असम सरकार ने राज्य के सीमावर्ती एवं संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे मूल निवासियों की सुरक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया है। राज्य सरकार असम के मूल निवासियों को अपनी रक्षा के लिए हथियार रखने के लाइसेंस प्रदान करने की शुरुआत करने वाली है। जल्द ही इस प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी एवं सुलभ बनाने के लिए एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल की शुरुआत भी की जायेगी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस विषय में जानकारी देते हुए कहा कि यह पोर्टल अगस्त माह में ही जनता के लिए औपचारिक रूप से आरंभ कर दिया जाएगा।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया है कि यह पहल उन असमिया मूल निवासियों के हित में है, जो राज्य के संवेदनशील, साम्प्रदायिक रूप से तनावग्रस्त अथवा सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं, जहां कानून व्यवस्था बनाए रखना अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण है, और पुलिस बल की त्वरित उपस्थिति सुनिश्चित कर पाना कठिन होता है। उन्होंने कहा कि ‘’जो नागरिक स्वयं को वास्तविक खतरे में महसूस करते हैं, और जिनकी पहचान या स्थिति जिला प्रशासन या अधिकृत सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ‘सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील’ के रूप में की जाएगी, वे इस पोर्टल के माध्यम से हथियार लाइसेंस हेतु आवेदन कर सकेंगे।”
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया बहु-स्तरीय सुरक्षा मूल्यांकन, दस्तावेज सत्यापन, कानूनी प्रावधानों का पालन, आवेदक की पृष्ठभूमि की जांच तथा आवेदन की नियमित समीक्षा और निगरानी पर आधारित होगी। लाइसेंस किसी अन्य को हस्तांतरित नहीं किया जा सकेगा, और समय-समय पर उसका नवीनीकरण तथा पर्यवेक्षण किया जाएगा।
गौरतलब है कि राज्य मंत्रिमंडल ने 28 मई 2025 को आयोजित बैठक में इस निर्णय को औपचारिक रूप से स्वीकृति दी थी। यह निर्णय राज्य सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत राज्य के वन क्षेत्र, आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) तथा अन्य सरकारी भूमि पर कथित अवैध अतिक्रमण को समाप्त किया जा रहा है। यह अतिक्रमण, सरकार के मुताबिक, मुख्यतः बांग्लादेश से आये मुस्लिम समुदाय से संबंधित लोगों द्वारा किया गया है, जो राज्य के बहुसंख्यक मूल निवासियों की सुरक्षा एवं सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है।
राज्य सरकार ने बरपेटा, धुबरी, दक्षिण सालमारा-मनकाचर, धिंग, जानिया, मोरीगांव, नागांव और रूपाही जैसे क्षेत्रों को ‘संवेदनशील’ क्षेत्र घोषित किया है। इन क्षेत्रों में असम के पारंपरिक समुदायों के बीच जनसंख्या असंतुलन तथा बाहरी घुसपैठ की स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह सुरक्षा-केंद्रित पहल की गई है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी कहा कि यह निर्णय आत्मरक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक व्यावहारिक प्रयास है, जो राज्य के मूल निवासियों को स्वयं की, अपने परिवारों की एवं अपनी भूमि की रक्षा करने का आत्मविश्वास प्रदान करेगा। यह पहल विशेषकर उन ग्रामीण क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी, जहां पुलिस थाने की दूरी अधिक है और संकट के समय सहायता प्राप्त करना कठिन हो सकता है।
हालांकि, इस निर्णय को लेकर राजनीतिक विपक्ष ने सरकार की आलोचना भी की है। कांग्रेस पार्टी ने इस नीति को ‘विवादास्पद एवं असंवेदनशील’ करार देते हुए आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेतृत्व वाली राज्य सरकार जनहित की वास्तविक आवश्यकताओं को नज़रअंदाज कर रही है और हथियार संस्कृति को बढ़ावा दे रही है। असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि “यह नीति राज्य में फर्जी मुठभेड़ों, राजनीतिक संरक्षण प्राप्त असामाजिक तत्वों की सक्रियता तथा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकती है।”
विपक्ष की आलोचना के बावजूद, राज्य सरकार अपने निर्णय को राज्य की सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप एक आवश्यक एवं दीर्घकालिक समाधान के रूप में प्रस्तुत कर रही है। मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य किसी भी विशेष समुदाय को लक्षित करना नहीं है, अपितु उन नागरिकों को सशक्त करना है जो दशकों से अवैध अतिक्रमण, घुसपैठ और सुरक्षा की कमी का सामना कर रहे हैं।
-(लेखिका आशिका सिंह का पत्रकारिता जगत में 18 वर्षों का अनुभव है, वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज सर्विस के साथ जुड़ी हैं।)


