भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए डेटा सेंटर अब एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा बन चुके हैं। बैंकिंग, ई-गवर्नेंस, डिजिटल भुगतान, क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी सेवाओं के पीछे डेटा सेंटर चौबीसों घंटे कंप्यूटिंग, स्टोरेज, नेटवर्किंग और सुरक्षा सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। डिजिटल सेवाओं और डेटा की बढ़ती मांग के बीच सरकार भी नीतिगत प्रोत्साहन, बुनियादी ढांचे का दर्जा, स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा एवं जल दक्षता जैसे उपायों के जरिए देश के डेटा सेंटर इकोसिस्टम को मजबूत कर रही है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार
डिजिटलीकरण के विस्तार के साथ कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा स्टोरेज और तेज कनेक्टिविटी की मांग तेजी से बढ़ रही है। डेटा सेंटर इस मांग को पूरा करने वाला महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा हैं, जो डिजिटल सेवाओं को सुरक्षित और बड़े पैमाने पर संचालित करने में मदद करते हैं। डेटा सेंटर ऐसी सुरक्षित सुविधाएं हैं जहां सर्वर, स्टोरेज और नेटवर्किंग उपकरण लगाए जाते हैं। यहां बड़ी मात्रा में डिजिटल सूचनाओं को संगृहीत, संसाधित और प्रबंधित किया जाता है। आधुनिक डेटा सेंटर में पावर, कूलिंग, सुरक्षा और प्रबंधन प्रणालियां भी एकीकृत होती हैं।
डेटा सेंटर के भीतर की तकनीक
डेटा सेंटर के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति बेहद जरूरी है। बिजली जाने की स्थिति में अनइंटरप्टिबल पावर सप्लाई (यूपीएस) तत्काल बैकअप देती है, जबकि लंबे समय तक बिजली बाधित होने पर जनरेटर और विद्युत वितरण प्रणालियां संचालन को जारी रखने में मदद करती हैं। कंप्यूटिंग उपकरणों से उत्पन्न गर्मी को नियंत्रित करने के लिए हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग (एचवीएसी) सिस्टम का इस्तेमाल होता है। उन्नत एयरफ्लो मैनेजमेंट और लिक्विड कूलिंग जैसी तकनीकें कूलिंग की दक्षता और विश्वसनीयता को और बेहतर बनाती हैं। सर्वर डिजिटल सूचनाओं को प्रोसेस करते हैं, जबकि हार्ड डिस्क ड्राइव (एचडीडी) और सॉलिड-स्टेट ड्राइव (एसएसडी) डेटा को स्टोर करते हैं। राउटर और हाई-स्पीड स्विच नेटवर्क के जरिए डेटा के आदान-प्रदान को संभव बनाते हैं। फाइबर-ऑप्टिक कनेक्शन डेटा सेंटर और बाहरी नेटवर्क के बीच तेज संचार उपलब्ध कराते हैं।
वर्चुअलाइजेशन और ऑटोमेशन
मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर डेटा सेंटर की विभिन्न प्रणालियों की निगरानी करता है और कंप्यूटिंग संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद करता है। वर्चुअलाइजेशन तकनीक एक ही फिजिकल सर्वर पर कई वर्चुअल मशीनें चलाने की सुविधा देती है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि एक बड़े घर को कई अलग-अलग अपार्टमेंट में बांट दिया जाए। ऑटोमेशन टूल वर्कलोड मैनेजमेंट, रख-रखाव और परिचालन संबंधी समस्याओं की पहचान में मदद करते हैं। इससे उपलब्ध संसाधनों का अधिक कुशल इस्तेमाल संभव होता है।
एक क्लिक से डेटा सेंटर तक
किसी ऐप को खोलने, बैंक बैलेंस देखने या कोई डॉक्यूमेंट एक्सेस करने जैसी डिजिटल रिक्वेस्ट नेटवर्क के जरिए डेटा सेंटर तक पहुंचती है। वहां कई प्रणालियां मिलकर इस रिक्वेस्ट को संसाधित करती हैं। सबसे पहले सिक्योरिटी लेयर रिक्वेस्ट की जांच करती है। इसके बाद लोड बैलेंसर उसे उपलब्ध सर्वरों में बांटता है, ताकि किसी एक सर्वर पर अत्यधिक भार न पड़े। एप्लिकेशन सर्वर रिक्वेस्ट को प्रोसेस करता है और जरूरत के मुताबिक एपीआई के जरिए अन्य एप्लिकेशन या सेवाओं से संपर्क करता है। डेटाबेस सर्वर आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराता है। इसके बाद प्रोसेस की गई जानकारी नेटवर्क के जरिए वापस यूज़र के डिवाइस तक पहुंचती है। यह पूरी प्रक्रिया कई मामलों में कुछ सेकंड में पूरी हो सकती है और उपयोगकर्ता को तेज डिजिटल सेवा उपलब्ध कराती है।
पर्दे के पीछे की डिजिटल टीम
नेटवर्क को डेटा सेंटर के भीतर मौजूद कॉरिडोर की तरह समझा जा सकता है, जो अलग-अलग प्रणालियों को जोड़ता है। सिक्योरिटी लेयर गार्ड की तरह रिक्वेस्ट की जांच करती है। लोड बैलेंसर ट्रैफिक पुलिस की तरह डिजिटल ट्रैफिक को अलग-अलग सर्वरों में बांटता है। एप्लिकेशन सर्वर शेफ की तरह रिक्वेस्ट को समझकर जरूरी प्रक्रिया तय करता है। एपीआई संदेशवाहक की भूमिका निभाता है, जबकि डेटाबेस सर्वर डिजिटल भंडार की तरह जरूरी जानकारी को सुरक्षित रखता है।
