मनुष्य की पहचान केवल उसके विचारों से नहीं, उसकी भाषा से भी बनती है। भाषा किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, इतिहास, संवेदना और जीवन-दृष्टि को अपने भीतर संजोए रखती है। दुनिया में भाषाओं की विविधता जितनी समृद्ध है, उनके बीच संवाद की आवश्यकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में अनुवाद केवल एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा में बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं, ज्ञान और सांस्कृतिक अनुभवों को एक समाज से दूसरे समाज तक पहुंचाने वाला सशक्त सेतु है। आज व्यापार, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, साहित्य, पत्रकारिता, कूटनीति और डिजिटल संचार ने दुनिया को पहले से कहीं अधिक करीब ला दिया है। इसके बावजूद भाषाई विविधता मानव सभ्यता की महत्वपूर्ण पहचान बनी हुई है। इस विविधता के बीच परस्पर समझ और संवाद स्थापित करने में अनुवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह साहित्य और ज्ञान को भाषाई सीमाओं से मुक्त करता है तथा विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं को एक-दूसरे से परिचित कराता है। हर वर्ष 30 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 मई 2017 को प्रस्ताव 71/288 के माध्यम से इसे आधिकारिक मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य अनुवादकों, दुभाषियों और भाषा विशेषज्ञों के योगदान को सम्मान देना तथा राष्ट्रों के बीच संवाद, समझ, सहयोग और शांति में उनकी भूमिका को रेखांकित करना है।
30 सितंबर का संत जेरोम से संबंध
अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस के लिए 30 सितंबर की तारीख का चयन ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह दिन संत जेरोम की स्मृति से जुड़ा है, जिन्हें अनुवादकों का संरक्षक माना जाता है। संत जेरोम ने बाइबिल के बड़े हिस्से का लैटिन में अनुवाद किया था। उन्हें ग्रीक और हिब्रू सहित कई भाषाओं का ज्ञान था और उन्होंने अपने समय में धार्मिक ग्रंथों को व्यापक पाठक समुदाय तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका निधन 30 सितंबर 420 ईस्वी को बेथलेहम में हुआ था। हालांकि अनुवाद की परंपरा संत जेरोम से कहीं पुरानी है। मानव सभ्यता के विकास के साथ ही विभिन्न भाषाओं के लोगों के बीच संवाद की जरूरत पैदा हुई और उसी के साथ अनुवाद की प्रक्रिया भी विकसित होती गई। धार्मिक ग्रंथों, व्यापारिक दस्तावेजों, राजकीय आदेशों, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के प्रसार में अनुवाद की भूमिका लगातार बढ़ती रही।
अनुवाद : केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं
अक्सर अनुवाद को एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा के शब्दों में बदलने की प्रक्रिया समझ लिया जाता है। लेकिन वास्तविक अनुवाद इससे कहीं अधिक जटिल और रचनात्मक कार्य है। एक अच्छे अनुवादक को शब्दों के साथ-साथ उनके संदर्भ, भाव, संस्कृति, शैली और उद्देश्य को भी समझना पड़ता है। उदाहरण के लिए किसी भाषा की लोकोक्ति का शाब्दिक अनुवाद दूसरी भाषा में अर्थहीन या हास्यास्पद हो सकता है। इसी तरह लोकगीत, मुहावरे, धार्मिक प्रतीक, सामाजिक संबोधन और सांस्कृतिक संकेतों का अनुवाद करते समय केवल शब्दकोश पर्याप्त नहीं होता। अनुवादक को दोनों भाषाओं के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश की समझ भी आवश्यक होती है। इस दृष्टि से अनुवाद शब्दों का नहीं, अर्थ और संवेदना का पुनर्सृजन है। मूल रचना की आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसे नई भाषा में स्वाभाविक रूप देना ही अनुवाद की वास्तविक कसौटी है।
भारत की बहुभाषी परंपरा और अनुवाद
