भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भारतीय नौसेना लगातार स्वदेशी युद्धपोतों को अपने बेड़े में शामिल कर रही है। नीलगिरि, संधायक और अर्नाला श्रेणी के युद्धपोत समुद्री युद्ध, हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण और तटीय पनडुब्बी-रोधी अभियानों में नौसेना की बहुस्तरीय क्षमता का प्रतिनिधित्व करते हैं। हाल ही में आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस संशोधक, आईएनएस अग्रेय और आईएनएस महेंद्रगिरि के नौसेना में शामिल होने से भारत की समुद्री सुरक्षा, आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति को नई मजबूती मिली है।
समुद्री सुरक्षा के लिए संतुलित नौसैनिक बेड़ा
भारतीय नौसेना लगभग 11,098 किलोमीटर लंबी तटरेखा, करीब 24 लाख वर्ग किलोमीटर के विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) और देश के लगभग 90% समुद्री व्यापार की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाती है। इस दायित्व को पूरा करने के लिए नौसेना के पास बहुस्तरीय क्षमता वाला संतुलित बेड़ा है, जिसमें नीलगिरि श्रेणी के स्टील्थ फ्रिगेट, संधायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत और अर्नाला श्रेणी के पनडुब्बी-रोधी युद्धपोत अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं।
एक महीने में चार स्वदेशी युद्धपोत हुए शामिल
21 जून 2026 को कोलकाता में आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रेय को एक साथ भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। इसके बाद 11 जुलाई 2026 को विशाखापत्तनम में छठे नीलगिरि श्रेणी के स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस महेंद्रगिरि को कमीशन किया गया। इन सभी युद्धपोतों का डिजाइन भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है और इनका निर्माण भारतीय शिपयार्डों में किया गया है।
नीलगिरि श्रेणी: आधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट
प्रोजेक्ट-17ए के तहत विकसित नीलगिरि श्रेणी के स्टील्थ फ्रिगेट भारतीय नौसेना की सतही युद्ध क्षमता की रीढ़ माने जाते हैं। लगभग 149 मीटर लंबे और 6,670 टन वजनी ये युद्धपोत 28 समुद्री मील तक की गति हासिल कर सकते हैं। इनमें ब्रह्मोस मिसाइल, मध्यम दूरी की हवाई रक्षा प्रणाली, उन्नत रडार, सोनार और हेलीकॉप्टर संचालन की सुविधा है। कम रडार, थर्मल और ध्वनिक पहचान के कारण ये आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में अधिक प्रभावी साबित होते हैं।
संधायक श्रेणी: समुद्री मानचित्रण में नई ताकत
संधायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत भारतीय नौसेना की हाइड्रोग्राफिक क्षमता को मजबूत करते हैं। लगभग 110 मीटर लंबे और 3,400 टन वजनी ये पोत समुद्र तल का मानचित्रण, नौवहन चार्ट तैयार करने और समुद्री आंकड़े जुटाने का काम करते हैं। इनके जरिए सुरक्षित नौवहन, समुद्री व्यापार, ब्लू इकोनॉमी और मित्र देशों के साथ हाइड्रोग्राफिक सहयोग को बढ़ावा मिलता है। आईएनएस संशोधक इस श्रेणी का चौथा और अंतिम पोत है।
अर्नाला श्रेणी: तटीय सुरक्षा के प्रहरी
अर्नाला श्रेणी के पनडुब्बी-रोधी युद्धपोत उथले तटीय क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए विकसित किए गए हैं। करीब 77.6 मीटर लंबे और 900 टन वजनी ये पोत वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली से लैस हैं, जिससे उथले जलक्षेत्रों में इनकी संचालन क्षमता बेहतर होती है। इनमें हल्के टॉरपीडो, पनडुब्बी-रोधी रॉकेट और आधुनिक सोनार प्रणाली लगी है।
युद्ध क्षमता के साथ मानवीय अभियानों में भी अहम भूमिका
तीनों श्रेणी के युद्धपोत केवल सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं हैं। ये मानवीय सहायता, आपदा राहत, खोज एवं बचाव अभियानों के साथ सुरक्षित समुद्री परिवहन और समुद्री संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संधायक श्रेणी के पोत समुद्री मानचित्रण के जरिए ब्लू इकोनॉमी को मजबूती देते हैं, जबकि नीलगिरि और अर्नाला श्रेणी समुद्री मार्गों और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
आत्मनिर्भर भारत को मिल रही मजबूती
इन युद्धपोतों का निर्माण उच्च स्वदेशीकरण के साथ भारतीय शिपयार्डों में किया गया है। प्रोजेक्ट-17ए फ्रिगेट में लगभग 75% और संधायक श्रेणी के पोतों में 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है। इन परियोजनाओं से सैकड़ों एमएसएमई जुड़े हैं और हजारों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार का सृजन हुआ है। भारत अब युद्धपोतों के आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
सागर और महासागर विजन को मिलेगा बल
ये स्वदेशी युद्धपोत भारत की समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय सहयोग को भी मजबूत करते हैं। इनके जरिए भारत ‘सागर’ (Security and Growth for All in the Region) और ‘महासागर’ (Mutual and Holistic Advancement for Security Across the Regions) विजन को आगे बढ़ा रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता और साझेदार देशों के साथ सहयोग बढ़ाने में इन युद्धपोतों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। (इनपुट: पीआईबी )


