प्रतिक्रिया | Thursday, April 03, 2025

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एशिया का सबसे बड़ा काष्टशिल्प महल – पद्मनाभपुरम पैलेस

त्रावणकोर राजवंश के वैभव और कला के प्रतीक इस महल का इतिहास जितना अद्भुत है इसका भूगोल उतना ही अनोखा है। प्रशासनिक रूप से इस महल की देखरेख का जिम्मा केरल सरकार के पास है जबकि यह स्थित तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के थुकलाई ग्राम, कल्कुलम तालुका में है। कन्याकुमारी राष्ट्रीय राजमार्ग से थुकलाई ग्राम लगभग डेढ़ किलोमीटर पूर्व में पड़ता है ।

यह कन्याकुमारी से 39 किमी,नागरकोइल से लगभग 20 किमी और केरल के तिरुवनंतपुरम से 52 किमी दूरी पर स्थित है। इस पैलेस को बनाने के लिए त्रावणकोर राजाओं ने एक ऐसे स्थान का चुनाव किया जो सुरक्षित हो। इसलिए पश्चिमी घाट के अंतिम छोर पर पड़ने वाली वेली पहाड़ियों की तलहटी को महल बनाने के लिए चुना गया। इस महल की सुरक्षा के लिए वेली पहाड़ियाँ स्थित हैं।

आज एक शांत ग्राम नज़र आने वाला पद्मनाभपुरम 16वीं शताब्दी में त्रावणकोर की राजधानी बना और इसका वैभव 18वीं शताब्दी तक कायम रहा। लेकिन वर्ष 1795 में त्रावणकोर की राजधानी यहाँ से तिरुवनंतपुरम स्थानांतरित की गई और इस स्थान ने अपनी चमक खोना शुरू किया। सफलता के सूरज जैसा दमकने के साथ इस नगर ने अमावास की काली रातों सा भयावह दौर भी देखा। एक दौर था जब इस महल में त्रावणकोर का पूरा खज़ाना और दस हज़ार सैनिक रहा करते थे, एक दौर ऐसा भी आया जब यहाँ सन्नाटे छा गए और भूतों की कहानियाँ यहाँ की फिजाओं में तैरने लगीं। भला हो त्रावणकोर के अंतिम महाराजा श्री चिथिरा तिरुनल बाला राम वर्मा, राजमाता सेतु पार्वती बाई  का, जिनके निर्देश परदीवान सर सीपी रामास्वामी अय्यर ने वर्ष 1934 में प्राचीन परिसर को त्रावणकोर सरकार के कला सलाहकार जेएच कजिन्स और पुरातत्व विभाग के प्रमुख आर. वासुदेव पोडुवल की सहायता से पुनर्जीवन प्रदान किया। वर्ष 1935 में राजघरानों के पूर्ण समर्थन से प्राचीन महल को एक संग्रहालय परिसर में बदल दिया गया।

पहले कन्याकुमारी केरल का हिस्सा था लेकिन जब भारत के राज्यों को भाषाई आधार पर पुनर्गठित किया गया, तो कन्याकुमारी तमिलनाडु के हिस्से में चला गया लेकिन महल पर केरल सरकार का ही नियंत्रण रहा जोकि आज भी जारी है।

इस महल का निर्माण 1601 ई० के आसपास इरावी वर्मा कुलशेखर पेरुमल ने करवाया था। लेकिन आज महल जिस स्वरुप में है इसका श्रेय त्रावणकोर राजवंश के प्रतापी राजा मार्तंड वर्मा को जाता है। उन्होंने वर्ष 1750 में महल का पुनर्निर्माण करवाया। मार्तंड वर्मा भगवान विष्णु के परम उपासक थे। भगवान पद्भ्नाभ विष्णु के रूप माने जाते हैं। वह त्रावणकोर राजपरिवार के कुलदेवता भी हैं। राजा मार्तंड वर्मा ने अपना राजपाट अपने इष्ट को समर्पित किया और उनके सेवक के रूप में राजकाज संभाला। इसलिए इस स्थान का नाम पद्मनाभपुरम या भगवान पद्मनाभ का शहर पड़ा।

पद्मनाभपुरम कहने को तो एक पैलेस है लेकिन जब आप इसमें प्रवेश करते हैं तो यह छोटे बड़े 14 अलग-अलग महलों का एक विशाल परिसर है, जोकि किसी रहस्यमयी उपन्यास के पन्नों-सा एक के बाद एक रहस्य जैसा खुलता जाता है। यह केरल के दक्षिणी क्षेत्र के पारंपरिक स्थापत्य कला का अद्वितीय नमूना है।


