भारत का पारंपरिक मखाना अब तेजी से वैश्विक सुपरफूड के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। भारत दुनिया में मखाना का सबसे बड़ा उत्पादक है और बिहार देश के कुल उत्पादन में करीब तीन-चौथाई हिस्सेदारी के साथ इस क्षेत्र का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
मखाना एक जलीय फसल है, जिसे मुख्य रूप से उथले तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमि में उगाया जाता है। इसके बीज को भूनने और प्रसंस्करण के बाद फोड़कर खाया जाता है। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल और असम में भी इसकी खेती प्रमुख रूप से होती है। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता, वैल्यू-एडेड उत्पादों, स्टार्टअप्स और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की बढ़ती भूमिका ने मखाना क्षेत्र को नई गति दी है।
मखाना क्षेत्र को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय बोर्ड
मखाना क्षेत्र की बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड स्थापित करने की घोषणा की थी। बोर्ड को 15 सितंबर 2025 को बिहार में औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य मखाना की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत और आधुनिक बनाना है।
सरकार ने मखाना विकास के लिए 2025-26 से 2030-31 तक ₹476.03 करोड़ के कुल परिव्यय वाली केंद्रीय क्षेत्र योजना को भी मंजूरी दी है। योजना के तहत अनुसंधान एवं नवाचार, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता, किसानों के कौशल विकास, कटाई और कटाई के बाद की प्रक्रियाओं में सुधार, वैल्यू एडिशन, ब्रांडिंग, मार्केटिंग, निर्यात और गुणवत्ता नियंत्रण पर जोर दिया जा रहा है। वर्ष 2025-26 के लिए ₹30 करोड़ और 2026-27 के लिए ₹90 करोड़ मंजूर किए गए हैं।
बिहार बना मखाना उत्पादन का केंद्र
भारत के मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी करीब तीन-चौथाई है और राज्य वैश्विक आपूर्ति का लगभग 80-85 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध कराता है। इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर बिहार में होती है। सुपौल, सहरसा और मधेपुरा जैसे कोसी बेसिन के जिले तथा मिथिला और सीमांचल क्षेत्र इसके प्रमुख उत्पादन क्षेत्र हैं।
2024-25 में भारत में मखाना का कुल उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन रहा और औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर थी। 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन और औसत उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर हो गई। बिहार में 2025-26 में उत्पादन 60,000 मीट्रिक टन रहा।
पारंपरिक तालाब आधारित खेती के साथ अब फील्ड-सिस्टम खेती और बेहतर किस्मों, जैसे स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1, को भी बढ़ावा मिल रहा है। इससे उत्पादकता बढ़ाने और खेती से जुड़े जोखिम कम करने में मदद मिली है।
घरेलू बाजार में तेजी
भारत हर साल 0.6 लाख मीट्रिक टन से अधिक मखाना पैदा करता है। इसमें से करीब 40 प्रतिशत यानी लगभग 0.23-0.25 लाख मीट्रिक टन का निर्यात किया जाता है, जबकि बाकी घरेलू बाजार में खपत होता है।
2021-22 से 2024-25 के बीच घरेलू मखाना बाजार में 17-18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, प्रीमियम उत्पादों की मांग और ब्रांडेड कंपनियों के विस्तार को इसके प्रमुख कारणों में माना गया है। बाजार के 2029-30 तक ₹11,000-12,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
देश में पॉप्ड मखाना की मासिक घरेलू खपत करीब 3,000-3,500 मीट्रिक टन है। त्योहारों के दौरान यह बढ़कर लगभग 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है। संगठित और ब्रांडेड FMCG कंपनियां हर महीने करीब 1,800-2,000 मीट्रिक टन की खपत करती हैं, जबकि ढीले और असंगठित खुदरा बाजार की हिस्सेदारी करीब 1,200-1,400 मीट्रिक टन है।
