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भारत का स्पेस सेक्टर नई ऊंचाइयों पर, निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से खुल रहे नए अवसर

भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से नए दौर में प्रवेश कर रहा है। सरकार की नीतिगत सुधारों, निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी और लगातार बढ़ते निवेश के कारण देश का स्पेस इकोसिस्टम पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुआ है। इसी बदलाव का एक बड़ा उदाहरण निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 मिशन है, जिसने भारत की निजी अंतरिक्ष क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है।

भारत सरकार की भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 लागू होने के बाद निजी कंपनियों के लिए सैटेलाइट निर्माण, लॉन्च सेवाओं, स्पेस एप्लिकेशन और अन्य अंतरिक्ष गतिविधियों में काम करने के नए अवसर खुले हैं। इसका असर देश के स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी दिखाई दे रहा है। वर्ष 2014 में जहां केवल एक स्पेस स्टार्टअप था, वहीं अब इनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। साथ ही भारत की स्पेस इकोनॉमी के आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ने का अनुमान है।

विक्रम-1 क्यों है खास?

स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित विक्रम-1 भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है। यह लगभग 350 किलोग्राम तक का पेलोड लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित करने की क्षमता रखता है। इस रॉकेट में कार्बन-कॉम्पोजिट संरचना, ठोस ईंधन बूस्टर और 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है, जो भारत की निजी अंतरिक्ष तकनीक की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।

कई पेलोड को अंतरिक्ष में पहुंचाने की क्षमता

विक्रम-1 मिशन के दौरान विभिन्न ग्राहकों के पेलोड को सफलतापूर्वक लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित किया गया। इनमें पृथ्वी अवलोकन, नई अंतरिक्ष तकनीकों के परीक्षण और अंतरिक्ष मलबे के प्रबंधन से जुड़े पेलोड शामिल थे। इस मिशन ने भारत की निजी लॉन्च क्षमता का सफल प्रदर्शन किया और वैश्विक वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग में भारतीय कंपनियों की साख को मजबूत किया।

सरकार के सुधारों से बढ़ा निजी क्षेत्र का भरोसा

स्पेस सेक्टर में सुधारों के तहत सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) को एकल नियामक संस्था के रूप में मजबूत किया है, जिससे निजी कंपनियों को अनुमति प्रक्रिया आसान हुई है। साथ ही उन्हें ISRO की तकनीक, विशेषज्ञता और परीक्षण सुविधाओं तक पहुंच भी मिल रही है। इसके अलावा सरकार ने स्टार्टअप और उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए सीड फंड, वेंचर कैपिटल फंड और टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड जैसी योजनाएं भी शुरू की हैं।

निजी कंपनियां बदल रहीं भारत के स्पेस सेक्टर की तस्वीर

सरकारी सुधारों के बाद भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट मिशन का इतिहास रचा। वहीं अग्निकुल कॉसमॉस 3डी-प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक इंजन और पुन: प्रयोज्य (Reusable) लॉन्च तकनीक पर काम कर रही है। Pixxel हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट और भारत के पहले निजी राष्ट्रीय अर्थ ऑब्जर्वेशन (EO) कॉन्स्टेलेशन के विकास में अग्रणी भूमिका निभा रही है। Dhruva Space उपग्रहों के डिजाइन, निर्माण और मिशन संचालन जैसी एंड-टू-एंड सेवाएं प्रदान कर रही है, जबकि Bellatrix Aerospace उन्नत सैटेलाइट प्रोपल्शन सिस्टम और ऑर्बिटल ट्रांसफर व्हीकल विकसित कर रही है। इसके अलावा Digantara स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस (SSA) और अंतरिक्ष मलबे की निगरानी के लिए तकनीक विकसित कर रही है। इन कंपनियों की बढ़ती गतिविधियां भारत को वैश्विक वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग में मजबूत उपस्थिति दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

वैश्विक स्पेस बाजार में भारत की बढ़ती मौजूदगी

सरकार ने विदेशी निवेश (FDI) नियमों को भी उदार बनाया है, जिससे अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नई तकनीकों का विकास, वैश्विक साझेदारियां और भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।

भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता भारत

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अब केवल सरकारी अंतरिक्ष अभियानों तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी कंपनियां भी देश की अंतरिक्ष यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। विक्रम-1 की सफलता ने यह संकेत दिया है कि भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग अब केवल स्टार्टअप स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यावसायिक लॉन्च बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकारी नीतियों, निजी निवेश और तकनीकी नवाचार के मेल से आने वाले वर्षों में भारत विश्व की प्रमुख स्पेस इकोनॉमी में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।