‘अंग्रेजीयत’ की मानसिकता ने कैसे भारतीय संस्कृति को दिए जख्म, नई किताब परत-दर-परत करती है पड़ताल

भारत जैसे बहु-भाषी देश में भाषाई आधार पर विवाद अक्सर देखे जाते हैं। लेकिन दिलचस्प है कि कभी अंग्रेजी शिक्षा और उससे पनपी ‘अंग्रेजीयत’ की भावना का विरोध शायद ही होता हो। शायद क्या, कभी नहीं होता। इसके पीछे की मूल वजह क्या है? इस वजह को तलाशती है कि एक नई किताब जिसे साइंटिस्ट अमिताभ सत्यम ने लिखा है। ‘THE HINDI MEDIUM TYPES’ नाम की इस किताब में सत्यम ने भारतीयों (विशेष रूप से संभ्रांत समाज) के मन बसी खोखली ‘अंग्रेजीयत’ की परतें उधेड़ कर रख दी हैं।

मूलरूप से बिहार के शिवहर से ताल्लुक रखने वाले अमिताभ सत्यम IIT कानपुर से ग्रेजुएट हैं और अमेरिका के फिशर कॉलेज ऑफ बिजनेस से MBA किया है। उन्होंने बिहार से लेकर अमेरिका तक के अनुभवों को पाठकों के साथ साझा किया है। छात्र जीवन से लेकर व्यावसायिक जीवन तक के अनुभवों पर सत्यम ने बताया है कि कैसे भारत में अंग्रेजी केवल एक भाषा नहीं है बल्कि यह उससे जुड़ी एक ‘पूरी मानसिकता’ है। वह बताते हैं कि भारत के आजाद होने के बावजूद अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गई धारणाएं और पश्चिमी सभ्यता की अवधारणाएं भारतीय मानस पटल अब भी मजबूती से जिंदा हैं।

देश की हर स्थानीय भाषा की कहानी कहती है ये किताब

सत्यम ने किताब में ऐसी बातों का जिक्र किया है जिससे संभवत: भारतीय परिचित होंगे। विशेष रूप से वो लोग जो स्थानीय भाषाएं बोलते हैं। दरअसल यह किताब भले ही अंग्रेजी और हिंदी में प्रकाशित हुई है लेकिन यह देश की हर स्थानीय भाषा, स्थानीय संस्कृति और उसके मूल्यों की कहानी कहती है।

देसी परिधान से लेकर चिकित्सा पद्धति तक, सब पर सवालिया निशान!

धोती-कुर्ता जैसे पहनावे को दोयम दर्जे के नजरिए से देखने के स्वभाव से लेकर आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को अवैज्ञानिक मानने तक, सत्यम हर उस पहलू को उजागर करते हैं जिससे देश के एक वर्ग में पनपी ‘अंग्रेजीयत’ का खोखलापन जाहिर होता है। वह बताते हैं कि कैसे भारत में अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति ने सेब जैसे महंगे फल को अनिवार्य बनाया जबकि अन्य स्थानीय और मौसमी फल भी उसी तरह लाभदायक हैं।

अंग्रेजी भाषा की औपनिवेशिकता पर अब हम विचार तक नहीं करते

‘अंग्रेजीयत’ की मानसिकता पर कुठाराघात करते हुए सत्यम लिखते हैं: आजकल तो कोई सोचता भी नहीं कि अंग्रेजी उन विदेशियों की भाषा है जिन्होंने हम पर बलपूर्वक शासन किया और हमारा खूब शोषण किया। करोड़ों भारतीयों को जो कभी विज्ञान, अभियांत्रिकी, साहित्य, चिकित्सा, दर्शन और कला में अग्रणी थे-एक ही झटके में अशिक्षितत घोषित कर दिया गया। अंग्रेजी बोलने वालों के निर्णयानुसार, भारत की महानता को एक सिरे से खारिज कर अंग्रेजों की भाषा और संस्कृति को ही श्रेष्ठ बताकर जनमानस पर रोप दिया गया। नौकरी उन्हीं को मिलती थी जो अंग्रेजों की भाषा बोलें और उनका अनुसरण करें। शासन तो उनके हाथ में ही था।

अंग्रेजी नाम रख देने पर भर जाते हैं स्कूल

सत्यम लिखते हैं कि अंग्रेजी संस्कृति का इतना प्रभाव भारतीय व्यवस्था पर है कि लोग अपने बच्चे का एडमिशन उस स्कूल में कराना पसंद करते हैं जिनके नाम पश्चिमी ‘संतों’ पर आधारित होते हैं। वो अपने पैतृक शहर का जिक्र करते हुए बताते हैं कि कैसे एक स्कूल का केवल नाम बदल जाने भर से वहां छात्रों की संख्या में इजाफा हो गया था।

अमेरिका में भी पीछा नहीं छोड़ती मानसिकता

दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजी ही सर्वोच्च है की यह मानसिकता भारतीयों का पीछा अमेरिका में भी नहीं छोड़ती। सत्यम लिखते हैं-जब हम अमेरिका में थे तो अंग्रेजी बोलने का मेरा तरीका और शब्दों का उच्चारण अमेरिकी लोगों जैसा था। अधिकांश भारतीयों का अंग्रेजी का उच्चारण भारत वाला होता है क्योंकि वो भारत में अग्रेजी बोलते रहे थे, जबकि हमने अमेरिका में ही ठीक से इंग्लिश सीखी तो वहीं के जैसी सीखी। अमेरिकी उच्चारण के कारण हमको अमेरिका में भारतीयों द्वारा बहुत तारीफ मिलती थी: ‘अच्छा आप भारत से आए हैं? बात करने से तो लगता है कि आपका जन्म यहीं हुआ है!’

किस्से केवल इतने ही नहीं है। 9 अध्यायों में विभाजित यह किताब ऐसे किस्सों का भंडार है जो भारतीय मानस में बसी औपनिवेशिक सोच को उजागर करती है। पूरी किताब उस अवधारणा पर सवाल करती है जो अपने शोषकों की भाषा और संस्कृति को सर्वोच्च मानने पर बाध्य करती है। भारतीय लोगों को यह बताने की प्रयास करती है कि हमारी एक बड़ी जनसंख्या ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ से जकड़ी है। भारत में पाश्चात्य सभ्यता और औपनिवेशिक सोच के अतिरेक को महसूस करते हर पाठक को यह किताब पढ़नी चाहिए।

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