जैव विविधता का संरक्षण ही मानव अस्तित्व और सभ्यता के भविष्य की सुरक्षा है

मानव सभ्यता का विकास केवल विज्ञान, तकनीक, उद्योग और आर्थिक प्रगति की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और जीवन के बीच स्थापित उस अद्भुत सामंजस्य की भी गाथा है जिसने पृथ्वी को निरंतर जीवंत, संतुलित और समृद्ध बनाए रखा है। पृथ्वी पर विद्यमान सूक्ष्म जीवाणुओं से लेकर विशाल वृक्षों, रंग-बिरंगे पक्षियों, वन्यजीवों, समुद्री जीवों तथा मनुष्य तक सभी जीवन-रूप एक विशाल, जटिल और परस्पर संबद्ध जीवन-तंत्र के अभिन्न घटक हैं। इन विविध जीवन-रूपों की बहुलता, उनकी पारस्परिक निर्भरता और उनके बीच स्थापित संतुलन को ही जैव विविधता (Biodiversity) कहा जाता है।

जैव विविधता केवल जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की संख्या या प्रजातियों की विविधता तक सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की संपूर्ण जीवनदायिनी व्यवस्था का मूल आधार है। मानव जीवन के लिए आवश्यक भोजन, स्वच्छ जल, औषधियां, कृषि उत्पादन, जलवायु संतुलन और आर्थिक गतिविधियों की आधारशिला इसी जैविक समृद्धि पर टिकी हुई है। पर विडंबना यह है कि आधुनिक विकास की अंधी प्रतिस्पर्धा, प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन, बढ़ता प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को गंभीर संकट की ओर धकेल रहे हैं। परिणामस्वरूप, आज जैव विविधता का संरक्षण केवल पर्यावरणीय सरोकार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव सभ्यता के सुरक्षित भविष्य और पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता सुनिश्चित करने की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।

वैश्विक चेतना का प्रतीक

जैव विविधता के महत्व को रेखांकित करने तथा इसके संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता उत्पन्न करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र द्वारा की गई थी। प्रारंभ में इसे 29 दिसंबर को मनाया जाता था, पर बाद में वर्ष 2000 में जैव विविधता अभिसमय (Convention on Biological Diversity) को अपनाए जाने की ऐतिहासिक तिथि 22 मई 1992 के सम्मान में इसकी तिथि परिवर्तित कर दी गई।

इस दिवस के प्रमुख उद्देश्य हैं: जैव विविधता संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना। प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करना। पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने हेतु वैश्विक सहयोग को सशक्त करना। आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा करना। आज जब अनेक जीव-प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं, तब इस दिवस की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है।

जैव विविधता : अर्थ और स्वरूप

जैव विविधता का आशय पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न जीवों, उनके आनुवंशिक गुणों तथा पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता से है। इसे मुख्यतः तीन स्तरों पर समझा जाता है- आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही प्रजाति के जीवों के बीच पाए जाने वाले आनुवंशिक अंतर को आनुवंशिक विविधता कहा जाता है। यही विविधता जीवों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता प्रदान करती है। प्रजातीय विविधता (Species Diversity): किसी क्षेत्र में मौजूद विभिन्न जीव-प्रजातियों की संख्या और उनकी विविधता को प्रजातीय विविधता कहा जाता है। पारिस्थितिकी तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity): वन, घास के मैदान, नदियां, समुद्र, रेगिस्तान, पर्वतीय क्षेत्र, मैंग्रोव तथा मूंगा चट्टानें जैसे विविध पारिस्थितिक तंत्र इस श्रेणी में आते हैं।

