भारत का हस्तशिल्प क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कारीगरों और शिल्पकारों को आजीविका प्रदान करता है, निर्यात में योगदान देता है तथा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करता है। 318 जीआई-टैग्ड हस्तशिल्प उत्पादों और लगभग 455 औपचारिक रूप से वर्गीकृत शिल्प श्रेणियों के साथ यह क्षेत्र भारत की सृजनात्मक परंपराओं की अद्भुत विविधता को दर्शाता है।
हर हस्तशिल्प के पीछे की कला
हस्तशिल्प वे वस्तुएँ हैं जो मुख्य रूप से हाथों से बनाई जाती हैं, भले ही निर्माण प्रक्रिया में कुछ औज़ारों या मशीनरी का उपयोग भी किया गया हो। ऐसी वस्तुएँ दृश्य सौंदर्य से परिपूर्ण होती हैं; इनमें विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं — सौंदर्यात्मक, कलात्मक, जातीय या सांस्कृतिक — जो इन्हें समान उपयोग वाली मशीन-निर्मित वस्तुओं से अलग बनाती हैं।
भारत विश्व के महत्वपूर्ण हस्तशिल्प आपूर्तिकर्ताओं में से एक है, और प्रामाणिक, टिकाऊ एवं हस्तनिर्मित उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग के साथ यह क्षेत्र अपनी अर्थव्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने की विशिष्ट स्थिति में है। देश के विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में कारीगर पारंपरिक कौशल और तकनीकों के साथ कार्यरत हैं, जो इस उद्योग की रीढ़ हैं। यद्यपि अधिकांश कारीगर कम पूंजी निवेश के साथ आंशिक समय के लिए इस कार्य में लगे होते हैं, फिर भी मूल्य-वर्धन अधिक होता है, जो हस्तशिल्प को आय का एक व्यवहार्य स्रोत बनाता है। यह क्षेत्र अत्यंत श्रम-प्रधान और विकेंद्रीकृत है, जो देशभर में व्यापक रूप से फैला है।
भारत की शिल्प विरासत का उत्सव
राष्ट्रीय हस्तशिल्प सप्ताह (8–14 दिसंबर) प्रतिवर्ष मनाया जाता है ताकि भारत के कारीगरों का सम्मान किया जा सके और इस क्षेत्र के सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्व को रेखांकित किया जा सके। यह सप्ताह शिल्प समुदायों के योगदान को पहचानने, पारंपरिक कौशल को प्रोत्साहित करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के इस महत्वपूर्ण हिस्से को मजबूत करने में सरकार की प्रतिबद्धता को पुष्ट करता है।
उत्कृष्ट शिल्पकला का सम्मान
इस वर्ष का एक प्रमुख आकर्षण राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार हैं, जो उत्कृष्ट शिल्प गुरुओं एवं कारीगरों को सम्मानित करते हैं। इसमें शिल्प गुरु पुरस्कार — हस्तशिल्प क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान — तथा राष्ट्रीय पुरस्कार शामिल हैं, जो विविध शिल्प विधाओं में उत्कृष्टता एवं नवाचार को दर्शाते हैं। ये पुरस्कार कारीगरों की कौशल, सृजनात्मकता और सांस्कृतिक संरक्षण की भावना का उत्सव मनाते हैं।
हस्तशिल्प क्षेत्र की आर्थिक शक्ति
रोजगार और कारीगर जनसांख्यिकी
हस्तशिल्प उद्योग बड़ी संख्या में कारीगरों को रोजगार प्रदान करता है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। वर्तमान में भारत में लगभग 64.66 लाख हैंडलूम और हस्तशिल्प कारीगर हैं, जिनका बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में केंद्रित है। अगस्त 2025 तक हैंडलूम बुनकरों में 71% और कुल कारीगरों में 64% महिलाएँ थीं। महिलाओं की यह मजबूत भागीदारी ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी समुदायों में रोजगार और सशक्तिकरण में इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका दर्शाती है।
यह क्षेत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में भी सहायक है। अधिकांश कारीगर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आते हैं। इससे पता चलता है कि हस्तशिल्प क्षेत्र समाज के विभिन्न वर्गों में समावेशी विकास और आजीविका प्रदान करने का साधन है।
हस्तशिल्प क्षेत्र कृषि-आधारित परिवारों को आंशिक या अतिरिक्त रोजगार भी प्रदान करता है, जिससे कृषि के ऑफ-सीजन में आय का स्थिर प्रवाह बना रहता है। अधिकांश शिल्प कार्य छोटे घरेलू सेटअप में और न्यूनतम पूंजी से किए जा सकते हैं, जिससे यह दूरदराज़ क्षेत्रों में आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत बन जाता है।
2024 तक, पहचान कारीगर पहचान कार्यक्रम के तहत 32 लाख से अधिक कारीगरों का पंजीकरण किया जा चुका है। इनमें से लगभग 20 लाख महिलाएँ हैं, जो ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में इस योजना की भूमिका को दर्शाता है।
