25 जून 1975 की वो रात… जिस रात देश में आपातकाल जैसा काला अध्याय लिखा गया, उसका अंधेरा भले ही वक्त के साथ छंट गया लेकिन लोकतंत्र को मिले घाव आज भी इस देश की आत्मा को सालते हैं। आपातकाल के नाम पर लोगों के मौलिक अधिकारों का दमन हुआ, मीडिया की आवाज दबाई गई और विपक्ष को जेलों में ठूंस दिया गया। नतीजा? 1977 में जनता ने कांग्रेस को करारी सजा दी। पार्टी को 198 सीटों का नुकसान हुआ और लोकसभा में केवल 154 सीटें मिलीं। आज जब आपातकाल की चर्चा हो रही है तो एक बार फिर इसे लगाने वालों के हश्र और जनता के अटल फैसले का विश्लेषण भी होना चाहिए। क्योंकि जब इस विश्लेषण के अंतिम छोर तक आप पहुंचेंगे तो पता चलेगा कि जनता आपातकाल के जख्मों को भूली नहीं है बल्कि समय के साथ उसका विरोध और मजबूत होता जा रहा है।
आपातकाल से भी ज्यादा गुस्सा
जनता के मन की बात समझने के लिए आपको थोड़ा सा पीछे जाना होगा यानी 1977 में और 2014 से लेकर 2024 के चुनाव नतीजों तक। 1975 में आपातकाल को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला अध्याय माना गया। इसके बाद 1977 में जनता ने सत्ता पर काबिज कांग्रेस को उखाड़ फेंका। हालांकि तीन साल में 1980 में कांग्रेस फिर से सत्ता में लौट आई। मगर आज, 2014 के बाद से कांग्रेस लगातार पराजय का शिकार हो रही है। आपातकाल में जब उसे पहले 154 सीटें मिलीं जो पहले की तुलना में 198 कम रहीं तो 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 44 सीटें मिली थीं और वह कांग्रेस का अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। ये नतीजे बताते हैं कि आपातकाल के बाद कांग्रेस के खिलाफ जनता का यह सबसे बड़ा आक्रोश था जो ईवीएम के जरिए बाहर निकला। इसके बाद भी वह न तो आत्मनिरीक्षण कर पा रही है, न नेतृत्व में स्पष्टता है और न ही जनविश्वास में कोई बढ़त। यह दर्शाता है कि जनता में आज की कांग्रेस के प्रति आपातकाल से भी ज्यादा अविश्वास है।
2014 के बाद कांग्रेस का क्रमिक पतन
2014 में कांग्रेस महज 44 सीटों पर सिमट गई, यह आजाद भारत में किसी भी राष्ट्रीय पार्टी का सबसे शर्मनाक प्रदर्शन था। 2019 में यह संख्या बढ़कर 52 हुई लेकिन विपक्ष के नेता की मान्यता पाने की 55 सीटों की न्यूनतम शर्त भी पूरी नहीं हुई। 2024 में, कांग्रेस भले ही 99 सीटों तक पहुंची पर यह भी सहयोगी दलों के समर्थन के बिना मुमकिन नहीं था। पार्टी की खुद की वोट हिस्सेदारी महज 21% के आसपास रही। इससे बेहतर तो 1980 की कांग्रेस की वापसी थी, आज की कांग्रेस केवल गठबंधनों के सहारे सांस ले रही है।
आज की नाराजगी आपातकाल से भी बड़ी क्यों?