भारत अनुवाद की दृष्टि से दुनिया के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक क्षेत्रों में से एक है। यहां भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण आधार है। संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और बाद में विकसित हुई अनेक भारतीय भाषाओं के बीच निरंतर संवाद ने भारतीय ज्ञान-परंपरा को समृद्ध किया। रामायण और महाभारत जैसी कृतियों के अनेक भाषाई रूप इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय समाज ने किसी एक भाषा या एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। अलग-अलग क्षेत्रों ने महान आख्यानों को अपनी भाषा, लोक-स्मृति और सांस्कृतिक अनुभव के अनुरूप नया रूप दिया। भक्ति आंदोलन ने भी भाषाई सीमाओं को कमजोर किया। विभिन्न क्षेत्रों के संतों और कवियों की रचनाएं अलग-अलग भाषाई समुदायों तक पहुंचीं। इस प्रक्रिया में अनुवाद और रूपांतरण ने भारतीय समाज में साझा सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया।
भारतीय भाषाओं के बीच सांस्कृतिक सेतु
भारत में अनुवाद का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहां भाषाई विविधता केवल विदेशी भाषाओं के संदर्भ में नहीं, बल्कि देश के भीतर ही अत्यंत व्यापक है। हिंदी भाषी पाठक के लिए तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बाग्ला, असमिया, मराठी, गुजराती, उड़िया, पंजाबी, कश्मीरी, मैथिली, संथाली और अन्य भाषाओं का श्रेष्ठ साहित्य अनुवाद के माध्यम से उपलब्ध होता है। इसी प्रकार भारतीय भाषाओं के पाठक विश्व साहित्य से भी परिचित होते हैं। टॉल्स्टॉय, दोस्तोयेव्स्की, शेक्सपियर, मार्केज और अन्य विश्व साहित्यकारों की रचनाओं ने अनुवाद के माध्यम से भारत के पाठकों के बीच व्यापक प्रभाव पैदा किया। दूसरी ओर प्रेमचंद, रवींद्रनाथ ठाकुर, महादेवी वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु, निर्मल वर्मा और अनेक भारतीय रचनाकारों की कृतियां अनुवाद के जरिए देश और दुनिया के अलग-अलग भाषाई समुदायों तक पहुंचीं। इस तरह अनुवाद साहित्य को सीमाओं से मुक्त करता है।
मैथिली और मिथिला की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में अनुवाद
भारत की भाषाई विविधता पर चर्चा मैथिली के उल्लेख के बिना अधूरी रहेगी। मैथिली केवल एक भाषा नहीं, बल्कि मिथिला की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा की वाहक है। विद्यापति की पदावली से लेकर लोकगीतों, लोक कथाओं, विवाह-संस्कार गीतों, पर्व-त्योहारों और लोक कलाओं तक मिथिला की सांस्कृतिक स्मृति मैथिली सहित अनेक अभिव्यक्तियों में संरक्षित है। इन रचनाओं का हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद उन्हें व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचा सकता है। लेकिन यहां अनुवादक के सामने विशेष चुनौती होती है। मिथिला के अनेक लोक शब्दों, प्रतीकों और सांस्कृतिक संदर्भों का दूसरी भाषा में हूबहू विकल्प नहीं मिलता। इसलिए अनुवादक को शब्द के साथ उसके सांस्कृतिक अर्थ को भी पाठक तक पहुंचाना पड़ता है। यही कारण है कि क्षेत्रीय भाषाओं के अनुवाद को केवल साहित्य के विस्तार के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और विरासत के दस्तावेजीकरण के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
ज्ञान-विज्ञान के प्रसार का माध्यम
अनुवाद का क्षेत्र साहित्य से बहुत आगे है। विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, कानून, अर्थशास्त्र, प्रौद्योगिकी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में ज्ञान के व्यापक प्रसार के लिए अनुवाद आवश्यक है। यदि किसी देश में वैज्ञानिक शोध केवल एक भाषा में उपलब्ध हो और दूसरी भाषाओं के विद्यार्थी या आम नागरिक उसे समझ न सकें, तो ज्ञान का प्रसार सीमित हो जाता है। इसलिए मातृभाषाओं और स्थानीय भाषाओं में वैज्ञानिक एवं शैक्षिक सामग्री उपलब्ध कराना ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। संयुक्त राष्ट्र भी भाषाओं को शिक्षा, सामाजिक समावेशन, सांस्कृतिक विविधता, विकास और ज्ञान-समाज के निर्माण से जोड़ता है। उसके अनुसार बहुभाषिकता सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और विज्ञान-तकनीक के लाभों को समाज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पत्रकारिता में अनुवाद की जिम्मेदारी
