दशकों तक भारतीय परिवारों में स्वास्थ्य संबंधी फैसले केवल इलाज तक सीमित नहीं होते थे, बल्कि यह भी तय करना पड़ता था कि परिवार में किसका इलाज पहले होगा और किसका बाद में। किसी मां की लगातार बनी रहने वाली खांसी, बेटी की अनियमित स्वास्थ्य समस्याएं, दादी की कमजोर होती दृष्टि या बेटे की पुरानी बीमारी जैसे मामलों में अक्सर आर्थिक सीमाएं इलाज के रास्ते में खड़ी हो जाती थीं। कई बार इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता था, जिनका इलाज टाल दिया जाता था।
NFHS-6 के आंकड़ों में दिखा बड़ा बदलाव
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के 2023-24 के आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत अब इस सामाजिक वास्तविकता को बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सर्वेक्षण के अनुसार, अब देश के लगभग 60% परिवारों में कम-से-कम एक सदस्य किसी स्वास्थ्य बीमा या स्वास्थ्य वित्तपोषण योजना के तहत कवर है। यह पिछले सर्वेक्षण की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अंकों की उल्लेखनीय वृद्धि है।
आयुष्मान भारत योजना की बढ़ती पहुंच
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की बढ़ती पहुंच इस बदलाव का एक बड़ा कारण मानी जा रही है। योजना की शुरुआत से अब तक 44 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इसके तहत लाभार्थियों ने 12 करोड़ से अधिक अस्पताल भर्ती सेवाओं का लाभ लिया है, जबकि 1.8 लाख करोड़ रुपए से अधिक मूल्य का उपचार उपलब्ध कराया गया है। यह सेवाएं देशभर के 36,000 से अधिक सूचीबद्ध सरकारी और निजी अस्पतालों के नेटवर्क के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही हैं।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी बना बड़ा संकेत
भारत में लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में लैंगिक असमानता एक बड़ी चुनौती रही है। कई परिवारों में पुरुषों के इलाज को प्राथमिकता दी जाती थी, जबकि महिलाओं का उपचार टाल दिया जाता था। लेकिन अब स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत कुल अस्पताल भर्ती मामलों में लगभग आधी हिस्सेदारी महिलाओं की रही है। महिलाओं द्वारा सबसे अधिक लिए गए उपचारों में क्रॉनिक हेमोडायलिसिस, मोतियाबिंद सर्जरी, सिजेरियन डिलीवरी और तीव्र बुखार संबंधी बीमारियों का इलाज प्रमुख है।
स्वास्थ्य सुरक्षा का सामाजिक प्रभाव
स्वास्थ्य सुरक्षा का विस्तार केवल इलाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर सामाजिक और आर्थिक निर्णयों पर भी पड़ता है। जब परिवारों को यह भरोसा होता है कि गंभीर बीमारी की स्थिति में आर्थिक सहायता उपलब्ध होगी, तब महिलाएं और बुजुर्ग भी समय पर इलाज प्राप्त कर पाते हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था बनी सामाजिक सुरक्षा का माध्यम
NFHS-6 के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा अब केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा के मजबूत माध्यम के रूप में उभर रहा है। संस्थागत प्रसव, टीकाकरण, मातृ स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय सुरक्षा में लगातार सुधार इस बात का संकेत हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अब अधिक समावेशी बन रही है।
आंकड़ों से आगे सामाजिक बदलाव की कहानी
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह उन परिवारों की कहानी है, जहां अब इलाज का फैसला आर्थिक मजबूरी से कम और स्वास्थ्य की वास्तविक आवश्यकता के आधार पर अधिक लिया जा रहा है। यही बदलाव भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में उभरते सामाजिक परिवर्तन की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करता है।


