किशोर कुमार : आवाज़ की वह जादुई दुनिया, जो आज भी लोगों के दिलों पर राज करती है

“जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर… कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं…”“चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना…”ये पंक्तियां केवल गीतों के बोल नहीं, बल्कि जीवन की अनिश्चितताओं, मानवीय संवेदनाओं और स्मृतियों में अमर रहने वाली कला का भावपूर्ण प्रतिबिंब हैं। किशोर कुमार की आवाज में जब ये शब्द गूंजते हैं, तो लगता है मानो जीवन के अनकहे अनुभवों को स्वर मिल गया हो। उनकी गायकी में प्रेम की कोमलता, विरह की वेदना, हास्य की खनक और जीवन-दर्शन की गहराई एक साथ अनुभव होती है। यही विलक्षणता उन्हें भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।13 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस महान कलाकार की संगीतमय विरासत को नमन करना है, जिसकी आवाज समय की सीमाओं को पार कर आज भी करोड़ों दिलों में बसी है। किशोर कुमार केवल एक लोकप्रिय पार्श्वगायक नहीं थे, बल्कि अभिनेता, संगीतकार, गीतकार, निर्माता और निर्देशक के रूप में भी उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। मौलिकता, प्रयोगधर्मिता और सहज अभिव्यक्ति उनकी कला के ऐसे गुण थे, जिन्होंने उन्हें अलग पहचान दिलाई। उनकी सबसे बड़ी खूबी गीत के शब्दों में छिपी भावनाओं को जीवंत कर देना थी। वे कभी प्रेम की मिठास से मन को सराबोर करते, तो कभी विरह की पीड़ा से आंखें नम कर देते थे। उनके गीतों में जीवन के उल्लास, अकेलेपन, उम्मीदों और अधूरे सपनों की झलक मिलती है। यही कारण है कि उनकी आवाज आज भी पुरानी स्मृतियों को जगाती है और नई पीढ़ी को भी उतनी ही आत्मीयता से जोड़ती है। किशोर कुमार भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत सचमुच यही कहते हैं-चलते-चलते हमें याद रखना, कभी अलविदा न कहना।

खंडवा से मुंबई तक : आभास कुमार गांगुली की संगीत यात्रा

4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर कुमार का मूल नाम आभास कुमार गांगुली था। उनके बड़े भाई अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के प्रतिष्ठित अभिनेता थे। हालांकि, किशोर कुमार ने अपनी प्रतिभा, मेहनत और प्रयोगधर्मिता के बल पर फिल्म जगत में अलग पहचान बनाई। बचपन से ही संगीत और अभिनय के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। औपचारिक शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण के बजाय उन्होंने गीतों को सुनकर, अभ्यास करके और नए प्रयोगों के माध्यम से अपनी गायकी को निखारा। उनकी आवाज में सुर, लय और भावों का अनूठा संगम था, जिसने उन्हें दूसरे गायकों से अलग पहचान दिलाई। खंडवा से मुंबई तक का उनका सफर संघर्ष, रचनात्मकता और आत्मविश्वास की कहानी है। हिंदी सिनेमा में पहले से स्थापित कलाकारों के बीच उन्होंने अपनी विशिष्ट गायन शैली, सहज हास्यबोध और बहुमुखी प्रतिभा से दर्शकों और श्रोताओं का दिल जीता। गायक होने के साथ-साथ वे अभिनेता, संगीतकार और फिल्म निर्माता के रूप में भी सक्रिय रहे। सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बावजूद खंडवा से उनका भावनात्मक जुड़ाव बना रहा। उनका जीवन बताता है कि प्रतिभा और परिश्रम के साथ अपनी जड़ों से जुड़ाव भी व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है।