भारत में डेटा सेंटर का विस्तार
भारत में डेटा सेंटर का विकास ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ हुआ है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) ने दिल्ली, पुणे, हैदराबाद और भुवनेश्वर में अत्याधुनिक राष्ट्रीय डेटा सेंटर सुविधाएं स्थापित की हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्यों की राजधानियों में 37 छोटे डेटा सेंटर भी स्थापित किए गए हैं। देश में डेटा सेंटर की स्थापित विद्युत क्षमता वर्ष 2020 में करीब 375 मेगावाट थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर 1.57 गीगावाट हो गई। वर्ष 2030 तक इसके करीब 8 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। क्षेत्र में करीब 70 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश पहले से हो रहा है, जबकि करीब 90 अरब अमेरिकी डॉलर के अतिरिक्त प्रोजेक्ट्स की घोषणा की गई है।
डेटा सेंटर को मिला बुनियादी ढांचे का दर्जा
केंद्रीय बजट 2022-23 में डेटा सेंटर को बुनियादी ढांचे की सामंजस्यपूर्ण सूची में शामिल किया गया। इससे डेटा सेंटर को बुनियादी ढांचे का दर्जा मिला और उनके लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण हासिल करना आसान हुआ। सरल शब्दों में, बुनियादी ढांचे का दर्जा मिलने के बाद डेटा सेंटर को राष्ट्रीय राजमार्ग, हवाई अड्डे और बिजली ग्रिड जैसी महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के समान श्रेणी में माना जाता है। इससे उन्हें अपेक्षाकृत आसान और किफायती दीर्घकालिक ऋण हासिल करने में मदद मिल सकती है।
क्लाउड कंपनियों के लिए टैक्स प्रोत्साहन
केंद्रीय बजट 2026-27 में पात्र विदेशी क्लाउड सेवा प्रदाताओं के लिए वर्ष 2047 तक टैक्स हॉलिडे का प्रावधान किया गया है। यह प्रोत्साहन भारत स्थित डेटा सेंटर बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल करने वाले पात्र वैश्विक परिचालनों पर लागू होता है और कर वर्ष 2026-27 से 2046-47 तक प्रभावी है। यह कदम भारत में डेटा सेंटर और क्लाउड बुनियादी ढांचे में वैश्विक निवेश को आकर्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सेमीकंडक्टर और एआई से मिलेगा बल
डेटा सेंटर का विस्तार सेमीकंडक्टर और एआई जैसे क्षेत्रों के विकास से भी जुड़ा है। 15 जुलाई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 1,27,500 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के दूसरे चरण को मंजूरी दी। इंडियाएआई मिशन को 10,371.92 करोड़ रुपए के कुल बजट परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई है। देश में विकसित हो रहा एआई इकोसिस्टम डेटा सेंटर की कंप्यूटिंग क्षमता की मांग बढ़ाने वाला प्रमुख कारक है। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ईसीएमएस) का आवंटन भी 22,000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपए किया गया है। वहीं, आईटी हार्डवेयर के लिए पीएलआई स्कीम 2.0 का उद्देश्य सर्वर समेत आईटी हार्डवेयर के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
बढ़ती क्षमता के साथ ऊर्जा की जरूरत
डेटा सेंटर के विस्तार के साथ ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। विद्युत मंत्रालय के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के अनुसार, वर्ष 2031-32 तक डेटा सेंटर क्षेत्र की बिजली मांग 17 गीगावाट तक पहुंच सकती है। इसलिए डेटा सेंटर के सतत विकास के लिए पर्याप्त बिजली के साथ स्वच्छ ऊर्जा और संसाधन दक्षता पर भी जोर दिया जा रहा है।
नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर
सरकार ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस रूल्स, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर स्कीम और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसी पहलों के जरिए नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है। राष्ट्रीय उच्च दक्षता सौर पीवी मॉड्यूल कार्यक्रम और सौर पार्क योजना भी स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करती हैं। इन पहलों से ऊर्जा-गहन डिजिटल बुनियादी ढांचे के लिए स्वच्छ और विश्वसनीय बिजली की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
