राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने नई दिल्ली में राज्य मानवाधिकार आयोगों (एसएचआरसी), विशेष प्रतिवेदकों और पर्यवेक्षकों के साथ एक दिवसीय वर्चुअल सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन की अध्यक्षता एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने की। इस दौरान मानवाधिकार मामलों के प्रभावी समाधान, संस्थागत समन्वय और डिजिटल प्रणाली को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया।
क्षेत्राधिकार में स्पष्टता रखने की सलाह
न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने कहा कि भारत का मानवाधिकार ढांचा अनूठा है, जहां एनएचआरसी और एसएचआरसी कई मामलों में समवर्ती क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हैं। उन्होंने मामलों की पुनरावृत्ति रोकने, सूचना साझाकरण बेहतर बनाने और सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने आयोगों को मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत तय दायरे में कार्य करने की सलाह देते हुए कहा कि क्षेत्राधिकार में स्पष्टता बनाए रखने से अनावश्यक विवाद कम होंगे और आयोग अधिक प्रभावी तथा गुणवत्तापूर्ण सेवाएं दे सकेंगे।
एचआरसीनेट पोर्टल से जुड़ने का आग्रह
एनएचआरसी अध्यक्ष ने सभी राज्य मानवाधिकार आयोगों से अपने कामकाज को डिजिटल बनाने और एनएचआरसी के एकीकृत एचआरसीनेट पोर्टल से जुड़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इससे मामलों के दोहराव को रोका जा सकेगा और समन्वय बेहतर होगा। उन्होंने बताया कि अब तक 23 राज्य मानवाधिकार आयोग इस प्रणाली से जुड़ चुके हैं, जबकि कुछ राज्यों ने अभी तक इसे नहीं अपनाया है।
समन्वय मजबूत करने की पहल
एनएचआरसी के सदस्य न्यायमूर्ति बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि एनएचआरसी और एसएचआरसी के बीच संवाद समन्वय को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने हिरासत में मौत जैसे संवेदनशील मामलों में समयबद्ध कार्रवाई और आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बेहतर संचार की जरूरत पर बल दिया।
प्रभावित समुदायों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर
एनएचआरसी सदस्य विजया भारती सयानी ने राज्य मानवाधिकार आयोगों से प्रभावित समुदायों के साथ अधिक जुड़ाव बढ़ाने की अपील की। उन्होंने कहा कि विशेष पर्यवेक्षकों और प्रतिवेदकों के बीच बेहतर समन्वय से संस्थागत प्रभावशीलता को मजबूती मिलेगी।
पिछले पांच वर्षों में मिलीं 4.28 लाख शिकायतें
एनएचआरसी के महासचिव भरत लाल ने बताया कि आयोग को पिछले पांच वर्षों में 4.28 लाख शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इनमें पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन, संगठित शोषण, महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन, जेलों की स्थिति, श्रमिक अधिकार, स्वास्थ्य और बाल अधिकारों से जुड़े मामले प्रमुख हैं। उन्होंने हिरासत में मौत, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की स्थिति, हाथ से मैला ढोने से हुई मौतों और कमजोर वर्गों के पुनर्वास जैसे मुद्दों पर सक्रिय निगरानी और जमीनी हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई।
मानवाधिकार तंत्र को मजबूत करने पर चर्चा
सम्मेलन में राज्य मानवाधिकार आयोगों को अधिक संसाधन, बेहतर बुनियादी ढांचा और डिजिटल समन्वय उपलब्ध कराने पर चर्चा हुई। इसके साथ ही जेल सुधार, बाल संरक्षण, दिव्यांग अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय न्याय, श्रमिक सुरक्षा और संवेदनशील संस्थानों की निगरानी जैसे मुद्दों पर भी सुझाव दिए गए।
सम्मेलन में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, गुजरात, गोवा और कर्नाटक सहित कई राज्यों के मानवाधिकार आयोगों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। (इनपुट: पीआईबी)