अभिनय से पार्श्वगायन तक : प्रतिभा के अनेक आयाम

किशोर कुमार की पहचान भले ही एक महान पार्श्वगायक के रूप में रही हो, लेकिन उनकी शुरुआती फिल्मी यात्रा में अभिनय का भी महत्वपूर्ण योगदान था। पर्दे पर उन्होंने हास्य, चंचलता और भावनात्मक सहजता का ऐसा अनूठा मेल प्रस्तुत किया, जिसने उन्हें अपने दौर के अन्य कलाकारों से अलग पहचान दिलाई। ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘पड़ोसन’, ‘हाफ टिकट’ और ‘झुमरू’ जैसी फिल्मों में उनकी अभिनय प्रतिभा के विविध रंग देखने को मिलते हैं। संवाद अदायगी, चेहरे के भावों और शारीरिक मुद्राओं से वे दृश्यों को जीवंत बना देते थे। उनका हास्य स्वाभाविक था, इसलिए उनके कई दृश्य आज भी दर्शकों को गुदगुदाते हैं। बाद में पार्श्वगायन उनकी सबसे बड़ी पहचान बना। देव आनंद, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेताओं के लिए गाए गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी। किशोर कुमार की विशेषता थी कि वे हर पात्र और परिस्थिति के अनुरूप आवाज का अंदाज बदल लेते थे। उनके स्वरों में कहीं प्रेम की बेचैनी, कहीं जीवन का उल्लास और कहीं अकेलेपन की गहरी कसक सुनाई देती थी। अभिनय और गायन का यही अनूठा संगम उन्हें हिंदी सिनेमा का बहुमुखी कलाकार बनाता है।

आवाज की विशिष्टता : सहजता, भावाभिव्यक्ति और प्रयोग

किशोर कुमार की गायकी की असली विशेषता गीतों को भावनाओं से भर देने की क्षमता थी। उनकी आवाज में स्वाभाविकता, खुलापन और अनूठा आकर्षण था। वे रोमांटिक गीतों में कोमलता, तेज लय वाली रचनाओं में ऊर्जा और उदासी भरे गीतों में स्वर के ठहराव से श्रोताओं के मन को छू लेते थे। उनकी गायकी की विशिष्ट पहचान योडलिंग भी थी। इस तकनीक में आवाज के अलग-अलग स्वर-क्षेत्रों के बीच तेजी से बदलाव किया जाता है। किशोर कुमार ने इसे अपनी शैली का हिस्सा बनाकर हिंदी फिल्म संगीत में लोकप्रियता दिलाई। इससे उनकी गायकी को विशिष्ट पहचान मिली। उनकी एक और खूबी थी शब्दों की स्पष्टता और भावों के अनुरूप प्रस्तुति। वे गीत के बोलों के अर्थ को अपनी आवाज के माध्यम से जीवंत कर देते थे, जिससे साधारण शब्द भी गहरा प्रभाव छोड़ते थे। गीत की प्रकृति के अनुसार गायकी का अंदाज बदलने की उनकी क्षमता अद्भुत थी। इसी लचीलेपन के कारण वे प्रेम, हास्य, विरह, दार्शनिक चिंतन और उल्लास जैसे विविध भावों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर सके। यही बहुरंगी प्रतिभा उन्हें हिंदी सिनेमा का विशिष्ट पार्श्वगायक बनाती है।

हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर और किशोर कुमार

किशोर कुमार का संगीत सफर उस दौर में विकसित हुआ, जब हिंदी फिल्म संगीत शास्त्रीय परंपराओं, लोक धुनों, गजल और पश्चिमी संगीत के प्रभाव से नए प्रयोग कर रहा था। इस बदलते परिवेश में उन्होंने अपनी विशिष्ट गायकी से अलग पहचान बनाई। उनके समकालीन मोहम्मद रफी, मुकेश और मन्ना डे जैसे महान गायकों ने भी फिल्म संगीत को समृद्ध किया। रफी की बहुमुखी प्रतिभा, मुकेश की भावपूर्ण आवाज और मन्ना डे की शास्त्रीय संगीत पर पकड़ के बीच किशोर कुमार ने सहजता, युवापन, ऊर्जा और प्रयोगधर्मिता का अनूठा रंग जोड़ा। उनकी लोकप्रियता विशेष रूप से उस समय बढ़ी, जब फिल्मों में युवा नायकों और रोमांटिक कहानियों का प्रभाव मजबूत होने लगा। उनकी आवाज में उत्साह, चंचलता और भावनात्मक गहराई का ऐसा संगम था, जो बदलते दौर के नायकों की छवि के अनुकूल बैठता था। उन्होंने सरल मधुर धुनों से लेकर पश्चिमी संगीत से प्रभावित गीतों तक अपनी गायकी का विस्तार किया। बदलती संगीत शैली के अनुरूप स्वयं को ढालने की उनकी क्षमता ने उन्हें लोकप्रिय गायक के साथ हिंदी फिल्म संगीत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला कलाकार भी बनाया।

देव आनंद से राजेश खन्ना तक : पर्दे के नायकों की आवाज

पार्श्वगायन में सफलता के लिए मधुर आवाज के साथ अभिनेता की छवि, अभिनय शैली और दृश्य की भावनाओं को समझना भी जरूरी है। किशोर कुमार ने इस कला में असाधारण दक्षता दिखाई। देव आनंद के लिए गाए उनके गीतों में रोमांस, चंचलता और आधुनिकता का सुंदर मेल था। ‘गाइड’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों के संगीत ने इस संगम को खास पहचान दी। राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में यादगार रही। फिल्म ‘आराधना’ के ‘मेरे सपनों की रानी’ और ‘रूप तेरा मस्ताना’ जैसे गीतों ने किशोर कुमार की लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी। इनकी सफलता में गायक, अभिनेता, संगीतकार और गीतकार के रचनात्मक तालमेल की अहम भूमिका थी। अमिताभ बच्चन के लिए गाए गीतों में भी किशोर कुमार ने ऊर्जा और भावनात्मक गहराई का प्रभावशाली संगम प्रस्तुत किया। अलग-अलग अभिनेताओं के व्यक्तित्व के अनुरूप आवाज ढालने की उनकी क्षमता ने उन्हें हिंदी सिनेमा का विशिष्ट पार्श्वगायक बनाया।

सदाबहार गीत : जीवन के विविध रंगों की अभिव्यक्ति

किशोर कुमार के गीतों की लोकप्रियता का बड़ा कारण जीवन की विविध भावनाओं को स्वर देने की उनकी अद्भुत क्षमता थी। उनके रोमांटिक गीतों में प्रेम की कोमलता, आकर्षण और चंचलता का सुंदर संगम मिलता है। ‘ओ मेरे दिल के चैन’ में आत्मीयता, ‘मेरे सपनों की रानी’ में प्रेम का उल्लास और ‘रूप तेरा मस्ताना’ में भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति सुनाई देती है। ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना’ जीवन को उत्साह से जीने की प्रेरणा देता है, जबकि ‘मुसाफिर हूं यारों’ स्वतंत्रता और निरंतर आगे बढ़ने का भाव जगाता है। दूसरी ओर, ‘जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मकाम’ समय और स्मृतियों की संवेदनशील अनुभूति कराता है। ‘कोई होता जिसको अपना’ अकेलेपन की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है, वहीं ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ सामाजिक आलोचनाओं के बीच अपने विवेक पर भरोसा रखने का संदेश देता है। हास्यप्रधान गीतों में भी किशोर कुमार का अंदाज बेमिसाल था। ‘पड़ोसन’ का ‘एक चतुर नार’, जिसमें मन्ना डे के साथ उनकी जुगलबंदी है, और ‘पांच रुपैया बारह आना’ उनकी लय, नाटकीयता तथा हास्यबोध के उदाहरण हैं। इन गीतों की भावनात्मक व्यापकता ही उन्हें कालजयी बनाती है। वे कभी पुरानी यादें ताजा करते हैं, कभी दुख में सांत्वना देते हैं और कभी जीवन में आगे बढ़ने का उत्साह जगाते हैं।

