भारत में अदालतों में बढ़ते मॉर्फ्ड और फर्जी डिजिटल कंटेंट को देखते हुए न्यायपालिका इस तरह के मामलों को गंभीरता से ले रही है। ऐसे मामलों की सुनवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत होती है, जिसमें पहचान की चोरी (धारा 66C), कंप्यूटर संसाधनों का उपयोग कर प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी (धारा 66D), और अश्लील या हानिकारक डिजिटल सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण (धारा 67, 67A, 67B) जैसे अपराध शामिल हैं। इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएं 319, 336 और 340 के तहत भी प्रतिरूपण से धोखाधड़ी, इलेक्ट्रॉनिक फर्जीवाड़ा और रिकॉर्ड से छेड़छाड़ जैसे अपराधों में कार्रवाई की जाती है। अदालतों ने माना है कि मनगढ़ंत डिजिटल सामग्री जनता की धारणा पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में संशोधन किए गए, और 2023 में नए आपराधिक कानून लागू किए गए। साथ ही, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Section 63) के तहत डिजिटल सबूतों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड ऑथेंटिकेशन सर्टिफिकेट अनिवार्य किया गया है। न्यायिक पारदर्शिता बढ़ाने के लिए eCourts परियोजना के तहत बड़ी संख्या में अदालत की कार्यवाही लाइव-स्ट्रीम की जा रही हैं और फैसलों की प्रमाणिक कॉपियां जजमेंट सर्च सर्च पोर्टल पर उपलब्ध कराई जा रही हैं।
e-Courts मिशन मोड प्रोजेक्ट के फेज-III को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के अंतर्गत लागू किया जा रहा है। इस पर कुल ₹7210 करोड़ खर्च किए जा रहे हैं, जिसका उद्देश्य अदालतों में ICT यानी सूचना व संचार तकनीक को मजबूत बनाना है ताकि न्याय प्रणाली अधिक सुलभ, किफायती, विश्वसनीय और पारदर्शी बन सके। फेज III में भविष्य की तकनीकी प्रगति (AI, Blockchain आदि)के लिए ₹53.57 करोड़ निर्धारित किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक क्षेत्र में एआई के उपयोग की संभावनाओं को समझने के लिए एक Artificial Intelligence Committee बनाई है। हालांकि, अभी न्यायपालिका में एआई उपयोग के लिए कोई औपचारिक नीति नहीं है और एआई आधारित सभी समाधान अभी नियंत्रित पायलट चरण में ही उपयोग किए जाते हैं।
न्यायपालिका मानती है कि एआई को जोड़ने से एल्गोरिदमिक बायस, भाषा व अनुवाद की त्रुटियां, डेटा गोपनीयता, सुरक्षा और एआई के परिणामों का मैनुअल सत्यापन जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी की अध्यक्ष ने छह हाई कोर्ट जजों और तकनीकी विशेषज्ञों की एक सब-कमेटी बनाई है, जो डेटा सुरक्षा, गोपनीयता संरक्षण और डिजिटल ढांचे की मजबूती पर सुझाव देगी।
न्यायाधीशों की सहायता के लिए दो प्रमुख एआई टूल विकसित किए गए हैं। पहला, Legal Research Analysis Assistant (LegRAA), जो कानूनी शोध और दस्तावेज विश्लेषण में मदद करता है। दूसरा, Digital Courts 2.1, जो जजों को केस की सभी जानकारी और कार्य एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराता है। इसमें वॉइस-टू-टेक्स्ट (ASR-SHRUTI) और अनुवाद (PANINI) सुविधाएं भी शामिल हैं, जिनसे आदेश और निर्णय लिखना आसान होता है। पायलट चरण के दौरान अब तक किसी तरह के सिस्टम बायस या अनचाहे कंटेंट की रिपोर्ट नहीं मिली है। यह जानकारी आज लोकसभा में कानून और न्याय मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने दी।


