हर समाज और राष्ट्र के जीवन में कुछ ऐसे निर्णायक पल आते हैं, जहां उसे अपने पुरुषार्थ की परीक्षा देनी होती है, अपनी अहमियत सिद्ध करनी पड़ती है और दुनिया को बताना पड़ता है कि दृढ़ संकल्प और कठिन श्रम के दम पर अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए वह कर्तव्य पथ पर अडिग है। कर्तव्य की ये राह तलवार की धार पर चलने जैसी होती है, जहां हर कदम पर खतरा होता है। लेकिन जब कोई राष्ट्र कूटनीति की रपटीली राहों पर स्वाभिमान के साथ सीना तानकर जीने का प्रण ले लेता है, फिर उसे राह के हर कांटे को भी अंगीकार करना पड़ता है।
भूराजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में भारत इन दिनों ऐसे ही एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर टैरिफ 25% से बढ़ाकर 50% कर दिया है, जिससे भारतीय निर्यातकों को बड़ा झटका लगा है। इससे कपड़ा, फर्नीचर और आर्ट-क्राफ्ट सेक्टर प्रभावित हुए हैं। इसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत से व्यापार घाटे की भरपाई और रूसी तेल की खरीद जैसी दलीलें दे रहे हैं। लेकिन ये तो हाथी के दिखावे के दांत हैं।
ट्रंप की नाराजगी की असली वजह उन्हें नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई रुकवाने का श्रेय नहीं दिया जाना है, जिससे अमन के इस स्वघोषित मसीहा की शांति का नोबेल पुरस्कार पाने की महत्वाकांक्षा को जोरदार झटका लगा है। जाहिर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति धीरे से लगे इस जोर के झटके को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।
बात सही भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति सिर्फ अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं होता, वह दुनिया का दादा होता है। जिससे रहम की भीख सारी दुनिया मांगती है। अमेरिका ने टैरिफ लगाने की घुड़की दी नहीं कि दुनिया भर के देश, चाहे वे सहयोगी हों या विरोधी, सभी नत मस्तक हो गए। अपवाद स्वरूप सिर्फ चीन बचा, जो दुनिया के खलीफा के सामने तनकर खड़ा हो गया। नतीजतन खलीफा औकात में आ गया।
इस पृष्ठभूमि में जबकि पूरा यूरोप अमेरिका की जी हुजूरी कर रहा हो, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे सहयोगी अमेरिकी कृपा प्राप्त करने के लिए जी तोड़ मशक्कत कर रहे हों और मध्य पूर्व के अधिकतर देश ट्रंप के अहंकार को सहला रहे हों, उस समय भारत जैसा विकासशील देश अमेरिका से आंख मिलाकर समान शर्तों पर व्यापार की बात करे तो ट्रंप प्रशासन को कैसे नागवार नहीं गुजरेगा ? उसने सर्वाधिक टैरिफ थोपकर यह बताने की कोशिश की है कि भारत औकात में रहे।
जहां तक भारत की बात है तो वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और साथ ही स्टार्टअप एवं डिजिटल इनोवेशन के लिए ग्लोबल हब के रूप में विकसित हो रहा है। इतना ही नहीं, अर्थशास्त्र के पंडित उम्मीद जगा रहे हैं कि 2030 तक भारत जर्मनी को पछाड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
एक ऐसे समय जबकि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की रफ्तार मंद पड़ी हुई है, भारत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है और यह पूरी दुनिया के लिए उम्मीद की किरण बना हुआ है।
अब तो अमेरिकी प्रबुद्ध वर्ग को भी इस बात का इल्म होने लगा है कि भारत के साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्यवहार अनुचित है और अमेरिका को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की पूर्व राजदूत और रिपब्लिकन सहयोगी निक्की हेली और अमेरिका के अर्थशास्त्री प्रोफेसर जेफ्री सैक्स ने आशंका जताई है कि ट्रंप अगर इसी तरह का बर्ताव करते रहे तो भारत का साथ छूट जाएगा। जो अमेरिका के दीर्घकालिक हित के खिलाफ होगा।
अमेरिका की जीडीपी करीब 30 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर है जबकि भारत की जीडीपी करीब चार लाख करोड़ डॉलर है। ऐसे में अमेरिका से सौहार्दपूर्ण संबंध भारत के हित में है। अमेरिका के लोगों की खरीदने की क्षमता हर अर्थव्यवस्था को उनकी ओर आकर्षित करती है। लेकिन जब ट्रंप प्रशासन भारत के साथ सौतेला व्यवहार करने पर अमादा है, फिर तो ये वक्त की जरूरत हो जाती है कि भारत अपनी रीढ़ दिखाए, अपने लिए नए बाजार ढूंढे, आत्मनिर्भरता को जीवन का आधार बनाए और स्वदेशी के संकल्प को मन प्राण से निभाए। संस्कृत की सूक्ति है—
तावत् भयात् भेत्तव्यम यावत भयम् अनागतम ।
आगते तु भयम् वीक्ष्य नर: कुर्यात यथोचितम।।
अर्थात भय से तब तक ही डरना चाहिए जब तक वह दूर हो, जब वह सामने आ जाए फिर उसका उचित निराकरण करना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विषम परिस्थिति में देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा है कि भारत में ऐसा सामर्थ्य है जिससे यह राष्ट्र समय के रुख को मोड़ सकता है। अब जरूरत इस बात की है कि हम वक्त की नजाकत को समझें और अपने आचरण से सिद्ध करें कि हम उस भारतीय मिट्टी के बने हैं, जो हर अग्नि परीक्षा के बाद कुंदन की तरह निखर उठती है।
-(डॉ. राघव कुमार झा, डी डी इंडिया में वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


