भारत के युवाओं की आकांक्षाओं को बेरोज़गारी के डर से मुक्ति के संकेत मिलना बड़ा परिवर्तन है। हाल ही में जारी राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़े और उनसे जुड़ी आधिकारिक रिपोर्ट इस परिवर्तन का साक्ष्य है। रिपोर्ट बताती है कि 2017-18 से लेकर 2023-24 के बीच भारत में लगभग 16.83 करोड़ नई नौकरियां सृजित हुई हैं। बेरोज़गारी दर जो 6 प्रतिशत से ऊपर थी, घटकर 3.2 प्रतिशत रह गई है। यह परिवर्तन महज़ आंकड़ा नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की उस सोच का परिणाम है जिसने विकास को लोगों के जीवन से जोड़ा है।
युवाओं को आत्मनिर्भरता के अवसर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसका मानव संसाधन है। यही सोच अब नीति-व्यवहार में दिखाई दे रही है। बीते वर्षों में केंद्र सरकार ने रोजगार सृजन को प्रोत्साहन देने वाली योजनाओं को एक समग्र रणनीति के तहत जोड़ा है। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और डिजिटल इंडिया की पहलें एक ही सूत्र में पिरोई गईं। इन अभियानों ने न सिर्फ उद्योग जगत में निवेश को प्रोत्साहित किया बल्कि युवाओं को कौशल आधारित प्रशिक्षण के ज़रिए आत्मनिर्भरता का अवसर भी दिया।
बड़ा सामाजिक परिवर्तन
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उस वर्ग में देखा गया है, जिसे भारत की कार्यशक्ति की रीढ़ कहा जा सकता है यानि महिलाएं। श्रम बल भागीदारी में महिलाओं की हिस्सेदारी 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई है। यह वृद्धि वाकई बड़े सामाजिक परिवर्तन का द्योतक है। ग्रामीण और अर्धशहरी भारत में महिलाएं अब घर की सीमाओं से निकलकर स्वरोज़गार और सेवा क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी कर रही हैं। सरकार की ई-श्रम पोर्टल जैसी पहलें और रोज़गार मेले जैसी योजनाएं इस प्रक्रिया को गति दे रही हैं।
काम करने योग्य आबादी के बड़े हिस्से को रोज़गार
भारत की श्रम शक्ति का परिदृश्य भी अब पहले जैसा नहीं रहा। Labour Force Participation Rate (LFPR) 49.8 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है। इसका अर्थ है कि देश में काम करने योग्य आबादी का बड़ा हिस्सा अब रोज़गार के दायरे में है। यह उस सोच का नतीजा है, जिसमें रोजगार को ‘मौका’ नहीं, बल्कि ‘सशक्तिकरण’ माना गया। शहरों में आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस सेक्टर और ई-कॉमर्स क्षेत्रों में नई नौकरियां बढ़ रही हैं तो ग्रामीण भारत में स्वरोज़गार और लघु उद्योगों का दायरा फैल रहा है।
जब हम वैश्विक पटल पर भारत की स्थिति देखते हैं तो यह उपलब्धि और भी बड़ी प्रतीत होती है। कई विकसित अर्थव्यवस्थाएं आज भी महामारी और मुद्रास्फीति के दबाव से जूझ रही हैं। वहीं, भारत में श्रम बाजार न सिर्फ स्थिर हुआ है बल्कि उसमें नई ऊर्जा भी आई है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत का विकास मॉडल, जिसमें आत्मनिर्भरता और समावेश दोनों साथ चलते हैं, अब एक व्यवहारिक आर्थिक दर्शन के रूप में स्थापित हो चुका है।
घरेलू उत्पादन और रोजगार दोनों में वृद्धि
सरकार और उद्योगों के बीच साझेदारी इस सफलता की कुंजी रही है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव (PLI) योजनाओं ने मैन्युफैक्चरिंग को नई दिशा दी, जिससे घरेलू उत्पादन और रोजगार दोनों में वृद्धि हुई। इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म आधारित प्रशिक्षण और छोटे उद्योगों के विस्तार ने देश के युवाओं को स्थानीय स्तर पर अवसर दिए हैं। खास बात यह है कि सरकार लगातार ऐसे कदम उठा रही है कि यह प्रगति सिर्फ शहरी अर्थव्यवस्था तक सीमित न रहे बल्कि हर गांव और छोटे कस्बे में भी अपनी छाप छोड़े।
आर्थिक सशक्तिकरण का निर्णायक दौर
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत का रोजगार परिदृश्य अब एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका है। सरकार ने मजबूत बुनियाद रख दी है, उद्योग और समाज को अब इस यात्रा को आगे बढ़ाना है। जब कोई किसान का बेटा तकनीकी विशेषज्ञ बनकर अपने गांव लौटता है या कोई महिला स्वरोज़गार के माध्यम से अपने परिवार का सहारा बनती है तो समूचे समाज में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलते हैं।
भारत आज नौकरियां पैदा करने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की नई संस्कृति गढ़ रहा है। आज हर हाथ को काम, हर काम को गरिमा और हर गरिमा को पहचान मिल रही है। यही है ‘विकसित भारत’ की असली परिभाषा। श्रम, कौशल और संकल्प के ये परिणाम वाकई आने वाले समय में व्यापक परिवर्तन के द्योतक हैं।
-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज सर्विस के साथ जुड़े हैं।)


