21 जुलाई को शुरू हुआ संसद का मानसून सत्र महीने भर चलने के बाद 21 अगस्त की दोपहर को समाप्त हो गया। इस सत्र में सरकार ने क्या हासिल किया, विपक्ष ने क्या हासिल किया और देश के लोगों को क्या हासिल किया, उसका विश्लेषण करने से पहले जरा एक नजर डालते हैं कि आखिर प्रधानमंत्री ने सत्र की शुरुआत में इससे क्या उम्मीद जतायी थी और विपक्ष से क्या अपील की थी। 21 जुलााई को सत्र शुरू होने से पहले पीएम मोदी ने कहा था कि ‘राजनीतिक दल अलग-अलग है, हर एक का अपना एक एजेंडा है, अपनी एक भूमिका है, लेकिन मैं इस वास्तविकता को स्वीकार करता हूं कि दलहित में मत भले ना मिले, लेकिन देशहित में मन जरुर मिले। इसी एक भावना के साथ, इस मानसून सत्र से देश की विकास यात्रा को बल देने वाले, देश की प्रगति को बल देने वाले, देश के नागरिकों को सामर्थ्य देने वाले अनेक विधेयक प्रस्तावित हैं, सदन विस्तृत चर्चा करके उसको भी पारित करेगा। मेरी सभी माननीय सांसदों से सार्थक चर्चा के लिए शुभकामनाएं हैं।’
जब हम मानसून सत्र का विश्लेषण करते हैं तो पीएम की इन बातों की अहमियत और भी बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री ने सदन में सार्थक डिबेट की अपील की थी लेकिन सत्र का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि ऑपरेशन सिंदूर के अलावा किसी और मुद्दे पर चर्चा ही नहीं हो सकी। महीने भर के दौरान 21 बैठकों वाले सत्र में राज्यसभा में 39% प्रोडक्टिविटी रही जबकि लोकसभा में केवल प्रोडक्टिविटी 31% रही। राज्यसभा के इस 268वें सत्र में निर्धारित समय के मुकाबले केवल 38.88 फीसदी कामकाज हो सका जबकि बाकी समय विपक्ष की नारेबाजी और हंगामे की भेंट चढ़ गया। राज्यसभा में मानसून सत्र की कुल कार्यवाही 41 घंटे 15 मिनट चली। हम सबके लिए यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है। संसद में हंगामे से न केवल बहुमूल्य संसदीय समय नष्ट हुआ, बल्कि कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक विषयों पर चर्चा का अवसर भी हाथ से निकल गया।
मानसून सत्र में सदस्यों को 285 प्रश्न, 285 शून्यकाल नोटिस और 285 विशेष उल्लेख उठाने का अवसर मिला, परंतु केवल 14 प्रश्न, 7 शून्यकाल नोटिस और 61 विशेष उल्लेख ही लिए जा सके। इस सत्र में 15 सरकारी विधेयक पारित किए गए। लेकिन ज्यादातर को बिना चर्चा के ही पास करना पड़ा वहीं लोकसभा में चर्चा के लिए कुल 120 घंटे का समय निर्धारित था, लेकिन लगातार हंगामे के कारण लोकसभा में महज 37 घंटे ही चर्चा हो पाई। कुल 419 तारांकित प्रश्न प्रस्तुत किए गए थे, फिर भी सिर्फ 55 का ही उत्तर दिया गया। पूरे सत्र में 14 विधेयक पेश किए गए और 12 पारित हुए, जिनमें आयकर विधेयक, कराधान कानून (संशोधन) विधेयक और राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक शामिल हैं। ऑनलाइन गेमिंग विनियमन विधेयक भी पारित हुआ। हालांकि, संविधान में 130वें संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया।
