18वें सिविल सेवा दिवस के अवसर पर उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि “अधिक शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है” और सिविल सेवकों को देश के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से निभाना चाहिए।
विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि सिविल सेवक देश की “स्टील फ्रेम” हैं, जैसा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें संबोधित किया था, और आज भी वे देश की एकता और विकास के मजबूत स्तंभ बने हुए हैं।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले दशक में देश ने तेज प्रगति की है, जिसमें करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालना, गरीबों के लिए घर बनाना और सीमावर्ती गांवों का विकास शामिल है।
उन्होंने सिविल सेवकों से आह्वान किया कि वे “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के मंत्र को हर नागरिक तक पहुंचाएं और अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करें।
तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया का जिक्र करते हुए उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे खुद को लगातार अपडेट रखें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और ब्लॉकचेन जैसी नई तकनीकों को अपनाएं।
उन्होंने यह भी कहा कि अब केवल सामान्य ज्ञान (generalist approach) से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रशासन में विशेषज्ञता (specialisation) की जरूरत है, और राज्यों को भर्ती नीतियों में सुधार करना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने सिविल सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को “नारी शक्ति” का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि 2016 में जहां महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत थी, वहीं 2025 में यह बढ़कर करीब 31 प्रतिशत हो गई है।
उन्होंने अधिकारियों को याद दिलाया कि हर साल लाखों उम्मीदवार परीक्षा देते हैं, लेकिन बहुत कम लोग चयनित होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी जिम्मेदारी और भूमिका का हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
कुल मिलाकर, उपराष्ट्रपति ने सिविल सेवकों से ईमानदारी, तकनीकी दक्षता और जनसेवा के प्रति समर्पण के साथ काम करने का आह्वान किया, ताकि ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल किया जा सके।