इस पैलेस का पश्चिम की ओर बड़ा-सा द्वार है जो की लकड़ी से बना हुआ है जिसको मुख्य वथिल कहते हैं। इस द्वार से जब हम प्रवेश करते हैं तो हम पैलेस के कोर्टयार्ड में प्रवेश करते हैं, जो कि बड़े-बड़े पेड़ों से आच्छादित है। प्रवेश द्वार के सामने आंगन के पार मुख्य पैलेस का प्रवेश द्वार है जिसे पूमुखमालिका कहते हैं, इसके  दाएं और संग्रहालय है और बाई और टिकट काउंटर है। नक्काशीदार पत्थर के खंभों से घिरे विस्तृत प्रवेश द्वार की एक देउडी भी है इसे पडिप्पुरा कहा जाता है जिसपर लकड़ी की नक्काशी दार झरोखा बना हुआ है । इसे नटमालिका कहते है जो महल परिसर के विभिन्न खंडों को जोड़ती है। भले ही ये छोटी है लेकिन इसकी बाहें पूरे महल में फैली हुई हैं ।

सामने ही पूमुखमालिका है। यह पारंपरिक केरल वास्तुकला में एक विशिष्ट संरचना मानी जाती है ।

पूमुखमालिका महल परिसर की बाकी इमारतों से जुड़ी एक ऐसी संरचना है। जिसका उपयोग राजपरिवार द्वारा महत्वपूर्ण लोगों एवं अतिथियों के स्वागत के लिए किया जाता था। अतः इसके निर्माण में अलंकरण का विशेष मेहत्व देखने को मिलता है।

इसकी छत पर जटिल नक्काशीदार लकड़ी का काम किया गया है जिसमे 99 डिजाईन के पद्म फूल अंकित किये गए हैं जोकि एक दुसरे से बिलकुल भिन्न हैं। इस छत का भार उठाने वाले खम्भे भी अद्भुत हैं, इस छत के बिलकुल बीच में एक अश्वसवार रूपी दीपक लटका हुआ है जिसे कुथिरा विलक्कु कहा जाता है। यहाँ की बारीक़ कारीगरी हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देती है। लाल रक्त सी चमकती लकड़ी अनोखी है। इसकी आभा अभी तक वैसी ही है। मानो अभी बनी है। इस महल को देख कर लगता है जैसे हर कारीगर ने अपनी कला का सर्वश्रेष्ट प्रदर्शन किया है। खम्बे, तोरण, पैनल छत, दीवारें फर्श कोई भी अंग कला से चूका नहीं है। यहाँ के अलंकरण में शिल्पियों ने कमल के पुष्पों का बहुत सुन्दर उपयोग किया है।

मणि मेदा या महल घड़ी

पूमुखमालिका के बाएँ ओर एक घड़ी टॉवर स्थित है। कहते हैं इस घड़ी का निर्माण यहाँ के एक स्थानीय लुहार ने किया था जोकि घड़ी निर्माण की कला में दक्षता हांसिल करने स्पेन भेजा गया था। इस घड़ी को बारिश से बचाने हेतु घड़ी के चारों ओर एक झरोखा बनाया गया है। कहते हैं इस घड़ी के घंटे की आवाज़ तीन मील तक सुनाई पड़ती थी। यह घड़ी तीन सौ वर्ष बीत जाने के बाद आज भी सही समय बताती है।

थाई कोट्टारम

इस महल में बनी सभी संरचनाओं में एक संरचना विलक्षणता पूर्ण है। इसे महल का हृदय स्थल भी कहा जाता है। पद्मनाभपुरम पैलेस के भीतर सबसे पुरानी संरचना, थाई कोट्टारम मानी जाती है जिसका निर्माण 


16वीं शताब्दी में हुआ।  

यह मुख्य इमारत थी जिसे समय समय पर अनेक राजाओं ने विस्तार दिया और सहायक संरचनाओं का निर्माण करवाया। इसका आन्तरिक भाग एक खुला प्रांगण है जिसके चारों ओर कमरे फैले हुए हैं। इसे नालुकेट्टू कहा जाता है ।यह केरल वास्तुकला की एक विशिष्ट विशेषता है।

इस महल की एक बड़ी अनोखी बात है। इन सभी संरचनाओं को प्रथम तल पर पतले संकरे गलियारों द्वारा जोड़ा गया है। ताकि आपातस्थिति में ये मार्ग भागने के काम आ सकें।

प्लामुट्टू कोट्टारम

वेपिनमुट्टू कोट्टारम और थाई कोट्टारम के बीच एक और दो मंजिला आवासीय संरचना मौजूद है जिसे प्लामुट्टू कोट्टारम कहा जाता है