पूरे सत्र के दौरान सबसे अहम चीज थी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर हुई एक विशेष चर्चा जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में तो गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जवाब दिया। मानसूत्र के दौरान जो विधेयक पारित हुए उसमें समुद्र द्वारा वस्तुओं की ढुलाई विधेयक, 2025 ; तटीय जहाजरानी विधेयक, 2025, राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक, 2025; राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग (संशोधन) विधेयक, 2025 ; आयकर विधेयक, 2025;भारतीय बंदरगाह विधेयक, 2025; खनिज एवं खनन (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2025 और ऑनलाइन गेमिंग प्रोत्साहन एवं विनियमन विधेयक, 2025 शामिल है। यानी संसद के मानसून सत्र में विपक्ष का हंगामा जारी रहा लेकिन सरकार अपने महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सफल रही। विपक्ष के रवैये के चलते अधिकतर बिल बिना चर्चा या फिर संक्षिप्त चर्चा के साथ पारित कर दिए गए।
संसद में इस बार मतभेद और हंगामे का सबसे बड़ा मसला रहा बिहार में जारी एसआईआर प्रक्रिया रही। बिहार में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया के जरिए बिहार के लोगों के वोट काटे गए हैं। विपक्ष इन्हीं मुद्दों को लेकर सदन में चर्चा के लिए आखिरी दिन तक अड़ा रहा। इस बीच, संसद में नारेबाजी, बिल फाड़कर फेंकने और तख्तियां लहराने जैसे कई घटनाक्रम देखने को मिले। हंगामे के चलते दोनों सदनों में पीठासीन अधिकारियों ने कड़ी टिप्पणियां की। सदन के आखिरी दिन कुछ सदस्यों के आचरण पर टिप्पणी करते हुए स्पीकर ओम बिरला का स्वर कठोर था। उन्होंने हंगामा करने वाले सांसदों से कहा कि जन प्रतिनिधि के रूप में हमारे आचरण और कार्यप्रणाली को पूरा देश देखता है।
जनता उम्मीदों के साथ यहां चुनकर भेजती है, ताकि उनके हित के मुद्दों और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा कर सकें। लोकसभा अध्यक्ष के साथ ही संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने हंगामे को लेकर विपक्ष को खूब खरी खोटी सुनाई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष होना चाहिए। विरोध करना या असहमति जताना अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक तरीका है, लेकिन संसद में सरकार के काम में बाधा डालना और उसे रोकना अलोकतांत्रिक है। किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार की दृष्टि से देश के लिए बहुत उपयोगी सत्र रहा है, लेकिन विपक्ष के सांसदों को, खासकर नए सांसदों को, सदन में बोलने का मौका नहीं मिला।
एक खास बात ये रही कि विपक्ष के हंगामे के चलते कैप्टन शुभांशु शुक्ला पर रखी गयी चर्चा भी नही हो सकी। भारत मां के जिस लाल पर पूरी दुनिया को गर्व है उस मां भारती के सपूत की उपलब्धि पर भी हमारे सांसद चर्चा ही नहीं कर सके। विपक्ष का हंगामे का अधिकार है लेकिन जहां बात राष्ट्रीय गर्व की हो वहां विपक्ष का ये रवैया सच में सवाल खड़े करता है। सदन में विपक्ष के हंगामे के चलते तमाम विधेयकों पर चर्चा नहीं हो सकी जिससे उनके बारे में लोगों को जानने का मौका नहीं मिला तो साथ ही पैसे की बर्बादी भी हुई। आंकडों पर गौर करें तो संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर करीब 2.50 लाख रूपये खर्च होता है, यानी 1 दिन की संसद की कार्यवाही पर करीब 9 करोड़ खर्चा होता है। इस लिहाज से मानसून सत्र में करीब 190 करोड़ रूपये हुए बर्बाद होते हैं। ये पैसा किसी सांसद मंत्री,सत्ता पक्ष या विपक्ष का नहीं बल्कि हमारा आपका देश की जनता की गाढ़ी कमाई का है।
-(वरिष्ठ पत्रकार सुरेश जायसवाल राजनीति मामलों के जानकार हैं, वर्तमान में वे डीडी न्यूज से जुड़े हुए हैं)