मानव जीवन में जैव विविधता का बहुआयामी महत्व

मानव सभ्यता का अस्तित्व प्रकृति द्वारा प्रदान की गई उन सेवाओं पर आधारित है जिन्हें पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं कहा जाता है। खाद्य सुरक्षा का आधार: हमारी भोजन प्रणाली कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन तथा वन संसाधनों पर निर्भर करती है। जैव विविधता खाद्य श्रृंखला को मजबूत बनाती है और खाद्य संकट की संभावनाओं को कम करती है। औषधि और चिकित्सा में योगदान: आधुनिक चिकित्सा की अनेक महत्वपूर्ण दवाएं वनस्पतियों एवं जैविक स्रोतों से प्राप्त होती हैं। आयुर्वेद, यूनानी तथा पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां भी जैव संसाधनों पर आधारित हैं। पर्यावरणीय संतुलन का संरक्षक: जैव विविधता प्रकृति के अनेक चक्रों को नियंत्रित करती है। परागण प्रक्रिया, जल चक्र, कार्बन चक्र, पोषक तत्व चक्र, यदि इनमें व्यवधान उत्पन्न हो जाए तो संपूर्ण जीवन-तंत्र प्रभावित हो सकता है।

जलवायु नियंत्रण में भूमिका: वन पृथ्वी के प्राकृतिक “कार्बन सिंक” के रूप में कार्य करते हैं। वे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता करते हैं। आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व: कृषि, पर्यटन, वानिकी, मत्स्य पालन तथा औषधि उद्योग जैसे अनेक आर्थिक क्षेत्र जैव विविधता पर आधारित हैं। साथ ही अनेक जनजातीय और ग्रामीण समुदायों की संस्कृति एवं परंपराएं भी प्रकृति से गहराई से जुड़ी हैं।

जैव विविधता अभूतपूर्व संकट में

वर्तमान समय में जैव विविधता अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। अनेक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। वनों के तीव्र विनाश से प्राकृतिक आवास समाप्त हो रहे हैं। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तापमान वृद्धि और प्रदूषण से प्रभावित हो रहे हैं। वैज्ञानिक इसे पृथ्वी के छठे सामूहिक विलुप्तिकरण की दिशा में बढ़ता संकट मान रहे हैं। विश्व के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें जैव विविधता हॉटस्पॉट कहा जाता है, जहां जैव विविधता अत्यधिक समृद्ध है पर खतरे भी उतने ही गंभीर हैं।

भारत : जैव विविधता की वैश्विक धरोहर

भारत विश्व के मेगा-बायोडायवर्स देशों में शामिल है। विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का केवल लगभग 2.4 प्रतिशत क्षेत्र होने के बावजूद भारत वैश्विक जैव विविधता का लगभग 7-8 प्रतिशत भाग समेटे हुए है। भारत के प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट-हिमालय क्षेत्र: दुर्लभ वनस्पतियों, हिम तेंदुए और औषधीय पौधों से समृद्ध। पश्चिमी घाट: विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता क्षेत्रों में से एक। इंडो-बर्मा क्षेत्र: पूर्वोत्तर भारत का विशाल क्षेत्र, जो पक्षियों और ऑर्किड की विविधता के लिए प्रसिद्ध है। सुंडालैंड (निकोबार क्षेत्र): समृद्ध समुद्री एवं द्वीपीय जैव विविधता का केंद्र। भारत के प्रमुख वन्यजीव: बाघ, एशियाई हाथी, एक सींग वाला गैंडा, सिंह,हिम तेंदुआ।

जैव विविधता के समक्ष प्रमुख चुनौतियां

वनों की कटाई: निरंतर वनों का विनाश प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर रहा है। शहरीकरण और औद्योगीकरण: विकास की बढ़ती परियोजनाएं प्राकृतिक क्षेत्रों को सीमित कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन: तापमान वृद्धि और बदलते मौसम चक्र अनेक प्रजातियों के अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं। प्रदूषण: वायु, जल और भूमि प्रदूषण जैविक जीवन को गंभीर क्षति पहुंचा रहे हैं। अवैध शिकार और वन्यजीव तस्करी: दुर्लभ जीवों के अस्तित्व पर गंभीर संकट उत्पन्न हो रहा है। आक्रामक विदेशी प्रजातियां: बाहरी प्रजातियां स्थानीय प्रजातियों को प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेल रही हैं।