समाचार जगत में अनुवाद की भूमिका अत्यंत संवेदनशील है। अंतरराष्ट्रीय घटनाओं, वैज्ञानिक उपलब्धियों, आर्थिक नीतियों, युद्ध, कूटनीति और वैश्विक संस्थाओं से संबंधित समाचार अक्सर दूसरी भाषाओं से स्थानीय भाषाओं में आते हैं। यहां एक शब्द का गलत अर्थ पूरे समाचार का अर्थ बदल सकता है। पत्रकारिता में इसलिए अनुवादक को भाषा ज्ञान के साथ विषय की समझ भी होनी चाहिए। किसी राजनयिक बयान, कानूनी दस्तावेज या वैज्ञानिक रिपोर्ट का अनुवाद करते समय संदर्भ की छोटी-सी गलती भी पाठकों तक गलत सूचना पहुंचा सकती है। डिजिटल मीडिया के दौर में समाचार तेजी से प्रकाशित करने का दबाव बढ़ा है। ऐसे में गति और शुद्धता के बीच संतुलन अनुवाद की बड़ी चुनौती बन गया है।
कूटनीति और वैश्विक संवाद में अनुवाद
संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद के लिए अनुवादक, दुभाषिए और पारिभाषिक विशेषज्ञ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंतरराष्ट्रीय बैठकों, समझौतों और कूटनीतिक वार्ताओं में भाषा की सटीकता केवल भाषाई आवश्यकता नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व भी रखती है। संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस के संदर्भ में स्पष्ट किया है कि भाषा-पेशेवर राष्ट्रों को जोड़ने, संवाद और समझ को बढ़ाने, विकास में योगदान देने तथा शांति और सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए अनुवाद को वैश्विक कूटनीति की एक अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण आधारभूत व्यवस्था भी कहा जा सकता है।
अनुवाद और सांस्कृतिक संवाद
एक भाषा में मौजूद किसी संस्कृति के अनुभव को दूसरी भाषा में पहुंचाना वास्तव में दो समाजों के बीच संवाद स्थापित करना है। किसी देश का साहित्य पढ़ने से वहां के लोगों की सोच, जीवन शैली, सामाजिक संबंध और इतिहास को समझने का अवसर मिलता है। इसीलिए अनुवाद सांस्कृतिक दूरी कम करता है। वह यह समझने में सहायता करता है कि अलग-अलग समाजों की जीवन-पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं, लेकिन मानवीय अनुभवों में अनेक समानताएं भी मौजूद हैं। प्रेम, करुणा, संघर्ष, आशा, परिवार, प्रकृति और सामाजिक न्याय जैसे विषय किसी एक भाषा तक सीमित नहीं हैं। अनुवाद इन साझा मानवीय अनुभवों को अलग-अलग भाषाओं के पाठकों तक पहुंचाता है।
अनुवादक : भाषा का अदृश्य सेतु
किसी अनुवादित पुस्तक को पढ़ते समय पाठक अक्सर लेखक को याद करता है, लेकिन अनुवादक के श्रम पर अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है। जबकि अनुवादक को मूल रचना के अर्थ, शैली, संदर्भ और संवेदना को समझकर दूसरी भाषा में नए सिरे से प्रस्तुत करना पड़ता है। एक साहित्यिक अनुवादक को लेखक की आवाज को बनाए रखते हुए नई भाषा में स्वाभाविक प्रवाह पैदा करना होता है। तकनीकी अनुवादक को शब्दावली की सटीकता सुनिश्चित करनी होती है। दुभाषिए को कई बार कुछ ही क्षणों में कही गई बात को दूसरी भाषा में पहुंचाना पड़ता है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस भाषा-पेशेवरों के योगदान को सार्वजनिक रूप से पहचानने का अवसर भी है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में बदलता अनुवाद