वलिया ओट्टुपुरा और होमप्पुरा

महल में भोजन के निर्माण और अतिथियों को खिलने के लिए दो तल में फैले बड़े हाल हैं जिन्हें वलिया ओट्टुपुरा कहा जाता है। इन हाल में लगभग 2000 लोग बैठ कर भोजन कर सकते हैं। वहीँ विशेष अवसरों पर भगवान को चढ़ाए जाने वाले महा प्रसाद को बनाने के लिए एक बड़ा कक्ष है जिसे होमपुरा कहा जाता है एक ओर इसके बड़ा तालाब है। 


पहले इस पैलेस का नाम कलकुलम पैलेस था। पैलेस में कई बहुत अनोखी संरचनाओं हैं जिसमें मंत्रशाला राजा का परिषद कक्षा थईकोत्तम यानी के मां का महल नाटक शाला एक चार मंजिला हवेली महल इंदिरा विलास हम मेहमान और विदेशी व्यक्तियों की अगवानी के लिए बना था। 


इस महल को बनाने में आधारभूत संरचना ग्रेनाईट पत्थर की है लेकिन बाकी सारी संरचना लकड़ी की नक्काशी से बनी हुई है कह सकते हैं कि भारत में लकड़ी का सबसे बड़ा महल है यह जो मुख्य रूप से लकड़ी और ग्रेनाइट से बनाएं कलाकारों ने इस महल की हर वस्तु में कल का प्रदर्शन बहुत ही बारीकी से किया है।

 त्रावणकोरकी राजसी वैभव के प्रतीक लकड़ी के खंभे, जालीदार लकड़ी की खिड़कियां हवादार कमरे, जटिल नकाशेदार लकड़ी के गालियारे,  दीवारों के पैनल, चमचमाती हुए फर्श खड़ी सीढ़ियां और वित्तीय चित्र इस महल को अनोखा बनाते हैं। इस महल में बहुत सारी ऐसी वस्तुएं हैं जो की त्रावणकोर के राजा को उपहार में दी गई थी। जिसमें सबसे बड़ा आकर्षण है 64 प्रकार की औषधि लकड़ी से बना हुआ एक ख़ास पलंग है जो कि डच लोगों ने राजा को उपहार में दिया था। इसके अलावा बेल्जियम के दर्पण इस महल की शोभा बढ़ाते हैं। यहां पर एक विशेष प्रकार की कुर्सी है जो कि चीनी व्यापारियों ने राजा को उपहार में दी थी। इस महल में के बीचों बीच भित्ती चित्रों वाला शिवालय महल है जो कि महल परिसर में सबसे ऊंची संरचना माना जाता है। इस महल को उप्पिरिक्का मालिका कहा जाता है जिसको जिसका अर्थ बहुमत जिला है इमारत होता है। इसको पेरूमल कोटाराम नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह भगवान का महल कहा जाता है। इसका निर्माण 1744 में करवाया गया था इसमें चार तल है जिसके भूतल का उपयोग शाही खजाने के रूप में किया जाता है। पहली मंजिल पर कमरे में प्रवेश करने से पहले पैर धोने के लिए अलग से स्थान बना हुआ है। इसी महल के भीतर औषधि लकड़ी से बना हुआ पलंग रखा हुआ है। 

दूसरी मंजिल पर धार्मिक उपवास के दौरान महाराज द्वारा आराम किए जाने के लिए कक्ष बने हुए हैं, इसकी तीसरी मंजिल पर भित्ति चित्र शिवालय है। यह एक आयताकार बड़ा कमरा है जिसकी चारों दीवारों बहुत सुंदर भित्तीय चित्रों से सजी हुई है। इस कमरे के साथ कुछ कहानी जुड़ी हुई है, जैसे यहां पर बनी लकड़ी की खाट पर माना जाता है कि भगवान विष्णु हर दिन आराम करने के लिए आते हैं। यहां पर राजसी तलवार भी रखी हुई है। कहते हैं इस कक्षा का उपयोग महाराज द्वारा विशेष रूप से ध्यान करने के लिए किया जाता था। इसके ऊपर की मंजिल पर बहुत सुंदर भित्ती चित्र देखने को मिलते हैं, जिनकी प्रेरणा  पौराणिक कथाओं से ली गई हैं। चित्रों के केंद्र में भगवान अनंत पद्मनाभम विद्यमान है। 

