उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने जयपुर स्थित राजस्थान विधानसभा में विधानसभा के 75वें स्थापना वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘विधायी गौरव यात्रा : पूर्व एवं वर्तमान सदस्यों के कॉन्क्लेव’ के समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता की सेवा करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन सभी जनप्रतिनिधियों की अटूट प्रतिबद्धता जनता और संविधान के प्रति होनी चाहिए।
राजस्थान की लोकतांत्रिक परंपरा और जनप्रतिनिधियों की भूमिका की सराहना
उपराष्ट्रपति ने राजस्थान की शौर्य, बलिदान और देशभक्ति की परंपरा को नमन करते हुए कहा कि राज्य की प्रत्येक पीढ़ी ने लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब विचार-विमर्श गरिमा के साथ हो और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। पूर्व और वर्तमान विधायकों को एक मंच पर लाने की पहल की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि इससे संस्थागत अनुभवों का संरक्षण होता है और नई पीढ़ी के जनप्रतिनिधियों को सीखने का अवसर मिलता है।
बहस और चर्चा का उद्देश्य निर्णय तक पहुंचना होना चाहिए
लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि किसी विषय पर सहमति या असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन सभी की प्रतिबद्धता संविधान और जनता के प्रति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बहस, चर्चा या कभी-कभी व्यवधान भी अंततः किसी निर्णय तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से रचनात्मक संवाद और संसदीय समितियों के माध्यम से सक्रिय योगदान देने का भी आह्वान किया।
राज्य विधानसभाएं लोकतंत्र की जीवंत धड़कन हैं
सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारत के लोकतंत्र की शक्ति केवल संवैधानिक संस्थाओं में नहीं, बल्कि बहस की गुणवत्ता, आचरण की मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता में भी निहित है। उन्होंने राज्य विधानसभाओं को भारतीय लोकतंत्र की जीवंत धड़कन बताते हुए कहा कि जहां संसद पूरे देश की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं विधानसभाएं गांव, कस्बों और परिवारों की उम्मीदों और चिंताओं को आवाज देती हैं।
जनसेवा से ही मिलता है स्थायी सम्मान
उपराष्ट्रपति ने कहा कि जनता का स्थायी सम्मान केवल ईमानदार जनसेवा से प्राप्त होता है। उन्होंने तिरुक्कुरल और श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को विनम्रता, सहानुभूति और निस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में धैर्य आवश्यक है और ईमानदार सेवा को अंततः पहचान अवश्य मिलती है।
महाराणा प्रताप और चेतक का उदाहरण देकर दिया संदेश
राजस्थान के इतिहास का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इतिहास केवल महाराणा प्रताप को ही नहीं, बल्कि उनके विश्वस्त अश्व चेतक की निष्ठा और बलिदान को भी याद रखता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी ईमानदारी और समर्पण से स्थायी विरासत छोड़ सकता है। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से विधायी संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने और विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को साकार करने के लिए ईमानदारी, विनम्रता और समर्पण के साथ कार्य करने का आह्वान किया।
पूर्व एवं वर्तमान जनप्रतिनिधियों का किया सम्मान
कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति ने राजस्थान विधानसभा के पूर्व अध्यक्षों, पूर्व उपाध्यक्षों तथा पूर्व एवं वर्तमान सदस्यों को राज्य की लोकतांत्रिक और विधायी परंपरा में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया। इस अवसर पर राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ किसानराव बागडे, मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। (इनपुट: पीआईबी)


