भारत बना आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन का वैश्विक प्रतीक : डॉ. जितेंद्र सिंह

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत अब दुनिया के लिए एक ऐसा उदाहरण बन गया है जो आर्थिक प्रगति को पर्यावरणीय स्थिरता से जोड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो (शून्य कार्बन उत्सर्जन) का लक्ष्य तय किया है और LiFE – Lifestyle for Environment अभियान के ज़रिए प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली को बढ़ावा दिया है।

वे जामिया मिलिया इस्लामिया में आयोजित Asian Conference on Geography (ACG 2025) के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें तीन आपस में जुड़े मुद्दों — जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और संसाधनों के सतत प्रबंधन — पर चर्चा की जा रही है, जो हमारे भविष्य की स्थिरता तय करते हैं।

मंत्री ने जामिया मिलिया इस्लामिया को भारत में इस प्रतिष्ठित सम्मेलन की पहली मेज़बानी के लिए बधाई दी और कुलपति प्रो. मज़हर अली व आयोजन समिति की सराहना की, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और छात्रों को एक मंच पर लाकर वैश्विक चुनौतियों पर विचार करने का अवसर दिया।

उन्होंने कहा कि एशिया आज औद्योगिक और आर्थिक विकास का केंद्र है, लेकिन यह क्षेत्र विश्व के आधे से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए भी जिम्मेदार है। IPCC की छठी रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उत्सर्जन इसी दर से जारी रहा तो एशिया में हीटवेव, बाढ़ और जल संकट जैसी चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ेंगी।

डॉ. सिंह ने बताया कि दक्षिण एशिया में ही लगभग 75 करोड़ लोग गंभीर जलवायु खतरों के संपर्क में हैं — हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से लेकर तटीय बाढ़ और शहरी गर्मी तक। उन्होंने कहा कि दिल्ली, ढाका, बैंकॉक और मनीला जैसे शहर 2050 तक सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील महानगरों में शामिल होंगे।

उन्होंने कहा कि शहरीकरण विकास का प्रतीक तो है, लेकिन अनियोजित विस्तार, बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण, भूजल स्तर में कमी और प्रदूषण के कारण यह एक बड़ी चुनौती बन गया है। 2014 की श्रीनगर बाढ़ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे हादसे केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव लापरवाही और गलत योजना के कारण और भी गंभीर हो जाते हैं।

डॉ. सिंह ने बताया कि विकासशील एशियाई देशों में करीब 80% गंदा पानी बिना शोधन के छोड़ दिया जाता है और शहरी भारत हर साल लगभग 5.5 करोड़ टन ठोस कचरा उत्पन्न करता है, जो हर साल 5% की दर से बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि waste-to-wealth (कचरे से कमाई) तकनीकें और circular economy (परिपत्र अर्थव्यवस्था) भविष्य की कुंजी हैं, जहाँ “कचरे” की अवधारणा ही समाप्त हो जाएगी। उन्होंने देहरादून का उदाहरण देते हुए बताया कि वहाँ इस्तेमाल किया गया cooking oil रीसायकल कर पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ समुदाय को आय भी मिल रही है।

मंत्री ने यह भी कहा कि कोई भी सरकारी योजना जनता की भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकती। जब तक यह एक सामाजिक आंदोलन नहीं बनता, तब तक न कोई नीति और न ही कोई सेमिनार अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल हो सकता है।