भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से कैश रिजर्व रेशियो (CRR) के दैनिक रखरखाव की जरूरत बढ़ाने से बैंकिंग सिस्टम में 40,000 करोड़ रुपये से 80,000 करोड़ रुपये तक की लिक्विडिटी कम हो सकती है। हालांकि, Jefferies की रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर इसका असर सीमित रहने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह कदम मौद्रिक नीति समिति (MPC) के रुख में बदलाव और ‘calibrated tightening’ के अनुरूप है। नए नियमों के तहत बैंकों को निर्धारित CRR का रोजाना 99 प्रतिशत बनाए रखना होगा, जबकि पहले यह सीमा 90 प्रतिशत थी। हालांकि, नेट डिमांड एंड टाइम लायबिलिटीज (NDTL) के 3 प्रतिशत पर निर्धारित CRR में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
दैनिक CRR की जरूरत बढ़ने से बैंकों को RBI के पास अधिक धनराशि रखनी पड़ सकती है। इससे लोन देने और अन्य गतिविधियों के लिए उपलब्ध लिक्विडिटी कम हो सकती है।
Jefferies के अनुसार, यदि इस बदलाव से बैंकों के पास रखे जाने वाले बैलेंस में 5 से 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तो बैंकिंग सिस्टम से 40,000 करोड़ से 80,000 करोड़ रुपये की लिक्विडिटी निकल सकती है। इससे बैंकों की फंडिंग लागत 1 से 2 बेसिस पॉइंट बढ़ने की आशंका है।
ब्रोकरेज ने कहा कि बैंक फिलहाल न्यूनतम दैनिक CRR की जरूरत से अधिक राशि रखते हैं। इसके बावजूद, नए नियमों के कारण उन्हें केंद्रीय बैंक के पास अतिरिक्त फंड अलग रखना पड़ सकता है।
हालांकि, Jefferies का अनुमान है कि बैंकों की लाभप्रदता पर इसका असर सीमित रहेगा। बैंक परिस्थितियों और ब्याज दरों में बदलाव की क्षमता के आधार पर बढ़ी हुई फंडिंग लागत का कुछ हिस्सा कर्ज लेने वालों पर भी डाल सकते हैं।
इसका असर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) और कॉरपोरेट कंपनियों पर भी पड़ सकता है, यदि बैंक बढ़ी हुई लागत की भरपाई के लिए लोन की ब्याज दरें बढ़ाते हैं। इसका वास्तविक प्रभाव बैंकों की फंडिंग रणनीति, लोन की कीमत और कर्ज लेने वालों की अतिरिक्त लागत सहने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
Jefferies ने बढ़ती ब्याज दरों के माहौल में NBFCs के मुकाबले बैंकों को प्राथमिकता दी है। रिपोर्ट के अनुसार, CRR नियमों में बदलाव से बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी पर सीमित दबाव पड़ सकता है, जबकि बैंकों के मार्जिन पर तत्काल असर कम रहने की उम्मीद है।
(इनपुट-ANI)