लगातार विफलता : 10 साल से लगातार जनता कांग्रेस को नकार रही है। जनता का ग़ुस्सा अब केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं रहा, यह अब निरंतर अस्वीकृति में बदल गया है।
नेतृत्व में अस्पष्टता : विडंबना यह है कि आपातकाल जैसे फैसले का बचाव करने वाली पार्टी आज भी आत्ममंथन को तैयार नहीं है। न राहुल गांधी और न मल्लिकार्जुन खड़गे कोई स्पष्ट, प्रभावशाली नेतृत्व दे पाए हैं। बार-बार के पलायन, अंदरूनी कलह और निष्क्रियता ने पार्टी की छवि और खोखली कर दी है।
न कोई नया दृष्टिकोण, न सुधार : 1977 के बाद की कांग्रेस ने भी आत्ममंथन नहीं किया और तानाशाही रवैया अपनाया आज की कांग्रेस भी वही कर रही है। आज की कांग्रेस में न तो कोई ठोस वैचारिक दिशा है और न ही जनता से सीधे जुड़ने की रणनीति।
तो जनता का गुस्सा और क्यों न बढ़े?
आपातकाल के समय देश में तत्कालीन सत्तारूढ़ दल के खिलाफ ऐसा गुस्सा उपजा कि उनसे ज्यादा जनता ने विपक्ष के नेताओं पर भरोसा जताया। नतीजन सरकार बदली। आज के दौर में विपक्ष के तौर पर कांग्रेस की जनता के बीच विश्वसनीयता किसी से छिपी नहीं है। इसके सबसे बड़े उदाहरण बीते 10 सालों के चुनाव नतीजे हैं। कांग्रेस इन 10 वर्षों में आपातकाल के बाद हुए पार्टी के हश्र से भी बुरे दौर में पहुंच चुकी है। राष्ट्र से जुड़े हुए मुद्दों पर भी सवाल उठाने वाली पार्टी के अंदर हार, भ्रम और नेतृत्वहीनता साफ दिखती है। जबकि भारत जैसा लोकतांत्रिक देश हमेशा से एक सशक्त विपक्ष चाहता है लेकिन कांग्रेस ने खुद को इस भूमिका के लायक साबित ही नहीं किया। जनता की यह नाराजगी अब केवल विकल्प की तलाश नहीं है बल्कि यह ‘राजनीतिक धोखाधड़ी और नेतृत्वहीनता’ पर गुस्सा है।
आपातकाल का गुस्सा शांत नहीं हुआ
1977 में आपातकाल के बाद जनता का भारी आक्रोश सामने आया और कांग्रेस को 198 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा लेकिन तीन वर्षों में 1980 में वापसी हो गई। ये वापसी जनता की नाराजगी दूर होने का नतीजा नहीं था बल्कि शायद गलती सुधारने का मौका था। इसके बाद भी जनता ने कांग्रेस को कई मौके दिए लेकिन आज के हालात बयां करते हैं कि जनता ने आपातकाल थोपने वालों को माफ नहीं किया। यही कारण है कि कांग्रेस आज राजनीतिक पार्टी के तौर पर आपातकाल के बाद से भी बुरे दौर से गुजर रही है। 2014 में कांग्रेस केवल 44 सीटों पर सिमट गई और फिर 2019 में मामूली बढ़त के साथ 52 सीटों पर पहुंची। 2024 में भले ही वह 99 सीटों तक पहुंची हो लेकिन यह पुनरुत्थान अब तक अधूरा है। यह सफलता कांग्रेस की अपनी ताकत पर नहीं, बल्कि सहयोगी दलों पर निर्भर रही है। पार्टी का जनाधार खत्म होता जा रहा है। वह आज वैचारिक और संगठनात्मक रूप से खोखली नजर आती है।
माफी या जवाबदेही जरूरी?
आपातकाल जैसा जनविरोधी फैसला थोपने वाली पार्टी आज उस मुकाम पर है जहां से लौटने के लिए केवल गठबंधन या सहानुभूति नहीं चलेगी। जनता ने उसे बार-बार अवसर दिया और हर बार पार्टी ने नेतृत्व, नीति और नैतिकता तीनों में विफलता दिखाई। अब सवाल यह नहीं है कि आपातकाल लगाने वाली पार्टी का क्या हाल है बल्कि यह है कि क्या देश को अब आपातकाल जैसा दर्द देने वालों की ज़रूरत भी है? यह सवाल जितना लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है, उतना ही आपातकाल जैसी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश करने वालों के अस्तित्व का भी है।
-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है।)