सरकार हस्तशिल्प को स्थानीय गैर-कृषि रोजगार का एक प्रमुख स्रोत मानती है। पारंपरिक कौशल पीढ़ियों से हस्तांतरित होते आए हैं और अब संस्थागत सहयोग से इन्हें पहचान, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिल रहा है। पहचान कार्ड जारी करने का उद्देश्य कारीगरों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ना और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना है।
निर्यात प्रदर्शन
FY2025 (अप्रैल–सितंबर 2025) की पहली छमाही में भारत के कुल वस्त्र और परिधान (हस्तशिल्प सहित) का निर्यात 18,235.44 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। वर्ष 2024–25 में हस्तशिल्प (हाथ से बुने कालीनों को छोड़कर) का निर्यात ₹33,122.79 करोड़ तक पहुँच गया, जो 2014–15 के ₹20,082.53 करोड़ से काफी अधिक है।
2024–25 में प्रमुख निर्यात श्रेणियों में शामिल हैं:
आर्ट मेटलवेयर – ₹4,386 करोड़
वुडवेयर – ₹8,524 करोड़
हैंडप्रिंटेड टेक्सटाइल – ₹3,217 करोड़
एम्ब्रॉयडर्ड एवं क्रोशे वस्तुएँ – ₹4,350 करोड़
नकली आभूषण – ₹1,511 करोड़
अमेरिका लगभग 37% आयात के साथ प्रमुख बाजार है, जबकि 61% हस्तशिल्प अन्य वैश्विक बाजारों में जाते हैं।
सरकारी समर्थन: कारीगरों को सशक्त बनाने की दिशा में
सरकार ने हस्तशिल्प और हैंडलूम क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं। प्रमुख योजनाएँ व उनका प्रभाव इस प्रकार है:
राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम (NHDP)
स्वीकृत खर्च: ₹837 करोड़ (FY 2022–26)
2023–24 में 2,325 परियोजनाएँ स्वीकृत
66,000+ कारीगर लाभान्वित
NHDP कारीगरों को डिज़ाइन विकास, कौशल प्रशिक्षण, विपणन मंच, सामाजिक सुरक्षा, अवसंरचना और टूलकिट प्रदान करता है।
इस योजना का तीन-स्तरीय दृष्टिकोण:
प्रीमियम हस्तशिल्प उत्पादों को प्रोत्साहन
उपयोग-आधारित और जीवनशैली उत्पादों के उत्पादन का विस्तार
कारीगरों का सशक्तिकरण तथा पारंपरिक शिल्पों का संरक्षण
हस्तशिल्प क्षेत्र में कौशल विकास
NHDP के अंतर्गत कौशल विकास पहल में चार घटक शामिल हैं:
डिज़ाइन एवं तकनीक विकास कार्यशाला
गुरु-शिष्य हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम
व्यापक कौशल उन्नयन कार्यक्रम (NSQF आधारित)
सुधारित टूलकिट वितरण कार्यक्रम
समग्र हस्तशिल्प क्लस्टर विकास योजना (CHCDS)
बजट: ₹142.5 करोड़ (FY 2022–26)
उद्देश्य: विश्वस्तरीय अवसंरचना वाले क्लस्टर बनाना, उत्पादन और निर्यात बढ़ाना
SFURTI योजना
100+ हस्तशिल्प क्लस्टर पारंपरिक उद्योगों को सशक्त बनाने, उत्पादकता बढ़ाने और कारीगरों को उद्यमी बनाने पर केंद्रित हैं।
स्वावलंबी कारीगर
अंबेडकर हस्तशिल्प विकास योजना के तहत सरकार कारीगर समूहों और उत्पादक कंपनियों का गठन कर रही है।
बाज़ार तक पहुँच और वैश्विक एकीकरण
GI उत्पादों को बढ़ावा
ODOP के तहत जिलों के विशिष्ट उत्पादों का प्रचार
FY 2023–24 में 786 मार्केटिंग कार्यक्रम
FY 2025–26 के लिए 132 कार्यक्रम नियोजित
इंडी हाट एवं IITF विशेष प्रदर्शनी
इंडी हाट 2025: 85 कारीगर, 80 प्रकार के हस्तशिल्प
IITF प्रदर्शनी: 27 राज्यों के 206 स्टॉल
हैंडलूम क्षेत्र पहल
356 छोटे और 2 मेगा क्लस्टर
42,895 मुद्रा ऋण
5.34 लाख बुनकर PMJJBY/PMSBY के तहत पंजीकृत
MSME हेतु PLI योजना में सुधार
निवेश मानदंड घटाए गए हैं:
Part-1: ₹300 करोड़ → ₹150 करोड़
Part-2: ₹100 करोड़ → ₹50 करोड़
टर्नओवर मानदंड: 25% → 10%
SAMARTH योजना
5.35 लाख प्रशिक्षित
4.20 लाख को रोजगार
निर्यात संवर्धन
RoSCTL और RoDTEP योजनाएँ लागू
MSME के लिए Niryat Protsahan और Niryat Disha पहल
व्यापक नीति सुधार
जीएसटी दरों में कमी
29 श्रम कानूनों का चार श्रम संहिताओं में एकीकरण
न्यूनतम वेतन का सार्वभौमीकरण
लैंगिक भेदभाव पर रोक
कारीगरों को सामाजिक सुरक्षा में विस्तार
भारत का हस्तशिल्प क्षेत्र अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। लाखों कारीगरों की आजीविका, परंपरागत कौशल, और बढ़ती वैश्विक मांग इस क्षेत्र को अपार संभावनाएँ प्रदान करती हैं। सरकार की योजनाएँ — कौशल उन्नयन, क्लस्टर विकास, विपणन समर्थन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, और निर्यात सहायता — हस्तशिल्प क्षेत्र को मजबूत बना रही हैं।
मज़बूत नीति सहयोग, समृद्ध विरासत और कुशल कारीगरों के साथ, भारत का हस्तशिल्प क्षेत्र आने वाले वर्षों में समावेशी विकास और ग्रामीण आजीविका सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए तैयार है।


