सतत वन प्रबंधन को बढ़ावा, एपीएफडीसी और ओडिशा के बांस किसान को मिला पहला प्रमाण

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने आज नई दिल्ली में भारतीय वन एवं लकड़ी प्रमाणन योजना (आईएफडब्ल्यूसीएस) के तहत भारत के पहले ‘प्रमाण’ प्रमाण पत्र प्रदान किए। ये प्रमाण पत्र आंध्र प्रदेश वन विकास निगम (एपीएफडीसी) को 33,000 हेक्टेयर क्षेत्र में किए गए वृक्षारोपण और ओडिशा बांस विकास एजेंसी (ओबीडीए) से जुड़े एक किसान को दिए गए। कार्यक्रम का आयोजन भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (आईआईएफएम), भोपाल ने योजना के संचालन निकाय के रूप में किया। कार्यक्रम में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विभिन्न राज्यों के वन विभागों के अधिकारी, प्रमाणन निकायों के प्रतिनिधि और उद्योग जगत के प्रतिनिधि मौजूद रहे। प्रमाणन से पहले संबंधित वृक्षारोपण का विस्तृत क्षेत्रीय और प्रबंधन ऑडिट किया गया।

वैश्विक बाजार की जरूरतों को पूरा करने का साधन

भूपेंद्र यादव ने कहा कि वनों की कटाई से मुक्त लकड़ी के स्रोत और आजीविका सृजन से जुड़ी उभरती वैश्विक जरूरतों को पूरा करने में प्रमाण एक महत्वपूर्ण साधन है। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार में बाजार तक पहुंच तेजी से सत्यापन योग्य स्थिरता प्रमाणों से जुड़ रही है। ऐसे में प्रमाण भारतीय उत्पादकों, निर्यातकों और वन-आधारित उद्यमों को प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लागू उचित परिश्रम और वनों की कटाई से मुक्त लकड़ी के स्रोत से जुड़े मानकों को पूरा करने में मदद कर सकता है।

सतत वन प्रबंधन में भारत की भूमिका

यादव ने कहा कि प्रमाण भारत को केवल वैश्विक नियामक आवश्यकताओं का अनुपालन करने में ही सक्षम नहीं बनाएगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल एंड एक्ट ग्लोबल’ के दृष्टिकोण के अनुरूप सतत वन प्रबंधन और वनों के बाहर वृक्ष प्रणालियों में नेतृत्व करने का अवसर भी देगा। उन्होंने कहा कि कई राज्य वन विभागों, वन विकास निगमों, किसानों और उद्योगों ने वन प्रबंधन, वनों के बाहर वृक्षों और अभिरक्षा श्रृंखला के प्रमाणन के लिए आवेदन किया है, जो विभिन्न चरणों में प्रक्रियाधीन हैं।

तीसरे पक्ष के ऑडिट पर आधारित प्रमाणन

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रमाण की प्रत्यायन प्रणाली अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन प्रारूपों के अनुरूप है और यह सुनिश्चित करती है कि इसके तहत जारी प्रमाण पत्रों को घरेलू और वैश्विक खरीदारों तथा नियामकों के बीच मान्यता मिले। वन प्रबंधन प्रमाणन भारतीय वन प्रबंधन मानक पर आधारित है, जो राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता (एनडब्ल्यूपीसी) 2023 का हिस्सा है। प्रमाणन केवल स्व-घोषणा पर आधारित नहीं है, बल्कि भारतीय गुणवत्ता परिषद के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रमाणन निकाय प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीसीबी) से मान्यता प्राप्त प्रमाणन निकायों के स्वतंत्र ऑडिट पर आधारित है।

ग्रामीण और जनजातीय समुदायों के लिए नए अवसर

भूपेंद्र यादव ने प्रमाण को व्यापारिक साधन के साथ आजीविका का माध्यम भी बताया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण और जनजातीय समुदायों, छोटे किसानों और वन-निर्भर समुदायों को संरचित एवं सत्यापन योग्य प्रमाणन व्यवस्था से जोड़कर अनुपालन करने वाले और प्रीमियम बाजारों तक आय के नए रास्ते खोले जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि महिला स्वयं सहायता समूहों, गैर-लकड़ी वन उत्पादों के संग्रहण एवं प्रसंस्करण से जुड़े लोगों, कृषि एवं वानिकी तथा विभिन्न वृक्ष-आधारित कृषि प्रणालियों में लगे सीमांत भूमिधारकों को भी इससे लाभ मिल सकता है।

विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ा

यादव ने इस पहल को 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ते हुए कहा कि प्रमाण आर्थिक विकास को पारिस्थितिक प्रबंधन के साथ जोड़ने वाले भारत के व्यापक प्रयासों को दर्शाता है। उन्होंने आईआईएफएम और मंत्रालय के प्रयासों की सराहना की तथा प्रमाणन निकायों, राज्य वन विभागों, वृक्ष उत्पादकों, किसान उत्पादक संगठनों, किसान उत्पादक कंपनियों, उद्योगों और अन्य संस्थानों से प्रमाण में भागीदारी बढ़ाने का आह्वान किया।

क्या है ‘प्रमाण’

‘प्रमाण’ यानी कृषि वानिकी और प्राकृतिक वानिकी संसाधनों के लिए सतत प्रबंधन पद्धतियों की मान्यता और प्रत्यायन हेतु कार्यक्रम, वनों, लकड़ी और गैर-लकड़ी वन उत्पादों के प्रमाणन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत प्रारूप है। इसका उद्देश्य प्रमाणित वनों और कृषि वानिकी उत्पादों को घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना है। आईएफडब्ल्यूसीएस-प्रमाण प्रमाण पत्र भारतीय वनों, कृषि वानिकी प्रणालियों और लकड़ी आधारित उद्योगों के सामाजिक एवं पारिस्थितिक मूल्यों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

भारतीय वन प्रबंधन मानक पर आधारित व्यवस्था

वन प्रबंधन प्रमाणन का मूल्यांकन भारतीय वन प्रबंधन मानक के आधार पर किया जाता है, जो राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता 2023 का हिस्सा है। प्रमाणन व्यवस्था में स्वतंत्र ऑडिट को आधार बनाया गया है। इसके लिए भारतीय गुणवत्ता परिषद के अंतर्गत एनएबीसीबी से मान्यता प्राप्त प्रमाणन निकायों की भूमिका तय की गई है। यह व्यवस्था घरेलू और वैश्विक खरीदारों तथा नियामकों के बीच प्रमाण पत्रों की विश्वसनीयता और मान्यता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार की गई है। (इनपुट: पीआईबी)