भारत की अर्थव्यवस्था में छोटे कारोबार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। देश का एमएसएमई सेक्टर 40 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है, इसलिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है। हालांकि, छोटे कारोबारियों के सामने समय पर भुगतान न मिलना, कानूनी प्रक्रिया में देरी और जटिल नियम जैसी चुनौतियां लंबे समय से रही हैं। इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एमएसएमई विकास अधिनियम में संशोधन किया है। एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक 2026 को 3 अगस्त को राज्यसभा और 7 अगस्त को लोकसभा से मंजूरी मिल चुकी है। संशोधन का उद्देश्य एमएसएमई के पंजीकरण से लेकर भुगतान, विवाद निपटारे और बकाया राशि की वसूली तक कारोबारी प्रक्रिया को आसान और अधिक प्रभावी बनाना है।
एमएसएमई की पहचान और पंजीकरण होगा आसान
बदलते कारोबारी माहौल को देखते हुए कानून में एमएसएमई के वर्गीकरण के लिए निवेश और टर्नओवर दोनों को आधार बनाया गया है। इसके साथ ही उद्यम पोर्टल को एमएसएमई के लिए स्थायी डिजिटल प्लेटफॉर्म का दर्जा दिया गया है। यहां पंजीकरण निशुल्क और स्वैच्छिक रहेगा। इससे छोटे कारोबारी डिजिटल माध्यम से अपनी पहचान और औपचारिक पंजीकरण को अधिक आसानी से मजबूत कर सकेंगे। औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ने के कारण उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं और कारोबारी सुविधाओं तक पहुंच बनाने में भी मदद मिल सकती है।
भुगतान में देरी पर लगेगा शिकंजा
छोटे कारोबारियों की बड़ी समस्या कारोबार करना नहीं, बल्कि किए गए काम या सप्लाई का पैसा समय पर मिलना है। संशोधन में इसी समस्या के समाधान पर विशेष जोर दिया गया है। विवादों के निपटारे के लिए ऑनलाइन डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन की व्यवस्था की गई है, ताकि सूक्ष्म और छोटे उद्यमों को लंबी और महंगी कानूनी प्रक्रिया में न फंसना पड़े। विवाद निपटारे के अलग-अलग चरणों के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की गई है। मध्यस्थता की प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी करने और उसके बाद निर्धारित समय में फैसला देने का प्रावधान किया गया है। इससे कोशिश है कि छोटे कारोबारी का पैसा वर्षों तक विवाद में न अटका रहे।
अदालत में मामला लंबा खिंचा तो भी मिलेगी राहत
अगर किसी डिक्री, मध्यस्थता निर्णय या आदेश को रद्द कराने की अर्जी छह महीने से ज्यादा समय तक लंबित रहती है, तो अदालत को एमएसएमई सप्लायर को निर्णय में तय रकम का कम से कम 50% भुगतान करने का आदेश देना होगा। इसका मतलब है कि विवाद लंबा खिंचने की स्थिति में भी छोटे उद्यम को कम से कम कुछ वित्तीय राहत मिल सकेगी। इससे कारोबारियों के कार्यशील पूंजी संकट को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
बकाया राशि की वसूली होगी आसान
संशोधन में बकाया राशि की वसूली की व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है। मध्यस्थता समझौते या निर्णय के तहत मिलने वाली रकम को संबंधित क्षेत्र के जिला कलेक्टर, उपायुक्त या अधिसूचित प्राधिकारी के माध्यम से भूमि राजस्व के बकाये की तरह वसूल किया जा सकेगा। यानी पैसा मिलने का फैसला हो जाने के बाद उसकी वसूली की प्रक्रिया को भी ज्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है। इससे भुगतान संबंधी विवादों में एमएसएमई के हितों को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
TReDS से बेहतर होगा कैश फ्लो
TReDS यानी ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम एमएसएमई के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था बनकर उभर रहा है। सरल भाषा में समझें तो अगर किसी एमएसएमई ने किसी बड़ी कंपनी या सरकारी संस्था को सामान या सेवा दी है और उसका भुगतान बाद में मिलना है, तो TReDS के जरिए संबंधित चालान को डिस्काउंट कराकर पहले ही रकम हासिल करने में मदद मिल सकती है। संशोधन के तहत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों यानी CPSEs के लिए एमएसएमई से खरीद के चालानों का निपटारा TReDS के जरिए करने की व्यवस्था की गई है। इस प्लेटफॉर्म पर इनवॉइस डिस्काउंटिंग भी तेजी से बढ़ी है और यह 2022-23 में करीब 40 हजार करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 3.47 लाख करोड़ रुपए हो गई। TReDS अब केवल तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि एमएसएमई के लिए कैश फ्लो बनाए रखने का महत्वपूर्ण जरिया बनता जा रहा है।
राज्यों को एक से ज्यादा एमएसईएफसी बनाने का अधिकार
हर राज्य में एमएसएमई से जुड़े विवादों की संख्या और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्यों को एक से ज्यादा एमएसईएफसी यानी सूक्ष्म एवं लघु उद्यम सुविधा परिषद बनाने की सुविधा दी गई है। इससे भुगतान से जुड़े विवादों का निपटारा स्थानीय स्तर पर अधिक तेजी से करने में मदद मिल सकती है। अधिक परिषदों की व्यवस्था होने से लंबित मामलों का बोझ कम करने और विवाद समाधान की प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाने की कोशिश की गई है।
विश्वास-आधारित नियमन पर जोर
संशोधन का एक महत्वपूर्ण पहलू डी-क्रिमिनलाइजेशन यानी छोटी नियामकीय गलतियों को सीधे अपराध की श्रेणी में न रखना है। पहले कुछ मामलों में पंजीकरण या जानकारी से जुड़े उल्लंघनों पर दोषसिद्धि और जुर्माने का प्रावधान था। अब गलत जानकारी देने जैसे मामलों में पहली बार चेतावनी और उसके बाद की घटनाओं में क्रमिक नागरिक दंड का प्रावधान किया गया है। इसी तरह खरीदारों द्वारा बकाया भुगतान की जानकारी का खुलासा न करने पर भी सीधे आपराधिक कार्रवाई के बजाय चेतावनी और क्रमिक दंड की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य हर गलती को अपराध बनाकर डर पैदा करने के बजाय नियमों का पालन करवाना और कारोबार के लिए भरोसे का माहौल तैयार करना है।
छोटे कारोबार से बड़े आर्थिक बदलाव की उम्मीद
पूरे संशोधन को एक लाइन में समझें तो इसका मकसद एमएसएमई को पंजीकरण से लेकर भुगतान और विवाद समाधान तक आसान, तेज और भरोसेमंद कारोबारी माहौल देना है। उद्यम पोर्टल से औपचारिकरण बढ़ाने, ऑनलाइन विवाद समाधान से समय और लागत कम करने, TReDS से कैश फ्लो बेहतर करने और बकाया राशि की वसूली के लिए मजबूत व्यवस्था तैयार करने पर जोर दिया गया है। भारत में एमएसएमई केवल छोटे-छोटे कारोबार नहीं हैं, बल्कि रोजगार, उत्पादन, निर्यात और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बड़े आधार हैं। ऐसे में एमएसएमई विकास अधिनियम में ये बदलाव केवल कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि छोटे कारोबारों को छोटे से बड़े और स्थानीय से वैश्विक स्तर तक बढ़ने के लिए बेहतर माहौल देने की कोशिश हैं। मजबूत एमएसएमई सेक्टर रोजगार आधारित विकास और विकसित भारत@2047 के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।