डिजिटल तकनीक ने अनुवाद की दुनिया को तेजी से बदल दिया है। मशीन ट्रांसलेशन, न्यूरल मशीन ट्रांसलेशन, ऑनलाइन शब्दकोश, ट्रांसलेशन मेमोरी और अब जनरेटिव एआई ने अनुवाद की प्रक्रिया को तेज और अधिक सुलभ बनाया है। आज कुछ ही सेकंड में किसी पाठ का प्रारंभिक अनुवाद प्राप्त किया जा सकता है। इससे शिक्षा, व्यापार, पर्यटन, डिजिटल सामग्री और अंतरराष्ट्रीय संचार के नए अवसर खुले हैं। लेकिन मशीनी अनुवाद की गति को मानवीय समझ का पूर्ण विकल्प नहीं माना जा सकता। मुहावरे, व्यंग्य, स्थानीय संस्कृति, लोकविश्वास, साहित्यिक शैली और संदर्भगत अर्थ को समझना अब भी कठिन कार्य है। एक ही शब्द का अर्थ परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है। यही कारण है कि वर्तमान समय में प्रश्न केवल यह नहीं है कि AI अनुवाद करेगा या मानव, बल्कि यह भी है कि मानव विशेषज्ञ और AI मिलकर अधिक विश्वसनीय अनुवाद कैसे तैयार कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस 2025 के लिए इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ट्रांसलेटर्स ने भी मानव विश्वास और AI-निर्मित पाठ तथा मशीनी अनुवाद की मानवीय निगरानी के महत्व को रेखांकित किया था।
2026 : भाषाई विविधता और भाषा-अधिकार का प्रश्न
अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस 2026 के लिए इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ट्रांसलेटर्स का विषय “Linguistic Diversity and Language Rights” है, जिसका केंद्र भाषाई समावेशन और यह विचार है कि हर व्यक्ति को समझे जाने का अधिकार है। यह विषय वर्तमान समय में विशेष महत्व रखता है। डिजिटल दुनिया में कुछ बड़ी भाषाओं का प्रभुत्व बढ़ रहा है, जबकि अनेक छोटी और क्षेत्रीय भाषाओं के पास डिजिटल संसाधन अपेक्षाकृत सीमित हैं। यदि किसी भाषा के लिए पर्याप्त डिजिटल सामग्री, शब्दकोश, कॉर्पस और तकनीकी संसाधन उपलब्ध न हों, तो आने वाली पीढ़ियों के डिजिटल जीवन में उसका प्रतिनिधित्व कमजोर हो सकता है। इसलिए भाषाई विविधता की रक्षा केवल साहित्यिक या सांस्कृतिक प्रश्न नहीं है। यह भाषाई अधिकार, शिक्षा, सूचना तक पहुंच और डिजिटल समानता का भी प्रश्न है।
भारतीय भाषाओं के लिए डिजिटल भविष्य की चुनौती
भारत जैसे बहुभाषी देश में AI और डिजिटल अनुवाद एक बड़ा अवसर प्रस्तुत करते हैं। यदि भारतीय भाषाओं के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण डिजिटल संसाधन तैयार किए जाएं, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, शासन और रोजगार संबंधी सूचनाएं अधिक लोगों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंच सकती हैं। लेकिन इसके लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है। उच्च गुणवत्ता वाले भाषाई डेटाबेस, समानांतर कॉर्पस, पारिभाषिक शब्दावली, मानकीकृत डिजिटल सामग्री और भाषा विशेषज्ञों की भागीदारी भी आवश्यक है। विशेष रूप से मैथिली, भोजपुरी, मगही, अवधी, संथाली और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए डिजिटल भाषा-संसाधनों का विकास भाषाई विविधता को भविष्य के डिजिटल संसार में सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
अनुवाद के बढ़ते क्षेत्र और रोजगार की नई संभावनाएं
अनुवाद अब केवल पुस्तकें और दस्तावेजों तक सीमित पेशा नहीं है। OTT प्लेटफॉर्म, फिल्मों और वेब सीरीज के लिए सबटाइटलिंग और डबिंग, गेमिंग, सॉफ्टवेयर लोकलाइजेशन, पर्यटन, ई-कॉमर्स, कानूनी सेवाएं, चिकित्सा, तकनीकी दस्तावेज और डिजिटल सामग्री ने अनुवाद के नए क्षेत्र खोले हैं। AI के विकास के साथ अनुवादक की भूमिका भी बदल रही है। अब कई क्षेत्रों में मशीन द्वारा तैयार प्रारंभिक अनुवाद की समीक्षा, संपादन और सांस्कृतिक अनुकूलन की आवश्यकता होती है। इससे भाषा विशेषज्ञों के लिए पोस्ट-एडिटिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और भाषाई परामर्श जैसी नई भूमिकाएं विकसित हो रही हैं।
अनुवाद में नैतिकता और कॉपीराइट
