सिर्फ उत्पादन नहीं, अब ग्रीन माइनिंग और स्थानीय लोगों के हित भी प्राथमिकता में; नई नीतियों से बदल रही कोयला क्षेत्र की तस्वीर

केंद्र सरकार अब कोयला उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सतत खनन पर भी जोर दे रही है। सरकार का कहना है कि कोयला और लिग्नाइट खानों में उत्पादन के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए कई नई पहल शुरू की गई हैं।

धूल और प्रदूषण पर नियंत्रण

सरकार के अनुसार, खनन क्षेत्रों में धूल प्रदूषण कम करने के लिए फॉग कैनन, मिस्ट स्प्रिंकलर, मोबाइल वॉटर स्प्रिंकलर, रोबोटिक वॉटर स्प्रेयर, मैकेनिकल रोड स्वीपर और व्हील वॉशिंग सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा, सड़क परिवहन कम कर मशीनीकृत कोयला परिवहन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

वृक्षारोपण और पर्यावरण पार्क

कोयला कंपनियां खनन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, जैविक पुनर्ग्रहण और पर्यावरण पार्क विकसित कर रही हैं। खदानों से निकले पानी का सामुदायिक उपयोग भी बढ़ाया जा रहा है, ताकि स्थानीय लोगों को इसका लाभ मिल सके।

आधुनिक तकनीक होगी अनिवार्य

सरकार ने वाणिज्यिक कोयला खनन करने वाली कंपनियों के लिए आधुनिक मशीनीकृत तकनीकों को अपनाना अनिवार्य किया है। साथ ही, कार्बन उत्सर्जन कम करने, पर्यावरणीय प्रदूषण घटाने और उद्योग के बेहतर मानकों के अनुरूप खनन संचालन सुनिश्चित करने की शर्त भी रखी गई है।

भूमिगत खनन को बढ़ावा

विस्फोट-मुक्त खनन तकनीकों, भूमिगत खनन और वैज्ञानिक तरीके से खदानों को बंद करने जैसी पहलों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार का मानना है कि इससे पर्यावरणीय प्रभाव कम होगा और खनन अधिक सुरक्षित बनेगा।

विस्थापितों के पुनर्वास पर फोकस

सरकार ने कहा है कि खनन परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन से जुड़े सभी लाभ कानून के तहत दिए जाते हैं। मुआवजे और पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति करती है, जिससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।

बिना मुआवजे नहीं होगा कब्जा

सरकार के मुताबिक, प्रभावित परिवारों को निर्धारित मुआवजा और पुनर्वास लाभ दिए बिना भूमि पर कब्जा नहीं लिया जाता। सरकार का कहना है कि कोयला क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों को भी समान प्राथमिकता दी जा रही है।