एसडी बर्मन और आरडी बर्मन के साथ रचनात्मक साझेदारी

किशोर कुमार की संगीत यात्रा में एसडी बर्मन और आरडी बर्मन के साथ उनकी साझेदारी का विशेष महत्व रहा। दोनों संगीतकारों की अलग-अलग शैलियों को उनकी आवाज ने प्रभावशाली अभिव्यक्ति दी और हिंदी फिल्म संगीत को अनेक यादगार गीत मिले। एसडी बर्मन के निर्देशन में किशोर कुमार की गायकी का भावनात्मक पक्ष निखरा। ‘गाइड’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘आराधना’ जैसी फिल्मों के गीतों में भारतीय संगीत की सहजता, लोक धुनों की आत्मीयता और भावनाओं की गहराई का सुंदर मेल दिखाई देता है। वहीं, आरडी बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने आधुनिक संगीत प्रयोगों को लोकप्रिय बनाने में योगदान दिया। पश्चिमी संगीत के प्रभाव, नए वाद्य यंत्रों और नवीन लय के साथ भारतीय धुनों के मेल ने उनकी गायकी को नया आयाम दिया। ‘अमर प्रेम’ और ‘आंधी’ जैसी फिल्मों का संगीत इस रचनात्मकता के उदाहरण हैं। इन साझेदारियों ने साबित किया कि यादगार गीत सामूहिक प्रतिभा से आकार लेते हैं। संगीतकार की धुन, गीतकार के शब्द, गायक की आवाज और अभिनेता का अभिनय मिलकर गीत को प्रभावशाली बनाते हैं। किशोर कुमार इस रचनात्मक संगम की महत्वपूर्ण कड़ी थे।

गायक से आगे : गीतकार, संगीतकार और फिल्म निर्माता

किशोर कुमार की बहुमुखी प्रतिभा केवल पार्श्वगायन तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अभिनय, संगीत रचना और फिल्म निर्माण के माध्यम से भी अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त किया। ‘झुमरू’ और ‘दूर गगन की छांव में’ जैसी फिल्मों में उनकी स्वतंत्र कलात्मक दृष्टि दिखाई देती है। विशेष रूप से ‘दूर गगन की छांव में’ में पिता-पुत्र के संबंधों और मानवीय संवेदनाओं को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। हास्य प्रधान अभिनय, गायकी में योडलिंग और फिल्म निर्माण में नए प्रयोग उनकी मौलिक सोच के उदाहरण हैं। वे परंपराओं से सीखते हुए अपनी अलग राह बनाने में विश्वास रखते थे। उनका जीवन साबित करता है कि सच्ची रचनात्मकता किसी एक विधा की सीमाओं में बंधी नहीं रहती।

भाषाई विविधता और भारतीय संगीत से आत्मीय संबंध

किशोर कुमार की लोकप्रियता हिंदी फिल्म संगीत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने बंगाली सहित कई भारतीय भाषाओं में गीत गाकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। बंगाली संगीत से उनका विशेष लगाव था और फिल्मी तथा गैर-फिल्मी गीतों के माध्यम से उन्होंने वहां भी श्रोताओं का दिल जीता। भारत जैसे बहुभाषी देश में संगीत विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का सशक्त माध्यम है। भाषा बदलने के बावजूद प्रेम, विरह, उल्लास और अकेलेपन जैसी भावनाएं सबके मन को छूती हैं। किशोर कुमार की गायकी ने इन संवेदनाओं को भाषाई सीमाओं से परे पहुंचाया। उनकी कला आज भी सांस्कृतिक विविधता के बीच भावनात्मक एकता का प्रतीक है।

