विभाजन ने हजारों वर्षों की सांस्कृतिक विरासत को बांट दिया : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि 1947 का विभाजन केवल सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण नहीं था, बल्कि मानव इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक विस्थापनों में से एक था। उन्होंने कहा कि विभाजन ने हजारों वर्षों में निर्मित भारत की साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत को बांट दिया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्वतंत्रता अनमोल है, एकता अनिवार्य है और शांति को कभी भी स्थायी मानकर नहीं चला जा सकता।

विभाजन की पीड़ा को याद करने का अवसर

उपराष्ट्रपति ने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज की ओर से भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित किया। ‘भारत का विभाजन- विस्थापन, त्रासदी और पुनर्वास की एक गाथा’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में उन्होंने विभाजन की विभीषिका झेलने वाले लोगों के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया।

कड़वाहट नहीं, एकता मजबूत करना उद्देश्य

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि विभाजन को याद करने का उद्देश्य पुराने जख्मों को कड़वाहट के साथ कुरेदना नहीं, बल्कि आपसी एकता और सौहार्द को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि देश जब स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, तब उन लोगों के त्याग और असीम पीड़ा को याद करने के लिए कुछ पल ठहरना जरूरी है, जिन्होंने विभाजन का दंश झेला।

स्वतंत्रता के साथ आई अभूतपूर्व त्रासदी

उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्वतंत्रता औपनिवेशिक शासन से मुक्ति लेकर आई, लेकिन इसके साथ एक अभूतपूर्व त्रासदी और मानव इतिहास के सबसे बड़े जन-विस्थापनों में से एक भी हुआ। उन्होंने कहा कि इस त्रासदी का विशाल पैमाना आज भी चेतावनी देता है कि विभाजन और नफरत के परिणाम कितने विनाशकारी हो सकते हैं।

बच्चों को विभाजन का पूरा सच जानने का अधिकार

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा, “हमारे बच्चों को विभाजन का पूरा सच जानने का अधिकार है।” उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी त्रासदी को पाठ्यपुस्तकों की कुछ पंक्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने इतिहास को याद रखने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि अतीत को भुलाने वाले समाज के सामने उसकी त्रासदियों को दोहराने का जोखिम बना रहता है।

जल्दबाजी में तय सीमाओं के दूरगामी प्रभाव

उपराष्ट्रपति ने कहा कि सीमाओं के जल्दबाजी में किए गए बंटवारे ने ऐसे विवादों को जन्म दिया, जिनके प्रभाव आज भी देखने को मिलते हैं। उन्होंने कहा कि विभाजन का भारत की रक्षा नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर दूरगामी और स्थायी प्रभाव पड़ा है।

कठिन फैसलों के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी

विभाजन से मिले सबक और संकट के समय नेतृत्व के महत्व पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि व्यापक राष्ट्रीय हित में कठिन फैसले लेने के लिए राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास से सीख लेकर भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तैयारी की जानी चाहिए।

नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

विभाजन के दौरान हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने तैयारी और जिम्मेदार निर्णय प्रक्रिया के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोगों की सुरक्षा और संरक्षा को प्रभावित करने वाले निर्णय पर्याप्त पूर्व सूचना के साथ लिए जाने चाहिए। हर नागरिक की सुरक्षा और संरक्षा हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

हजारों वर्षों की विरासत भी बंटी

उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं था, बल्कि इसने हजारों वर्षों से आपस में जुड़ी सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत को भी बांट दिया। उन्होंने सिंधु नदी, करतारपुर साहिब, ननकाना साहिब, प्राचीन शक्तिपीठों तथा हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला जैसी महत्वपूर्ण सभ्यतागत, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत तक पहुंच में आई बाधाओं का उल्लेख किया।

राष्ट्र सबसे ऊपर रखने का आह्वान

सी. पी. राधाकृष्णन ने नागरिकों से संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कोई भी जाति, धर्म या क्षेत्र राष्ट्र से बड़ा नहीं हो सकता। प्रत्येक भारतीय को भारतीय होने पर गर्व करना चाहिए और उस साझा सभ्यतागत विरासत तथा राष्ट्रीय पहचान के प्रति सजग रहना चाहिए, जो देश को एक सूत्र में पिरोती है।

15 विभाजन पीड़ितों को किया सम्मानित

कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति ने विभाजन का दंश झेल चुके 15 लोगों को सम्मानित किया। यह सम्मान उनके साहस, हिम्मत और विभाजन की स्मृतियों तथा जीवन-अनुभवों को सहेजने में उनके योगदान के प्रति आभार के रूप में दिया गया।

2023 में स्थापित हुआ अध्ययन केंद्र

उपराष्ट्रपति ने विभाजन के इतिहास को सहेजने और उसके अध्ययन के लिए वर्ष 2023 में सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज की स्थापना करने पर दिल्ली विश्वविद्यालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि केंद्र ने कम समय में विभाजन का दंश झेल चुके 100 से अधिक लोगों के मौखिक संस्मरण दर्ज किए हैं। व्याख्यानों, अभिलेखागारों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए युवा विद्यार्थियों को भी इस इतिहास से जोड़ा जा रहा है।

शिक्षाविद और शोधार्थी रहे मौजूद

संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष राघवेंद्र तंवर, डीन ऑफ कॉलेजेज बलराम पाणि और रजिस्ट्रार विकास गुप्ता सहित शिक्षाविद, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और विभाजन पीड़ित मौजूद रहे। (इनपुट: पीआईबी)