राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु बुधवार को नई दिल्ली में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा आयोजित मानवाधिकार दिवस समारोह में शामिल हुईं। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मानवाधिकार दिवस हमें यह याद दिलाता है कि सार्वभौमिक मानवाधिकार अविभाज्य हैं और वे एक न्यायपूर्ण, समतामूलक तथा करुणामय समाज की आधारशिला हैं।
मानवाधिकारों के वैश्विक ढांचे को आकार देने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि 70 वर्ष पहले विश्व ने एक सरल, लेकिन क्रांतिकारी सत्य को स्वीकार किया था- प्रत्येक मनुष्य गरिमा और अधिकारों में स्वतंत्र एवं समान पैदा होता है। मानवाधिकारों के वैश्विक ढांचे को आकार देने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने मानवीय गरिमा, समानता और न्याय पर आधारित विश्व व्यवस्था की कल्पना की थी।
सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए
उन्होंने अंत्योदय के दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि वंचित और कमजोर वर्गों सहित सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने बल दिया कि 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के मार्ग में प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है, तभी विकास को सही मायनों में समावेशी कहा जा सकेगा।
मानवाधिकार हमारे संविधान की मूल भावना में निहित
राष्ट्रपति ने कहा कि मानवाधिकार हमारे संविधान की मूल भावना में निहित हैं और सामाजिक लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। इनमें भयमुक्त जीवन, निर्बाध शिक्षा, शोषण से मुक्त होकर काम करने का अधिकार और गरिमापूर्ण वृद्धावस्था जैसे अधिकार शामिल हैं। भारत ने विश्व को यह याद दिलाया है कि मानवाधिकारों को विकास से अलग नहीं किया जा सकता। साथ ही, भारत सदैव इस सिद्धांत पर कायम रहा है कि “न्याय के बिना शांति नहीं और शांति के बिना न्याय नहीं।”
संवैधानिक मूल्यों के सतर्क प्रहरी
उन्होंने यह जानकर संतोष व्यक्त किया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग, न्यायपालिका और नागरिक समाज- सभी ने मिलकर संवैधानिक मूल्यों के सतर्क प्रहरी के रूप में कार्य किया है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में आयोग ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों, महिलाओं और बच्चों से जुड़े अनेक मामलों का स्वतः संज्ञान लिया है।
राष्ट्रपति ने यह भी उल्लेख किया कि आयोग ने इस वर्ष अपने स्थापना दिवस पर कैदियों के मानवाधिकारों पर महत्वपूर्ण चर्चा आयोजित की, जिससे उपयोगी निष्कर्ष निकलने की उम्मीद है।
महिलाओं का सशक्तिकरण और उनका कल्याण मानवाधिकारों के प्रमुख स्तंभों में से एक
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण और उनका कल्याण मानवाधिकारों के प्रमुख स्तंभों में से एक है। उन्होंने खुशी व्यक्त की कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सार्वजनिक और कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर सम्मेलन आयोजित किया है। उनके अनुसार, ऐसे सम्मेलनों से प्राप्त सुझाव महिलाओं की सुरक्षा एवं सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग राज्य और समाज के आदर्शों को मूर्त रूप देता है
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग राज्य और समाज के आदर्शों को मूर्त रूप देता है। भारत सरकार भी इन आदर्शों को अभूतपूर्व पैमाने पर लागू कर रही है। पिछले एक दशक में देश ने विशेषाधिकारों से सशक्तिकरण और दान से अधिकार आधारित दृष्टिकोण की ओर महत्वपूर्ण बदलाव देखा है। सरकार स्वच्छ जल, बिजली, खाना पकाने की गैस, स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग, शिक्षा और स्वच्छता जैसी सुविधाएं हर नागरिक तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है, जिससे परिवारों का उत्थान हो रहा है और उनकी गरिमा सुनिश्चित हो रही है।
व्यापक सुधार भविष्य के अनुरूप कार्यबल और अधिक मजबूत उद्योगों की नींव तैयार करता है
राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार ने हाल ही में वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों से संबंधित चार श्रम संहिताओं को अधिसूचित किया है। यह व्यापक सुधार भविष्य के अनुरूप कार्यबल और अधिक मजबूत उद्योगों की नींव तैयार करता है।
मानवाधिकार केवल सरकार, एनएचआरसी या नागरिक समाज संगठनों की जिम्मेदारी नहीं
समारोह के अंत में राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि मानवाधिकार केवल सरकार, एनएचआरसी या नागरिक समाज संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है। अपने नागरिकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना हम सभी का साझा कर्तव्य है। एक दयालु और जिम्मेदार समाज के सदस्य के रूप में यह दायित्व हम सबको निभाना होगा। (इनपुट: आईएएनएस)


