राष्ट्रपति मुर्मु ने राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज के 65वें कोर्स को संबोधित किया, कहा-रणनीतिक बुद्धिमत्ता ही सच्ची शक्ति

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज के 65वें कोर्स के फैकल्टी और कोर्स सदस्यों से बातचीत की। इस अवसर पर भारतीय सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं और 32 मित्र देशों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। राष्ट्रपति मुर्मु ने इस विविध समूह का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे वरिष्ठ अधिकारियों का दल आपसी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान रणनीतिक शिक्षा के क्षेत्र में एक मानक बन चुका है, जो राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के क्षेत्रों में बेहतर समझ, सहयोग और साझेदारी को बढ़ावा देता है।

राष्ट्रपति ने कॉलेज के आदर्श वाक्य “बुद्धिर्यस्य बलं तस्य” (जिसके पास बुद्धि है, वही वास्तव में शक्तिशाली है) का उल्लेख करते हुए कहा कि रणनीतिक बुद्धिमत्ता ही नेतृत्व की नींव होती है, विशेष रूप से सुरक्षा के क्षेत्र में। उन्होंने बताया कि 47 सप्ताह का यह व्यापक कोर्स प्रतिभागियों को नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया में गहन रणनीतिक समझ विकसित करने में मदद करेगा। राष्ट्रपति मुर्मु ने सशस्त्र बलों की “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान प्रदर्शित उत्कृष्ट समन्वय और रणनीतिक दूरदर्शिता की सराहना की। उन्होंने कहा कि तीनों सेनाओं की संयमित और संयुक्त कार्रवाई से आतंकवादी ढांचे को नियंत्रण रेखा (LoC) के पार और उससे आगे तक ध्वस्त करने में सफलता मिली। उन्होंने कहा कि यह अभियान सशस्त्र बलों की मजबूत नेतृत्व क्षमता और संयुक्तता का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता को बढ़ावा देने की प्रक्रिया मुख्य रक्षा स्टाफ (CDS) के अधीन सैन्य मामलों के विभाग की स्थापना से शुरू हुई थी। उन्होंने इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स और इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स के गठन की दिशा में हो रहे प्रयासों का स्वागत किया। राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि बदलते भू-राजनीतिक और सुरक्षा परिदृश्य के अनुरूप सशस्त्र बलों में अनुकूलनशीलता और तकनीकी आधुनिकता जरूरी है। उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि भारत अपनी सेनाओं को बहु-क्षेत्रीय एकीकृत अभियानों के लिए तैयार, तकनीकी रूप से सक्षम और युद्धक दृष्टि से सशक्त बना रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा केवल रणनीतिक तैयारी पर नहीं, बल्कि सार्वभौमिक मूल्यों पर भी आधारित होती है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय हित और उद्देश्य किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा रूपरेखा की नींव होते हैं, लेकिन सार्वभौमिक मूल्य ही हमारे राष्ट्रीय हितों की दिशा तय करते हैं।” इसके साथ ही उन्होंने प्राचीन भारतीय दर्शन “वसुधैव कुटुंबकम” (पूरा विश्व एक परिवार है) का उल्लेख किया। भारत की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक परंपराओं का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि महाभारत भारत की शांति और युद्ध की दृष्टि को दर्शाता है, जहां अहिंसा और कूटनीति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, लेकिन जब युद्ध अपरिहार्य हो जाए तो साहस और कर्तव्य को सर्वोपरि माना गया है। उन्होंने कहा, “हमारे लिए शांति सर्वोच्च है, लेकिन जब संघर्ष आवश्यक हो जाए, तो हम पूरी दृढ़ता के साथ उसका सामना करते हैं।”

राष्ट्रपति ने कहा कि गांधी स्मृति और राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज की भौगोलिक निकटता इस बात का प्रतीक है कि भारत शांति और तैयारी दोनों के प्रति समान रूप से समर्पित है। उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने इन दोनों संस्थानों को पास रखकर हमें यह याद दिलाया है कि शांति और तत्परता हमारे मूल मूल्य हैं।” उन्होंने महात्मा गांधी के इस विचार को भी उद्धृत किया कि “अहिंसा वीरों का अस्त्र है”, और अधिकारियों से आग्रह किया कि वे अपने नेतृत्व में साहस और नैतिक शक्ति के इस भाव को आगे बढ़ाएं।

राष्ट्रपति मुर्मु ने विश्वास जताया कि यह कोर्स प्रतिभागियों को रणनीतिक, भू-राजनीतिक और रक्षा संबंधी विषयों पर गहन दृष्टिकोण प्रदान करेगा। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को उनके क्षेत्रों में रणनीतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं। -(PIB)