अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस: संसद को जन आकांक्षाओं का सबसे बड़ा मंच मानते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने का संदेश देता है। अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत बनाने में संसदों की भूमिका के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाना और लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह तथा समावेशी बनाने के प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस हर वर्ष 30 जून को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2018 में इस दिवस को आधिकारिक मान्यता दी थी। यह तिथि वर्ष 1889 में अंतर-संसदीय संघ (आईपीयू) की स्थापना की याद में चुनी गई, जो दुनिया के राष्ट्रीय संसदों का सबसे पुराना वैश्विक संगठन है।

लोकतंत्र की आधारशिला है संसद

संसद किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्था मानी जाती है। यहीं कानून बनाए जाते हैं, सरकार को जवाबदेह बनाया जाता है और जनता की आकांक्षाओं तथा समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाता है। संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं है, बल्कि यह सरकार और जनता के बीच संवाद का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम भी है। यही कारण है कि मजबूत, प्रभावी और प्रतिनिधित्वपूर्ण संसद को स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान माना जाता है। 

लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने का अवसर

अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस संसदों के कामकाज की समीक्षा करने, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने और यह सुनिश्चित करने का अवसर प्रदान करता है कि संसद समय के साथ बदलती चुनौतियों के अनुरूप स्वयं को ढाल सके। इसमें महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने, नई तकनीकों के उपयोग, पारदर्शिता तथा नागरिकों की सहभागिता जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया जाता है।

भारत की संसदीय परंपरा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पहचान

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उसकी संसदीय व्यवस्था विश्व के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है। भारतीय संसद में लोकसभा और राज्यसभा शामिल हैं, जहां देश के विभिन्न राज्यों, क्षेत्रों और समाज के विविध वर्गों का प्रतिनिधित्व होता है। स्वतंत्रता के बाद से भारतीय संसद ने अनेक ऐतिहासिक कानून पारित किए हैं, जिन्होंने देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास की दिशा तय की है। भारत में नियमित और स्वतंत्र चुनाव, संसदीय समितियों की सक्रिय भूमिका, विभिन्न विषयों पर व्यापक चर्चा तथा विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच लोकतांत्रिक विमर्श संसदीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं हैं। बदलते समय के साथ संसद की कार्यप्रणाली में डिजिटल तकनीकों का उपयोग भी लगातार बढ़ा है, जिससे कार्य अधिक प्रभावी और पारदर्शी हुआ है।

नए संसद भवन ने बढ़ाई लोकतांत्रिक क्षमता

भारत ने हाल के वर्षों में नए संसद भवन के निर्माण के माध्यम से अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया है। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह भवन भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसमें सांसदों के लिए बेहतर तकनीकी संसाधन, डिजिटल व्यवस्था तथा अधिक बैठने की क्षमता उपलब्ध कराई गई है, जिससे आने वाले वर्षों में बढ़ते प्रतिनिधित्व की जरूरतों को पूरा किया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न अवसरों पर संसद को लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच बताते रहे हैं। उन्होंने सांसदों से सदन की गरिमा बनाए रखने, सार्थक चर्चा, जनहित के मुद्दों पर गंभीर विमर्श तथा विकासोन्मुख कानून बनाने की आवश्यकता पर लगातार बल दिया है। नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान भी उन्होंने इसे विकसित भारत की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक बताया था। इसके अलावा 18वीं लोकसभा के पहले सत्र से पहले भी प्रधानमंत्री मोदी ने सभी दलों से रचनात्मक सहयोग और जनहित में सार्थक चर्चा की अपील की थी। 

भारत की वैश्विक संसदीय भूमिका भी मजबूत हुई

भारत अंतर-संसदीय संघ सहित विभिन्न वैश्विक संसदीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। भारतीय सांसद जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, आतंकवाद, लैंगिक समानता, डिजिटल शासन और वैश्विक शांति जैसे विषयों पर अंतर्राष्ट्रीय संवाद में लगातार भाग लेते हैं। इससे भारत का लोकतांत्रिक अनुभव दुनिया के अन्य देशों तक पहुंचता है और वैश्विक सहयोग को भी मजबूती मिलती है।

महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिए हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। युवा सांसद भी नई सोच, तकनीकी समझ और नवाचार के साथ संसदीय विमर्श को नई दिशा दे रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र और आईपीयू भी संसदों में महिलाओं और युवाओं की अधिक भागीदारी को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक मानते हैं। 

संसदीय लोकतंत्र के सामने उभरती चुनौतियां

हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने कई चुनौतियां भी हैं। सदनों में व्यवधान, राजनीतिक ध्रुवीकरण, गलत सूचनाओं का प्रसार, नागरिकों का घटता विश्वास तथा तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियां संसदों के सामने नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रही हैं। ऐसे समय में संसदों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जन-केंद्रित बनाने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। 

लोकतंत्र को मजबूत बनाने का संदेश

अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराने का दिन है। यह याद दिलाता है कि संसद तभी प्रभावी हो सकती है जब उसमें सभी वर्गों की भागीदारी हो, संवाद की संस्कृति मजबूत हो और जनहित सर्वोच्च प्राथमिकता रहे।

भारत की लोकतांत्रिक परंपरा बनी वैश्विक मिसाल

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए यह दिवस विशेष महत्व रखता है। देश की संसदीय परंपराएं, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, तकनीकी आधुनिकीकरण और जनभागीदारी की बढ़ती संस्कृति यह दर्शाती है कि भारत लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस लोकतंत्र, जवाबदेही और जनप्रतिनिधित्व की भावना को और मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आता है।