निजी जीवन और व्यक्तित्व के विविध रंग

किशोर कुमार का सार्वजनिक व्यक्तित्व चंचल, हास्यपूर्ण और अप्रत्याशित था। उनके अनोखे व्यवहार और पारंपरिक फिल्मी तौर-तरीकों से अलग रहने के अनेक किस्से प्रचलित हैं। हालांकि, उनकी पहचान केवल इन रोचक प्रसंगों तक सीमित नहीं थी। वे रचनात्मक स्वतंत्रता को महत्व देते थे और अपनी मौलिकता बनाए रखने के लिए अलग राह चुनने से नहीं हिचकते थे। उनके जीवन में पारिवारिक संबंधों, भावनात्मक अनुभवों और पेशेवर चुनौतियों के विविध पहलू रहे। इनका उनकी कला पर प्रभाव समझते समय सावधानी आवश्यक है। किसी गीत में व्यक्त अकेलेपन को उनके निजी जीवन का सीधा प्रतिबिंब नहीं माना जा सकता। फिर भी उनकी संवेदनशील गायकी श्रोताओं को गहरी मानवीय भावनाओं से जोड़ती है।

पुरस्कार और सम्मान : लोकप्रियता से परे उपलब्धियां

किशोर कुमार को श्रोताओं का अपार प्रेम मिला और फिल्म जगत ने भी उनके योगदान को सम्मान दिया। उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के लिए आठ फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुए। मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार से भी सम्मानित किया। उनके जन्म स्थान खंडवा में उनकी स्मृति को संजोने के प्रयास और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित किशोर कुमार सम्मान उनके सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हैं। हालांकि, उनकी उपलब्धियों का आकलन केवल पुरस्कारों से नहीं किया जा सकता। उनकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि गीत लोगों की निजी स्मृतियों और भावनाओं का हिस्सा बन गए। रेडियो से लेकर डिजिटल मंचों तक उनकी आवाज आज भी गूंजती है और नई पीढ़ियों को आकर्षित करती है।

आपातकाल का दौर : कला और स्वतंत्रता का प्रश्न

किशोर कुमार के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग 1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान का है। इस अवधि में तत्कालीन सरकार और फिल्म जगत के कुछ कलाकारों के बीच मतभेद सामने आए। सरकारी कार्यक्रम में प्रस्तुति देने को लेकर किशोर कुमार से जुड़ा विवाद भी इसी संदर्भ में चर्चित रहा। इस विवाद के बाद उनके गीतों के आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यह घटना कलाकार की स्वतंत्रता और सत्ता के संबंधों पर विचार करने का अवसर देती है। लोकतंत्र में कला मनोरंजन के साथ विचारों और मानवीय अनुभवों की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। इसलिए इस प्रसंग को सनसनीखेज बनाने के बजाय प्रमाणित तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर समझना जरूरी है।

13 अक्टूबर 1987 : एक युग का अवसान

13 अक्टूबर 1987 को 58 वर्ष की आयु में किशोर कुमार का निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय फिल्म संगीत को अपूरणीय क्षति हुई, लेकिन उनकी आवाज और रचनात्मक विरासत आज भी जीवंत है। वे अपने पीछे ऐसे गीत और फिल्में छोड़ गए, जो पीढ़ियों से संगीत प्रेमियों को आकर्षित कर रहे हैं। फिल्मों, रेडियो और डिजिटल माध्यमों ने उनके संगीत को नई पीढ़ियों तक पहुंचाया है। उनकी गायकी में प्रेम, विरह, हास्य, आशा और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि के विविध रंग मिलते हैं। समय के साथ संगीत की शैलियां और तकनीकें बदलती रही हैं, लेकिन मानवीय भावनाएं सदैव प्रासंगिक रहती हैं। किशोर कुमार ने इन्हीं संवेदनाओं को अपनी सहज और प्रभावशाली आवाज में पिरोया। यही कारण है कि उनका संगीत समय की सीमाओं से परे आज भी श्रोताओं के दिलों में बसा है।

