PM Modi in G-7 : जी-7 के मंच से कई लक्ष्य साधेंगे पीएम मोदी, भारत का रहेगा दबदबा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-7 समिट कनाडा में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करवायी। दुनिया भर के अति संपन्नशील देशों का न्यौता नई दिल्ली को मिलना काफी अहम है। गौरतलब है कि ये शिखर सम्मेलन बेहद नाजुक हालातों में हो रहा है, जहां पश्चिम एशिया में इस्राइल और ईरान एक दूसरे को खत्म करने की सौंगध खा चुके है, वहीं, पूर्वी यूरोप कीव और क्रेमलिन जंगी मोर्चां खोले हुए हैं। जी-7 के मंच के जरिए पीएम मोदी अन्तर्राष्ट्रीय कारोबार, शांति स्थिरता, मौसमी बदलाव, सप्लाई चैन में रूकावट, आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों और चुनौतियों को उठायेंगे।

इस एक मंच से पीएम मोदी कई लक्ष्य को साध सकते है, जिनमें पहला मसला अफ्रीकी देशों में भारत की विकास परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है। ड्रैगन के चीनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जवाब में भारत इससे मिलते-जुलते प्रोजेक्ट के साथ अफ्रीकी महाद्वीप पर अपना ध्यान लगायेगा। साफ है कि बीजिंग का काउंटर करने के लिए सड़क सम्पर्क या फिर आधारिक संरचना से जुड़ी कोई बड़ी परियोजना अफ्रीका को तोहफे में मिल सकती है। 

वहीं, ग्रीन एनर्जी के विकास में नई दिल्ली जी7 के जरिए संभावनाओं के नए रास्ते तलाशेगा। बता दें कि भारत काफी तेजी से जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, जिसकी जगह स्वच्छ वैकल्पिक ईंधन को दी जायेगी। इसमें सौर प्रणाली चलित बैट्रियां, उन्नत कम्प्रेस्ड बॉयो गैस प्लांट, इथेनॉल ब्लेडिंग, ईवी और हाइड्रोजन फ्यूल से जुड़े तकनीकी साझाकरण के लिए जी7 से नए साझेदार भारत को मिल सकेंगे। गौरतलब है कि नई दिल्ली के नीति नियंता काफी तेजी से ग्रीन-क्लीन एनर्जी और नेट-जीरो की दिशा में बढ़ रहे है, ऐसे में हमारी जरूरतों और बुनियादी ढांचे को G7 से आयातित तकनीक की दरकार है। माना जा रहा है कि हरित तकनीकी हस्तांतरण और वित्तीय पोषण से संबंधित कई मसौदो पर द्विपक्षीय रजामंदी बन सकती है। अगर भारत ऐसा कर पाने में कामयाब रहा तो कई विकासशील देशों को इसका सीधा फायदा मिलना तय है। 

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ड्रैगन के विस्तारवादी रवैये और आक्रामक तिजारती तेवरों को लेकर नई दिल्ली गहन विमर्श का माहौल तैयार करेगा। भारत लंबे समय से क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को लेकर खासा चितिंत रहा है। इस समस्या के सामने भारत कई कारोबारी पहले, बुनियादी ढांचा विकास, सुरक्षात्मक समुद्री क्षमताएं और आर्थिक गलियारों से जुड़ी परियोजना की ड्राफ्टिंग कर उन्हें अमली जामा पहनाने का मन बना चुका है। ऐसे में पीएम मोदी जी-7 देशों के सामने इस पेशकश को रखेंगे। पीएम मोदी अपने पहले ही कार्यकाल से G7 देशों के साथ मजबूत कारोबारी रिश्ते बनाए हुए है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, जापान, यूके और अमेरिका इन सभी मुल्कों के साथ तिजारती तालुक्कातों के चलते भारत के आर्थिक वर्चस्व में काफी इजाफा हुआ। खास बात ये भी है कि इन सभी देशों से सशक्त होते संबंधों के चलते द्विपक्षीय हितों को नयी धार मिली है। ये कवायद बीजिंग के सामने हमें कई कारोबारी विकल्प उपलब्ध करवाती है। 

हाल ही में जब बीजिंग ने वाशिंगटन को दुर्लभ खनिजों और अन्य कच्चा माल की आपूर्ति करने से मना कर दिया था। चीन पर जरूरत से ज्यादा तकनीकी और कच्चे माल की निर्भरता से जुड़े खतरों से G7 मुल्क अच्छी तरह वाकिफ है। ऐसे में शिखर सम्मेलन में शामिल सभी हितधारक देश अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और सप्लाई चैन पर मंडरा रहे चीनी खतरे के बीच नई दिल्ली को भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर देख रहे है। भारत के उन्नत बाजार, उभरती अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक परिवेश जी7 निवेशकों को भारत की ओर खींचेगा। इसका प्रभाव शिखर सम्मेलन के समापन पर दिखना तय है। 

भारत एशिया और अफ्रीका महाद्वीप जैसे तीसरी दुनिया के विकासशील क्षेत्रों की आवाज है। वित्तीय असंतुलन, संतुलित कारोबार और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर नई दिल्ली ने इन देशों के कई मंचों पर रहनुमाई की। जी7 में खुद को ग्लोबल विनिर्माण केंद्र के रूप में साबित करते हुए भारत चीनी पाले में जाने वाले संभावित निवेश को अपनी ओर जरूर मोड़ना चाहेगा। डिजिटल इफ्रांस्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक चैन, कुशल कार्यबल और अनुकूलित माहौल के चलते कई जी7 देशों के साथ भारत के कारोबारी समझौते हुए है। दुनिया भर की कई आला कंपनियों के ऑफिस आज भारत में है, जो कि इस तथ्य का प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है।

खास बात ये भी है कि चीनी और अमेरिकी तिजारती तनातनी के बीच ये भारत के लिए अच्छा मौका है कि वो इस मंच का इस्तेमाल कर ज्यादा से ज्यादा माइलेज अपने हिस्से में ला सके। 

(इस आलेख के लेखक राम अजोर वरिष्ठ पत्रकार एवं समसामयिक  मामलों के विश्लेषक हैं)

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