केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेन्द्र सिंह ने मंगलवार को कोलकाता स्थित इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस (आईएसीएस) के 150वें वर्षगांठ समारोह में भाग लिया। यह वही ऐतिहासिक संस्थान है, जहां सी. वी. रमन ने “रमन प्रभाव” पर अपना शोध कार्य किया था, जिसके लिए भारत को विज्ञान का पहला नोबेल पुरस्कार मिला था।
भारत के वैज्ञानिक उदय का प्रतीक है आईएसीएस
जितेन्द्र सिंह ने कहा कि आईएसीएस की यात्रा भारत के वैज्ञानिक उदय और विकास की कहानी को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि 1876 में महेन्द्रलाल सरकार द्वारा स्थापित यह संस्थान स्वतंत्रता पूर्व भारत के वैज्ञानिक जागरण और स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक प्रगति का जीवंत प्रतीक रहा है। उन्होंने कहा कि जगदीश चन्द्र बोस, मेघनाद साहा, सत्येन्द्र नाथ बोस और सी. वी. रमन जैसे महान वैज्ञानिकों ने यहां कार्य किया और भारतीय विज्ञान को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि महेन्द्रलाल सरकार और सी. वी. रमन की विरासत विकसित भारत 2047 की दिशा में देश की वैज्ञानिक यात्रा को प्रेरित करती रहेगी।
स्वदेशी सोलर-सेल निर्माण सुविधा का उद्घाटन
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने आईएसीएस परिसर में विकसित स्वदेशी प्लाज़्मा एन्हांस्ड केमिकल वेपर डिपोजिशन (पीईसीवीडी) प्रणाली का उद्घाटन किया। इस तकनीक का उपयोग भारत की पहली एमॉर्फस सिलिकॉन सोलर सेल के निर्माण में किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और नवाचार क्षमता का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि अशोक कुमार बरूआ द्वारा विकसित यह प्रणाली भारत की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान देगी।
आरईटीआईएनए इनक्यूबेशन सेंटर की शुरुआत
केंद्रीय मंत्री ने संस्थान के नए इनक्यूबेशन सेंटर “आरईटीआईएनए” – रिसर्च एंटरप्रेन्योरशिप फॉर ट्रांसलेशन, इनोवेशन एंड नेविगेशन – का भी उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि भारत के वैज्ञानिक संस्थान अब मौलिक अनुसंधान को स्टार्टअप, उद्यमिता और सामाजिक उपयोग से जोड़ने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में भारतीय विज्ञान की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को आम लोगों के लिए उपयोगी और किफायती समाधान में कितनी तेजी से बदला जा सके।
रमन प्रभाव की विरासत आज भी प्रेरणास्रोत
जितेन्द्र सिंह ने कहा कि आईएसीएस में “रमन प्रभाव” की खोज भारतीय विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है और यह आज भी वैज्ञानिकों की नई पीढ़ी को प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी आईएसीएस ने भौतिक विज्ञान, जैविक विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, कम्प्यूटेशनल विज्ञान और बहुविषयक प्रौद्योगिकियों में वैश्विक स्तर के योगदान दिए हैं।
उभरते वैज्ञानिक क्षेत्रों में हो रहा उल्लेखनीय कार्य
केंद्रीय मंत्री ने क्वांटम मैटेरियल्स, नैनोप्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बैटरी मैटेरियल्स, कैंसर जीवविज्ञान और पर्यावरणीय प्रौद्योगिकियों जैसे क्षेत्रों में आईएसीएस के कार्यों की सराहना की। उन्होंने ड्यूचेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के उपचार, विषैले अपशिष्टों के निवारण, फोटोडिटेक्टर्स, बायोसेंसर और स्थायी ऊर्जा सामग्री से जुड़े शोध कार्यों का भी उल्लेख किया।
विकसित भारत 2047 की दिशा में वैज्ञानिक संस्थानों की भूमिका अहम
जितेन्द्र सिंह ने कहा कि भारत के वैज्ञानिक संस्थान अब विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप परिवर्तनकारी दौर में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नवाचार, शिक्षाविद्, उद्योग और स्टार्टअप के संयुक्त प्रयास भारत को ज्ञान-आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करेंगे। उन्होंने स्कूली छात्रों, महिलाओं और ग्रामीण समुदायों के लिए आईएसीएस द्वारा चलाए जा रहे वैज्ञानिक जागरूकता कार्यक्रमों की भी सराहना की। (इनपुट: पीआईबी)


