राज्यसभा के सभापति सी पी राधाकृष्णन ने मानसून सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही में बार-बार हुए व्यवधान पर ‘‘गहरी चिंता’’ जताते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि इससे सदन का कामकाज प्रभावित हुआ। बीस जुलाई से शुरू हुए मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा की उत्पादकता महज 39 प्रतिशत रही। हालांकि, व्यवधानों के बीच सदन ने 12 विधेयकों पर विचार किया और उन्हें पारित या वापस किया।
सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करते हुए राधाकृष्णन ने सदस्यों से सदन की गरिमा बनाए रखने और भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च संसदीय परंपराओं के अनुरूप अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने का आग्रह किया। राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘राज्यसभा के 271वें सत्र के समापन पर मैं इसकी कार्यवाही को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करता हूं। यह खेद का विषय है कि सत्र लगातार अव्यवस्था और बार-बार हुए व्यवधानों से प्रभावित रहा, जिससे सदन का कामकाज बार-बार बाधित हुआ।’’
उन्होंने कहा कि बहुमूल्य कार्य घंटों के नुकसान के कारण राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सार्थक चर्चा और बहस का अवसर भी सदन को नहीं मिल सका।
मानसून सत्र के दौरान विपक्षी दलों ने नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी सहित कई मुद्दों को लेकर हंगामा किया।
सभापति ने कहा कि व्यवधानों के बावजूद सदन अपने मूल विधायी दायित्वों को पूरा करने में सफल रहा और 12 विधेयकों पर विचार करने के साथ उन्हें पारित या लोकसभा को लौटाया किया।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर कार्यवाही में हम सभी सामूहिक रूप से भाग लेते, अपने बहुमूल्य सुझाव देते और सार्थक विचार-विमर्श में शामिल होते तो स्थिति निश्चित रूप से अलग होती।’’
राधाकृष्णन ने बताया कि सदन में केवल 37 घंटे 49 मिनट काम हुआ और इसकी उत्पादकता 39.17 प्रतिशत रही।
सत्र के दौरान 285 तारांकित प्रश्न, शून्यकाल के तहत 380 विषय और विशेष उल्लेख के जरिये 380 मुद्दे उठाने का अवसर था, लेकिन इनमें से केवल 16 प्रश्न, शून्यकाल के तहत 52 विषय और 93 विशेष उल्लेख ही सदन में लिए जा सके। सभापति ने कहा कि सदस्यों ने लोगों की आवाज उठाने के लिए उपलब्ध अवसरों का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया।
उन्होंने कहा, ‘‘सदन के वरिष्ठ सदन के रूप में इस गरिमापूर्ण सदन की तर्कपूर्ण बहस, गरिमापूर्ण असहमति और विचारशील कानून निर्माण को बनाए रखने की विशेष जिम्मेदारी है। बार-बार होने वाले व्यवधान अंततः लोगों के विश्वास और आकांक्षाओं को प्रभावित करते हैं।’’
उन्होंने सदस्यों से संसदीय आचरण के उच्चतम मानकों को बनाए रखने तथा संस्था की गरिमा और पवित्रता की रक्षा करने का आह्वान किया।
सभापति ने बताया कि नवनिर्वाचित और मनोनीत सदस्यों के लिए दो दिवसीय ‘ओरिएंटेशन’ कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें संसदीय कार्यप्रणाली, प्रक्रिया और सदस्यों से अपेक्षित आचरण के मानकों के बारे में जानकारी दी गई। इस कार्यक्रम में 35 सदस्यों ने हिस्सा लिया।
राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि जब हम अगली बार मिलेंगे तो इस गरिमापूर्ण सदन की प्रतिष्ठा बनाए रखने और लोकतंत्र की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप अपनी संसदीय जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के नए संकल्प के साथ मिलेंगे। इससे हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं और हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा।’’ (इनपुटप-पीटीआई)


