Print

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात वित्त वर्ष 2024-25 के लिए 49.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा: केंद्र

भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ने पिछले 11 वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है, जो इसके मज़बूत कृषि आधार, बढ़ती मांग और सहायक सरकारी नीतियों के कारण संभव हुई है। देश इस क्षेत्र में निरंतर वृद्धि के साथ वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनने के लिए तैयार है। कृषि खाद्य प्रसंस्करण की रीढ़ बनी हुई है, और यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद, रोज़गार और निर्यात में अपनी बढ़ती हिस्सेदारी के माध्यम से अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण बन गया है।

भारत खाद्य प्रसंस्करण में एक उभरते वैश्विक नेता के रूप में

जुलाई 2025 तक, वित्त वर्ष 2024-25 के लिए, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात लगभग 49.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात का लगभग 20.4% हिस्सा था, जिसने भारत को खाद्य प्रसंस्करण में एक उभरते वैश्विक नेता के रूप में स्थापित किया। पंजीकृत खाद्य व्यवसाय संचालकों की संख्या 25 लाख से बढ़कर 64 लाख हो गई है, जो बढ़ती औपचारिकता को दर्शाता है। 24 मेगा फूड पार्क, 22 कृषि-प्रसंस्करण क्लस्टर स्थापित करने और 289 कोल्ड चेन परियोजनाओं तथा 305 प्रसंस्करण और संरक्षण इकाइयों को पूरा करने के साथ बुनियादी ढांचा भी मजबूत हुआ है, जिससे महत्वपूर्ण अतिरिक्त क्षमता का निर्माण हुआ है। इसके अलावा, ऑपरेशन ग्रीन्स के तहत 10 परियोजनाओं ने मूल्यवर्धन को बढ़ाया है, जबकि 225 अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं ने 20 पेटेंट और 52 व्यावसायीकृत प्रौद्योगिकियां प्रदान की हैं।

पीएमएफएमई 29 जून 2020 को शुरू की गई

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) 29 जून 2020 को शुरू की गई। यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जो देश भर में सूक्ष्म खाद्य इकाइयों के विकास और औपचारिकीकरण पर केंद्रित है। यह योजना आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा है और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में वोकल फॉर लोकल दृष्टिकोण का समर्थन करती है। यह उद्यमियों को नई इकाइयां स्थापित करने या मौजूदा इकाइयों के उन्नयन के लिए वित्तीय, तकनीकी और व्यावसायिक सहायता प्रदान करती है। यह योजना 10,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ 2020-21 से 2025-26 तक चलेगी। इसका लक्ष्य सूक्ष्म उद्यमों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना, उन्हें संगठित क्षेत्र में लाना और विकास के नए अवसर प्रदान करना है।

इस योजना के अंतर्गत व्यय को केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच 60:40 के अनुपात में, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के साथ 90:10 के अनुपात में, विधायिका वाले केन्द्र शासित प्रदेशों के साथ 60:40 के अनुपात में तथा अन्य केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए केन्द्र द्वारा 100% साझा किया जाएगा।

योजना का उद्देश्य

इस योजना का उद्देश्य ऋण-आधारित सब्सिडी के माध्यम से 2 लाख सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को प्रत्यक्ष सहायता प्रदान करना है। इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में तीव्र विकास को गति देने के लिए साझा बुनियादी ढांचा तैयार करना और संस्थागत समर्थन को मज़बूत करना भी है।

योजना के प्रमुख घटक

इस कार्यक्रम में क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले 4 व्यापक घटक हैं-

  • व्यक्तियों और सूक्ष्म उद्यमों के समूहों को सहायता
  • व्यक्तिगत इकाइयों के लिए समर्थन
  •  परियोजना लागत का 35% ऋण-लिंक्ड पूंजीगत सब्सिडी
  • प्रति इकाई अधिकतम सीमा ₹10 लाख
  • न्यूनतम 10 प्रतिशत लाभार्थी का योगदान, बैंक ऋण के माध्यम से शेष राशि

किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और उत्पादक सहकारी समितियों के लिए समर्थन

• ऋण लिंकेज के साथ 35% अनुदान सहायता

• प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण का प्रदान

• योजना मानदंडों के तहत निर्धारित अधिकतम वित्तपोषण

स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के लिए समर्थन

प्रारंभिक पूंजी सहायता

• कार्यशील पूंजी और छोटे औज़ारों के लिए प्रत्येक स्वयं सहायता समूह सदस्य को ₹40,000

• ओडीओपी (एक ज़िला एक दृष्टिकोण) उत्पादों पर काम करने वाले स्वयं सहायता समूहों को प्राथमिकता

• संघ स्तर पर प्रारंभिक पूंजी दी जाती है और सदस्यों को पुनर्भुगतान योग्य ऋण के रूप में वितरित की जाती है

ब्रांडिंग और विपणन सहायता

विपणन और ब्रांडिंग सहायता एफपीओ, स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों या सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के एसपीवी (विशेष प्रयोजन वाहन) समूहों को प्रदान की जाती है। यह सहायता ओडीओपी (एक जिला एक दृष्टिकोण) का अनुसरण करती है और राज्य या क्षेत्रीय स्तर पर प्रचारित उत्पादों तक सीमित है।

सहायता के लिए पात्र वस्तुएं

• योजना के अंतर्गत विपणन प्रशिक्षण पूर्णतः वित्तपोषित है

• समान ब्रांड, पैकेजिंग और मानकीकरण का विकास

• राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय खुदरा श्रृंखलाओं और राज्य संस्थानों के साथ गठजोड़ को प्रोत्साहित किया जाता है

• उत्पादों को निर्धारित मानकों के अनुरूप सुनिश्चित करने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण उपाय