यह महल यहाँ की सुन्दर भित्ति चित्रकारी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्द है। यहाँ के कुछ महत्वपूर्ण भित्ति चित्र में अन्नपूर्णा, गजलक्ष्मी, वेणुगोपाल और गोपिका, वल्ली और देवयानी के साथ सुब्रमण्यम, सुदर्शनचक्रमूर्ति, श्री राम पट्टाभिषेकम अर्धनारीश्वर, महाविष्णु और लक्ष्मी, कोदंडा राम, महाविष्णु, श्रीदेवी, भूमि देवी और गरुड़, भद्रकाली, परिवार के साथ शिव, वेंकटचलपति, शिव लिंगम, योगनरसिम्हा, सात मरुथा (पवन), शिव और पार्वती, देसावतार (महाविष्णु के दस अवतार), एकादश रुद्र और द्वादश आदित्य (रुद्र के रूप में शिव और सूर्य के 12 रूपों में से एक), प्रदोष मूर्ति (16 हाथों वाले शिव), गणेश पूजा, पार्थसारथी, हरि-हर, महिषासुर मर्दिनी, दक्षिणामूर्ति, स्वर्ण कमल पर महाविष्णु, घोड़े पर सस्था, कृष्ण का रत्नाभिषेक, शिव और पार्वती का विवाह, लक्ष्मी नारायण, कालभैरव मूर्ति, शामिल है। यहाँ की सबसे सुन्दर चित्रकारी श्रीपद्मनाभ स्वामी की अनंत सयानम है जिसमे श्रीपद्मनाभ स्वामी ब्रह्मा, महालक्ष्मी, भूमि देवी और अन्य दिव्य देवताओं के साथ अनंत पर लेटे हुए हैं। वर्तमान में इसभाग की भित्ति चित्रकारी की प्रतिकृति के रूप में संग्रहालय में देखने के लिए उपलब्ध है 

आयुधपुरा

इस महल की सबसे सरल संरचना आयुधपुरा है क्यूंकि इसका उपयोग शास्त्रों के सग्रहण हेतु किया जाता था। इस शस्त्रागार में सजावटी जड़ाई से सजी हुई बढ़िया ब्लेड वाली सोने की मूठ वाली तलवार, पिस्तौल, बंदूकें और भाले जैसे हथियार रखे जाते थे।


अम्बरी मुखप्पु

महल की दक्षिणी दिवार पर बना एक सुन्दर झरोखा जिसका उपयोग राजा विशेष अवसरों पर जनता को दर्शन देने या बड़े अनुष्ठानों के समय जुलुस को देखने के लिए किया करते थे। इस झरोखे को लकड़े की नक्कार्शी द्वारा विशाल व्याली (पौराणिक जानवर) आकृतियों से सजाया गया है। 

इंदिरा विलासोम

इस संरचना के बराबर में एक और बड़ी संरचना है जिसे इंदिरा विलासोम कहा जाता है। मेहमानों और विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की मेजबानी के लिए बनाया गया एक गेस्ट हाउस है। जिसका स्थापत्य पश्चिमी स्थापत्य से प्रभावित है। इस महल में पश्चिमी स्टाइल के शौचालय भी बने हैं। इस महल को ऊँचे-ऊँचे खम्बों से दूर से ही पहचाना जा सकता है।

 

नवरात्रि मंडपम

इस महल के मुख्य आकर्षणों में नवरात्रि का पर्व विशेष महत्त्व रखता था।यह पर्व बड़े स्तर पर मनाया जाता था। जिस दिन बड़े समारोह एवं नृत्य का आयोजन होता था। इन आयोजनों हेतु महल में द्रविड़ स्थापत्य पर आधारित नवरात्रि मंडपम का निर्माण किया गया। 

विजयनगर शैली में अलंकृत नक्काशीदार मोनोलिथ स्तंभों, पुष्प और नृत्य मुद्राओं से अलंकृत देवियों के मोहक रूपों से इस मंडप को सजाया गया है। इस मंडप में एक ओर राजपरिवार की महिलाओं के बैठने के लिए लकड़ी की जालीदार नक्काशी का एक चेंबर भी स्थित है।

केरल वास्तुकला का एक आदर्श उदाहरण पद्मनाभपुरम पैलेस यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची में सूचीबद्ध ऐसे ही नहीं है। यह अपनी अनोखी काष्टशिल्प के लिए पूरे विश्व में अलग स्थान रखता है। इस स्मारक का रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जाता है। यह पहला ऐसा स्मारक है जिसकी हर संरचना का ब्यौरा देने के लिए वहां पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का एक कर्मचारी हर समय उपस्थित रहता है और आगंतुकों को इस भव्य स्मारक की बारीकियों से अवगत करवाता है। इस कार्य की ज़िम्मेदारी अधिकतर महिलाओं के जिम्मे है जोकि हिंदी, इंग्लिश, मलयालम और तमिल भाषा का ज्ञान रखती हैं। अतः इस महल का भ्रमण एक यादगार अनुभव बन जाता है।

(Dr. Kaynat Kazi is a cultural conservationist, academician, author, documentary filmmaker, and photographer)

 

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आखरी अपडेट: 3rd Apr 2025