अनुवाद के साथ कुछ महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न भी जुड़े हैं। मूल लेखक के अधिकारों का सम्मान, अनुवादक को उचित श्रेय, कॉपीराइट का संरक्षण और मूल रचना की भावना के प्रति ईमानदारी आवश्यक है। AI के बढ़ते उपयोग ने इन प्रश्नों को और जटिल बनाया है। यदि किसी साहित्यिक रचना का मशीनी अनुवाद किया जाता है, तो उसके कॉपीराइट, संपादन, प्रकाशन और अनुवादक की भूमिका से जुड़े प्रश्नों पर स्पष्टता जरूरी होगी। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ट्रांसलेटर्स ने 2024 में भी अनुवाद को एक कला के रूप में संरक्षित करने के साथ कॉपीराइट और अनुवादकों की आजीविका की सुरक्षा के प्रश्न को प्रमुखता दी थी।
भाषाई लोकतंत्र की दिशा में अनुवाद
लोकतंत्र केवल राजनीतिक भागीदारी का नाम नहीं है। नागरिकों को सूचना और ज्ञान उनकी समझ की भाषा में उपलब्ध होना भी लोकतांत्रिक समाज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, कानूनी अधिकारों, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी सूचनाएं यदि अनेक भाषाओं में उपलब्ध हों, तो समाज के अधिक व्यापक वर्ग तक पहुंच संभव होती है। इस अर्थ में अनुवाद भाषाई लोकतंत्र को मजबूत करता है। वह उन लोगों को भी ज्ञान और सूचना की मुख्यधारा से जोड़ता है, जिनकी मातृभाषा वैश्विक या राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख भाषाओं में शामिल नहीं है।
भविष्य : मानव संवेदना और तकनीक का संतुलन
अनुवाद का भविष्य केवल मशीनों के हाथ में नहीं है। तकनीक गति और व्यापकता दे सकती है, लेकिन भाषा में निहित सांस्कृतिक स्मृति, स्थानीय अनुभव और मानवीय संवेदना को समझने के लिए मानव विशेषज्ञता की आवश्यकता बनी रहेगी। भविष्य में पाठ से पाठ के अलावा आवाज से आवाज में तत्काल अनुवाद, लाइव सम्मेलन अनुवाद, वीडियो और मल्टीमीडिया सामग्री का स्वचालित रूपांतरण जैसी तकनीकें अधिक विकसित हो सकती हैं। इससे भाषा की बाधाएं और कम होंगी। लेकिन तकनीकी सुविधा के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि दुनिया की छोटी भाषाएं और बोलियां इस प्रक्रिया में पीछे न छूट जाएं। तकनीक का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब वह भाषाई विविधता को कम करने के बजाय उसे अधिक सशक्त बनाए।
शब्दों से आगे संस्कृतियों का संवाद
अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भाषाएं मानव समाज को अलग-अलग पहचान देती हैं, लेकिन अनुवाद उन्हें संवाद की साझा भूमि प्रदान करता है। यह साहित्य को सीमाओं से बाहर ले जाता है, विज्ञान और शिक्षा के ज्ञान को व्यापक बनाता है, पत्रकारिता को वैश्विक घटनाओं से जोड़ता है और कूटनीति को संवाद की भाषा देता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद केवल साहित्यिक आदान-प्रदान नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत की खोज है। मैथिली जैसी भाषाओं के लिए यह अपनी लोक-स्मृति, साहित्य और सांस्कृतिक पहचान को व्यापक दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम भी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने अनुवाद के सामने नई संभावनाएं और नई चुनौतियां दोनों रखी हैं। आने वाले समय में मशीनें अनुवाद को अधिक तेज बना सकती हैं, लेकिन भाषा की गहराई, संदर्भ और मानवीय संवेदना को समझने के लिए मानव विवेक की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। इसलिए अनुवाद का भविष्य मानव और तकनीक के संतुलित सहयोग में दिखाई देता है। जरूरत इस बात की है कि तकनीकी विकास के साथ भाषाई विविधता और भाषा-अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की जाए। अंततः अनुवाद किसी एक भाषा को दूसरी भाषा में बदलने की प्रक्रिया भर नहीं है। यह एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से, एक समाज को दूसरे समाज से और एक सभ्यता को दूसरी सभ्यता से जोड़ने वाली रचनात्मक प्रक्रिया है। जब दुनिया अनेक भाषाओं में बोलती है, तब अनुवाद ही वह सेतु है जो उन आवाजों को एक-दूसरे तक पहुंचाता है। यही अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस का सबसे व्यापक और मानवीय संदेश है।