नई पीढ़ी के बीच किशोर कुमार की प्रासंगिकता

आज संगीत सुनने के माध्यम बदल गए हैं। रेडियो और ग्रामोफोन के दौर से आगे बढ़कर संगीत मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल मंचों तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद किशोर कुमार के गीतों का आकर्षण आज भी बरकरार है। उनकी आवाज की स्वाभाविकता, भावनात्मक गहराई और अभिव्यक्ति की सहजता उन्हें नई पीढ़ी के श्रोताओं के बीच भी लोकप्रिय बनाए हुए है। आज के युवा उनके गीत सुनते हैं, गाते हैं और नए संगीत संयोजनों में प्रस्तुत करते हैं। हालांकि, किसी रचना की स्थायी लोकप्रियता केवल नए संस्करणों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि उसके मूल स्वर, शब्दों की स्पष्टता और भावों की सच्चाई में निहित होती है। किशोर कुमार की गायकी संगीत सीखने वालों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। उनकी प्रस्तुतियां स्वर पर नियंत्रण, लय की समझ, उच्चारण की शुद्धता और भावों की प्रभावी अभिव्यक्ति का महत्व समझाती हैं। उनकी शैली से प्रेरणा लेते हुए अपनी मौलिक पहचान बनाना ही उनके प्रति सच्चा कलात्मक सम्मान है। उनकी कला में हास्य और गंभीरता, उल्लास और उदासी का अद्भुत संतुलन था। यही भावनात्मक व्यापकता उन्हें कालजयी कलाकार बनाती है।

आवाज अमर होती है, जब वह दिलों में बस जाती है

किशोर कुमार की पुण्यतिथि उस महान कलाकार को याद करने का अवसर है, जिसने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से भारतीय संगीत को असाधारण समृद्धि प्रदान की। खंडवा के आभास कुमार गांगुली से हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय किशोर कुमार बनने तक की उनकी यात्रा संघर्ष, प्रयोग, स्वतंत्रता और रचनात्मकता की प्रेरक कहानी है। गायन, अभिनय, संगीत रचना और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उन्होंने अपनी प्रतिभा के विविध आयाम प्रस्तुत किए। उनकी गायकी की सबसे बड़ी विशेषता भावनाओं को सहजता और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करना था। वे प्रेम को मधुरता, विरह को मार्मिकता और हास्य को चंचलता प्रदान करते थे। उनके गीतों में जीवन के दर्शन के साथ आम आदमी की खुशियां, उम्मीदें, कमजोरियां और सपने भी झलकते हैं। यही आत्मीयता श्रोताओं को उनके संगीत से जोड़ती है। किशोर कुमार ने अपनी मौलिकता और प्रयोगधर्मिता से हिंदी फिल्म संगीत को नई पहचान दी। उनकी आवाज ने अनेक अभिनेताओं के पर्दे के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाया और संगीतकारों की कल्पना को व्यापक श्रोता वर्ग तक पहुंचाया। उनकी गायकी यह सिखाती है कि रचनात्मक स्वतंत्रता और अपनी विशिष्ट शैली किसी कलाकार को कालजयी बना सकती है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि उस कला के प्रति सम्मान व्यक्त करना है, जो मनुष्य को अपनी भावनाओं से जोड़ती है और जीवन के प्रति विश्वास जगाती है। किशोर कुमार भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज में प्रेम, विरह, हास्य और जीवन के अनगिनत रंग आज भी जीवंत हैं। उनकी संगीत-साधना आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और उनकी आवाज संगीत प्रेमियों के दिलों में सदैव गूंजती रहेगी।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

RELATED ARTICLES

14/10/26 | 3:10 pm | Affordable and Clean Energy

विश्व मानक दिवस : गुणवत्ता, सुरक्षा और भरोसे से बेहतर भविष्य की राह

गुणवत्ता कभी संयोग का परिणाम नहीं होती, बल्कि स्पष्ट सोच, ईमानदारी और अनुशासन से आकार लेती है। इ...