जैव विविधता ह्रास के दूरगामी प्रभाव

जैव विविधता में कमी केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य की चुनौती है। इसके प्रमुख प्रभाव: पारिस्थितिक असंतुलन, खाद्य श्रृंखला में व्यवधान, प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता में वृद्धि, मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव, आर्थिक और सामाजिक संकट।

जैव विविधता संरक्षण के वैश्विक प्रयास

विश्व स्तर पर संरक्षण हेतु अनेक पहलें की जा रही हैं। जैव विविधता अभिसमय (CBD) इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं: जैव विविधता का संरक्षण, जैव संसाधनों का सतत उपयोग, लाभों का न्यायपूर्ण वितरण, सतत विकास लक्ष्य (SDGs) संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्य संख्या 14 (जल के नीचे जीवन) और 15 (स्थल पर जीवन) जैव विविधता संरक्षण को समर्पित हैं।”30×30″ वैश्विक लक्ष्य: वर्ष 2030 तक पृथ्वी की 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों को संरक्षित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

भारत सरकार के संरक्षण का प्रयास

भारत ने जैव विविधता संरक्षण हेतु व्यापक कानूनी एवं संस्थागत व्यवस्था विकसित की है। राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम, 2002, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलीफेंट, प्रोजेक्ट डॉल्फिन, राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्य, जैवमंडल रिजर्व।

समाज और नागरिकों की भूमिका

जैव विविधता संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है; यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व भी है। हम निम्न प्रयासों से योगदान दे सकते हैं: पर्यावरणीय जागरूकता फैलाना, वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग करना, युवाओं और शैक्षणिक संस्थानों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।

भविष्य की दिशा : तकनीक और प्रकृति का संतुलन

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन, उपग्रह तकनीक तथा डेटा विश्लेषण जैव विविधता संरक्षण में नई संभावनाएं प्रस्तुत कर रहे हैं। इनके माध्यम से वन्यजीव निगरानी, वन संरक्षण तथा संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है। सतत विकास की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब मानव प्रगति और प्रकृति संरक्षण साथ-साथ चलें।

प्रकृति का संरक्षण करना ही मानवता का संरक्षण

प्रकृति और मानव का संबंध केवल उपयोगिता का नहीं, बल्कि अस्तित्व और सहअस्तित्व का गहन एवं अविभाज्य संबंध है। मानव सभ्यता का संपूर्ण विकास प्रकृति की गोद में हुआ है और उसका भविष्य भी इसी संतुलन पर निर्भर करता है। यदि जैव विविधता का निरंतर क्षरण होता रहा, तो इसका प्रभाव केवल जंगलों, नदियों, पर्वतों अथवा जीव-जंतुओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मानव जीवन की मूलभूत संरचना भी गंभीर रूप से प्रभावित होगी। वस्तुतः “प्रकृति का संरक्षण ही मानवता का संरक्षण है।”

जैव विविधता केवल पर्यावरणीय चर्चा या नीतिगत विमर्श का विषय नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के वर्तमान, भविष्य और अस्तित्व से जुड़ा हुआ एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि सरकारें, वैज्ञानिक समुदाय, सामाजिक संस्थाएं तथा आम नागरिक एक साझा दायित्व और सामूहिक संकल्प के साथ आगे आएं तथा जैव विविधता संरक्षण को एक व्यापक जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान करें। यदि हम आज प्रकृति की रक्षा के लिए संवेदनशील, जागरूक और उत्तरदायी कदम उठाएंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों को एक संतुलित, समृद्ध, हरित और सुरक्षित पृथ्वी का उपहार दे सकेंगे। क्योंकि अंततः यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि प्रकृति हमारे बिना अपना अस्तित्व बनाए रख सकती है, पर मानव प्रकृति के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।