विस्तृत परियोजना रिपोर्ट

प्रस्तावों के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) आवश्यक है। इसमें उत्पाद प्रोफ़ाइल, रणनीति, गुणवत्ता नियंत्रण, उत्पादों का एकत्रीकरण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग, मूल्य निर्धारण, प्रचार, भंडारण और विपणन चैनल जैसे परियोजना विवरण शामिल होने चाहिए। बिक्री वृद्धि की योजनाओं का भी उल्लेख होना चाहिए। मार्केटिंग और ब्रांडिंग से संबंधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए राज्य नोडल एजेंसी (एसएनए) से ₹5 लाख तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध है।

डीपीआर में कच्चे माल की खरीद से लेकर मार्केटिंग तक की गतिविधियों को दर्शाने वाला एक फ्लो चार्ट भी होना चाहिए। इसमें गुणवत्ता नियंत्रण बिंदुओं पर प्रकाश डाला जाना चाहिए और प्रचार कार्य, उत्पादकों की भागीदारी का विस्तार और कारोबार वृद्धि को शामिल करते हुए एक पंचवर्षीय योजना प्रस्तुत की जानी चाहिए।

इस योजना के एक भाग के रूप में, मंत्रालय ब्रांडिंग और मार्केटिंग डीपीआर तैयार करने के लिए दिशानिर्देश (मॉडल डीपीआर) प्रदान करता है। इससे उद्यमियों, एफपीओ, एसएचजी, सहकारी समितियों या एसपीवी को ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता के लिए आवेदन करने हेतु आवश्यक टेम्पलेट्स, तकनीकी संदर्भ शर्तों और प्रारूपों सहित सुसंरचित प्रस्ताव तैयार करने में मदद मिलती है।

सामान्य अवसंरचना समर्थन

इस योजना के अंतर्गत निम्नलिखित सामान्य बुनियादी ढांचे को वित्त पोषित किया जा रहा है-

• कृषि उपज की जांच, छंटाई, ग्रेडिंग, भंडारण और शीत भंडारण की सुविधाएं खेत द्वार पर उपलब्ध होंगी

• ओडीओपी उत्पादों के लिए साझा प्रसंस्करण इकाइयां

• एक या एक से अधिक उत्पाद श्रृंखलाओं वाले इनक्यूबेशन केंद्र, जो छोटी इकाइयों के लिए किराए पर उपलब्ध होंगे। इनक्यूबेशन केंद्रों का उपयोग आंशिक रूप से प्रशिक्षण के लिए भी किया जा सकता है। सभी इनक्यूबेशन केंद्र व्यावसायिक आधार पर संचालित किए जाएंगे।

क्षमता निर्माण एवं अनुसंधान

क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण प्रौद्योगिकी के उन्नयन और सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को औपचारिक प्रणाली में लाने का एक आवश्यक हिस्सा है। राष्ट्रीय स्तर पर, राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान (एन.आई.एफ.टी.ई.एम.) और भारतीय खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.एफ.पी.टी.) इन गतिविधियों के लिए प्रदान की गई वित्तीय सहायता के साथ क्षमता निर्माण और अनुसंधान का नेतृत्व करते हैं। राज्य स्तरीय तकनीकी संस्थानों के सहयोग से वे चयनित उद्यमों और समूहों को प्रशिक्षण और अनुसंधान सहायता प्रदान करते हैं। आई.सी.ए.आर., सी.एस.आई.आर. के तहत विशेषज्ञता प्राप्त संस्थान और रक्षा खाद्य अनुसंधान प्रयोगशाला (डी.एफ.आर.एल.) तथा केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (सी.एफ.टी.आर.आई.) जैसे प्रमुख संस्थान भी देश भर में उत्पाद-विशिष्ट प्रशिक्षण और अनुसंधान प्रदान करने में भागीदार हैं।

गौरतलब हो, जून 2025 तक, पीएमएफएमई योजना के तहत देश भर में 1,16,666 लाभार्थियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।

ओडीओपी पर केंद्रित ध्यान

यह योजना खरीद, सेवाओं और विपणन को बढ़ाने के लिए एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) दृष्टिकोण का पालन करती है। राज्य फलों, सब्जियों, मसालों, मत्स्य पालन और शहद और हल्दी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों जैसे जल्दी खराब होने वाले उत्पादों की पहचान करते हैं। समर्थन प्रसंस्करण, भंडारण, ब्रांडिंग और अपव्यय को कम करने पर केंद्रित है। ओडीओपी इकाइयों के लिए पूंजी निवेश को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि नए उद्यम केवल ओडीओपी उत्पादों के लिए पात्र होते हैं। यह दृष्टिकोण कृषि निर्यात नीति और कृषि मंत्रालय के तहत समूह-आधारित पहलों का पूरक है, जिससे मजबूत मूल्य श्रृंखला और सामान्य सुविधाएं सुनिश्चित होती हैं।

पीएमएफएमई योजना स्थानीय उत्पादों की क्षमता को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम

दरअसल, पीएमएफएमई योजना सूक्ष्म खाद्य उद्यमों को मजबूत करने और स्थानीय उत्पादों की क्षमता को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अपने ओडीओपी फोकस, सामान्य बुनियादी ढांचे, कौशल प्रशिक्षण और ऋण तक पहुंच के माध्यम से, यह छोटे उद्यमियों को बढ़ने और प्रतिस्पर्धा करने के लिए उपकरण प्रदान करता है। अपव्यय को कम करके, मूल्यवर्धन में सुधार करके और ब्रांडिंग को बढ़ावा देकर, यह योजना न केवल किसानों और उत्पादकों की आय को बढ़ाती है, बल्कि रोजगार भी पैदा करती है और ग्रामीण विकास का समर्थन करती है।