिया, पोलैंड, चेक गणराज्य और स्विट्जरलैंड में भी रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया। भीषण गर्मी का असर परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र पर भी साफ दिखाई दिया। जर्मनी में सड़कों की सतह उखड़ने लगी, कई देशों में रेल सेवाएं प्रभावित हुईं और स्विट्जरलैंड के बेज़नाउ परमाणु ऊर्जा संयंत्र को नदी के बढ़ते तापमान के कारण अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। हंगरी में भी डेन्यूब नदी का तापमान बढ़ने से पक्स परमाणु ऊर्जा संयंत्र में बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ।
स्थिति से निपटने के लिए इटली के 18 प्रमुख शहरों में रेड अलर्ट जारी किया गया है। बर्लिन में पुलिस ने सार्वजनिक स्थानों पर लोगों को राहत देने के लिए पानी की बौछारें कीं, कई क्षेत्रों में स्कूल बंद किए गए और एयर कंडीशनर व कूलिंग उपकरणों की मांग में भारी वृद्धि देखी गई। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस भीषण गर्मी का प्रमुख कारण ‘ओमेगा ब्लॉक’ नामक मौसम प्रणाली है, जिसमें उच्च दबाव का क्षेत्र लंबे समय तक एक ही स्थान पर बना रहता है और ठंडी हवाओं को प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने से रोक देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन ऐसी चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों को बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गर्मी अब केवल मौसमी चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। ऐसे में सरकारों को प्रभावी हीट एक्शन प्लान, समय रहते चेतावनी प्रणाली, हरित शहरी विकास, जल एवं बिजली अवसंरचना को मजबूत करने तथा संवेदनशील वर्गों के लिए कूलिंग सेंटर जैसी सुविधाओं का विस्तार करना होगा। साथ ही, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी और जलवायु अनुकूल विकास को बढ़ावा देकर ही भविष्य में ऐसे संकटों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।