परमाणु ऊर्जा और डेटा सेंटर
भारत में बदलाव के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास (शांति) अधिनियम, 2025 भी स्वच्छ ऊर्जा इकोसिस्टम को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है। यह एआई और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल की संभावनाओं को समर्थन देता है। भविष्य में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर और माइक्रो न्यूक्लियर रिएक्टर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी डेटा सेंटर जैसे लगातार बिजली की जरूरत वाले क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
बीआईएस के दक्षता मानक
भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने डेटा सेंटर की दक्षता से जुड़े मानक विकसित किए हैं। इसकी तकनीकी समिति एलआईटीडी 31 क्लाउड कंप्यूटिंग, सूचना प्रौद्योगिकी और डेटा सेंटर से जुड़े मानकों को कवर करती है। बीआईएस ने पावर यूसेज इफेक्टिवनेस (पीयूई) और कार्बन यूसेज इफेक्टिवनेस (सीयूई) से संबंधित मानक प्रकाशित किए हैं। इनमें कूलिंग एफिशिएंसी रेशियो (सीईआर) और वॉटर यूसेज इफेक्टिवनेस (डब्ल्यूयूई) से जुड़े मानक भी शामिल हैं।
बिजली और पानी की दक्षता
पीयूई और डब्ल्यूयूई को एक तरह की ‘ग्रीन माइलेज रेटिंग’ की तरह समझा जा सकता है। पीयूई यह समझने में मदद करता है कि डेटा सेंटर कुल बिजली का कितनी दक्षता से इस्तेमाल कर रहा है, जबकि डब्ल्यूयूई पानी के इस्तेमाल की दक्षता को मापता है। सीयूई डेटा सेंटर की ऊर्जा खपत से जुड़े कार्बन उत्सर्जन को मापने में मदद करता है। वहीं, सीईआर यह बताता है कि कूलिंग सिस्टम बिजली की खपत के मुकाबले गर्मी को कितनी दक्षता से बाहर निकाल रहा है।
ऊर्जा और जल संरक्षण के मानक
ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) ने ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ईसीबीसी) 2017 और ऊर्जा संरक्षण और सतत भवन संहिता (ईसीएसबीसी) 2024 को अधिसूचित किया है। इन संहिताओं में भवनों के लिए ऊर्जा दक्षता और जल संरक्षण के मानदंड निर्धारित किए गए हैं तथा डेटा सेंटर बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं।
एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ बढ़ रहा उन्नत कूलिंग तकनीकों का इस्तेमाल
डेटा सेंटर में पानी की खपत काफी हद तक इस्तेमाल की जाने वाली कूलिंग तकनीक पर निर्भर करती है। औद्योगिक उद्देश्यों समेत भूजल निष्कर्षण को जल शक्ति मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के तहत विनियमित किया जाता है। एआई आधारित बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, एडियाबैटिक कूलिंग और इमर्शन कूलिंग जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग सिस्टम भी संसाधन-कुशल विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।
डेटा संप्रभुता और डिजिटल आत्मनिर्भरता को मजबूती
भारत में डेटा सेंटर का विस्तार एक मजबूत और संप्रभु डिजिटल बुनियादी ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। डेटा संप्रभुता, डिजिटल विश्वास, आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए इनकी भूमिका आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। क्लाउड और एआई बुनियादी ढांचे के विस्तार से नवाचार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। हालांकि, इस विस्तार के साथ डेटा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और डिजिटल बुनियादी ढांचे के जिम्मेदार शासन की जरूरत भी बढ़ेगी। मजबूत साइबर सुरक्षा, कड़े तकनीकी मानक, जिम्मेदारीपूर्ण डेटा प्रबंधन और संसाधनों के कुशल इस्तेमाल के साथ नवाचार और जनहित के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा। कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढांचे में घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना भी भारत की दीर्घकालिक डिजिटल आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण होगा। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए डेटा सेंटर देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनने की क्षमता रखते हैं। (इनपुट: पीआईबी)


