गुजरात के गांधीनगर स्थित एक शैक्षणिक संस्थान दो बायोगैस संयंत्रों से प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों के लिए भोजन तैयार करता है, जिससे एलपीजी पर निर्भरता समाप्त हो जाती है। अडालज के पास स्थित वासुमति चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा संचालित मानेकबा विनय विहार शैक्षणिक परिसर ने खाना पकाने के लिए बायोगैस आधारित प्रणाली अपनाकर पारंपरिक एलपीजी पर अपनी निर्भरता समाप्त कर दी है। परिसर में अब प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाता है, जिनमें लगभग 250 छात्रावास के छात्र और 15 कर्मचारियों के परिवार शामिल हैं इन्हें दिन में दो बार भोजन परोसा जाता है।
गौरतलब हो, यह संस्था दो बायोगैस संयंत्रों का संचालन करती है जिनकी संयुक्त क्षमता 90 घन मीटर प्रतिदिन है। इन संयंत्रों में संस्था के गौशाला में रखी गई 222 गायों के गोबर, रसोई के कचरे और आसपास के खेतों से प्राप्त कृषि अवशेषों का उपयोग करके बायोगैस बनाई जाती है, जो संस्था की संपूर्ण ईंधन आवश्यकता को पूरा करती है, जिससे एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
शैक्षणिक संस्थान के अधिकारियों ने बताया कि “गुजरात सरकार की संस्थागत बायोगैस संयंत्र योजना के तहत हम खाना पकाने की गैस के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं। गायें पर्याप्त गोबर देती हैं, और गैस उत्पादन के बाद बनने वाले स्लरी का उपयोग खेतों में खाद के रूप में किया जाता है, जिससे पूरी तरह से जैविक खेती संभव हो पाती है। इस संयंत्र के बिना, हमें हर महीने लगभग 30 एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यकता होती,”
दरअसल, जैविक अपशिष्ट से बनी बायोगैस, खाना पकाने के लिए उपलब्ध सबसे व्यवहार्य, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल ईंधनों में से एक है। नाइट्रोजन से भरपूर उप-उत्पाद स्लरी, एक प्रभावी जैविक उर्वरक के रूप में प्रयोग की जाती है, जिससे रासायनिक पदार्थों पर निर्भरता कम होती है, लागत घटती है और मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इस प्रकार एक ही प्रयास से दोहरा लाभ प्राप्त होता है।
गुजरात ऊर्जा विकास एजेंसी (जीईडीए) 25 से 85 घन मीटर क्षमता वाले बायोगैस संयंत्रों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। गैर-लाभकारी संस्थाएं 75 प्रतिशत तक सब्सिडी के लिए पात्र हैं, जिससे संगठनों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए यह परिवर्तन आर्थिक रूप से सुलभ हो जाता है।
आपको बता दें, पिछले पांच वर्षों में, गुजरात भर में लगभग 193 संस्थागत बायोगैस संयंत्र लगाए गए हैं। गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा और सतत विकास को बढ़ावा देने, प्रदूषण कम करने, ऊर्जा आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और गौशालाओं और शैक्षणिक संस्थानों से प्राप्त जैविक कचरे के वैज्ञानिक निपटान की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है।