निर्यात में भी बढ़ रही हिस्सेदारी
2025 में पॉप्ड मखाना और अन्य मखाना उत्पादों के लिए अलग HSN कोड पेश किया गया, जिससे उत्पाद-विशिष्ट निर्यात आंकड़े उपलब्ध होने लगे। 2025-26 में भारत ने 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसका निर्यात मूल्य ₹192.96 करोड़ रहा।
भारत के मखाना निर्यात के प्रमुख बाजारों में अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। ये तीनों मिलकर कुल निर्यात का करीब 77 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं। वहीं जर्मनी, नेपाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे छोटे बाजारों में प्रति किलोग्राम अधिक कीमत मिलती है, जिससे प्रीमियम बाजारों में निर्यात बढ़ाने की संभावना सामने आती है।
किसानों को मिल रहा समर्थन
मखाना विकास योजना के तहत विभिन्न राज्यों में अतिरिक्त 1,010 हेक्टेयर क्षेत्र को मखाना खेती के तहत लाया गया है, जबकि 73 हेक्टेयर क्षेत्र में बीज उत्पादन कार्यक्रम चलाया गया। बेहतर उत्पादन तकनीकों के प्रदर्शन के लिए 89 फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन भी आयोजित किए गए।
किसानों के लिए सेमिनार, प्रशिक्षण और एक्सपोजर विजिट आयोजित किए गए। 2025-26 में केंद्रीय क्षेत्र की मखाना विकास योजना के तहत देशभर में 8,159 किसान लाभान्वित हुए।
पोषण से भरपूर सुपरफूड
मखाना में कार्बोहाइड्रेट, उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, आहार फाइबर तथा मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें सोडियम और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है।
मखाना को स्वास्थ्यवर्धक स्नैक के रूप में तेजी से पहचान मिल रही है। इसमें प्रति 100 ग्राम करीब 0.33 ग्राम वसा होती है और इसकी प्रोटीन पाचन क्षमता लगभग 95 प्रतिशत बताई गई है।
पारंपरिक खेती से आधुनिक वैल्यू चेन तक
मखाना की वैल्यू चेन में खेत स्तर पर तालाब की तैयारी, बीज बोना, फसल प्रबंधन और पानी से हाथ से बीज निकालना शामिल है। इसके बाद बीजों की सफाई और सुखाने के बाद उच्च तापमान पर भूनने की प्रक्रिया होती है। भुने हुए बीजों को फोड़कर पॉप्ड मखाना तैयार किया जाता है। इसके बाद पॉलिशिंग, छंटाई और ग्रेडिंग की जाती है।
अब वैल्यू एडिशन का दायरा भी बढ़ रहा है। फ्लेवर्ड मखाना, रेडी-टू-ईट स्नैक्स, मखाना आटा और अन्य उत्पाद बाजार में आ रहे हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और अतिरिक्त आय के अवसर पैदा होने की संभावना है।
अनुसंधान और तकनीक से मिल रही नई गति
राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (NRCM) मखाना क्षेत्र के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। केंद्र ने अधिक उपज वाली मखाना किस्मों और कांटारहित वाटर चेस्टनट किस्मों के विकास के साथ जल-कुशल और एकीकृत खेती प्रणालियों पर भी काम किया है। मखाना-सह-मछली पालन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
NRCM ने किसानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और विभिन्न संस्थानों को 15,824.1 किलोग्राम उच्च उपज वाले मखाना बीज वितरित किए हैं। 2012 से 2023 के बीच 3,000 से अधिक किसानों को बेहतर खेती, प्रसंस्करण और मार्केटिंग तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया तथा 24 उद्यमों को तकनीकी सहायता प्रदान की गई।
मखाना बीज वॉशर, सीड ग्रेडर, प्राथमिक रोस्टिंग मशीन, पॉपिंग मशीन और पॉप्ड मखाना ग्रेडर जैसी मशीनरी भी विकसित की गई है। इनमें से कई तकनीकों का व्यावसायिक उपयोग के लिए लाइसेंस दिया जा चुका है।
मखाना अब केवल बिहार की पारंपरिक फसल नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत के तेजी से बढ़ते कृषि-खाद्य क्षेत्रों में शामिल हो चुका है। बढ़ती घरेलू मांग, निर्यात की संभावनाओं, तकनीकी विकास और सरकारी सहायता के साथ मखाना किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और कृषि निर्यात को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
-(PIB)


