16/07/26 | 12:54 pm

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Rath Yatra 2026: रथ यात्रा का कारण और क्या है संदेश, क्यों भक्तों के बीच भीड़ में पहुंच जाते हैं प्रभु जगन्नाथ

ओडिशा के पुरी शहर का अद्भुत नजारा पूरा विश्व देख रहा है। लाखों श्रद्धालुओं का विशाल जन-सैलाब, आसमान छूते भव्य रथ और एक ऐसी परंपरा जहां ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ अपने गर्भगृह की सीमाओं को छोड़कर अपने भक्तों के बीच आ जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सनातन धर्म में शायद ही भगवान अपने घर या मंदिर छोड़ कर बाहर भक्तों के बीच आ जाते हों। इसके पीछे का कारण क्या है और संदेश क्या है। आप जानकर हैरान होंगे कि ये परंपरा कोई 100-200 साल पुरानी नहीं बल्कि एक हजार साल पुरानी है।
पीढ़ियां आईं और चली गईं, बड़े-बड़े साम्राज्य बने और बिगड़ गए, लेकिन पुरी की सड़कों पर भक्ति का सैलाब एक हजार साल से लगातार चला आ रहा है। ये सिर्फ एक त्यौहार नहीं है बल्कि जीता-जागता इतिहास है।

माना जाता है कि पुरी का रथ यात्रा उत्सव (जिसे भारत के बाहर ‘चैरियट फेस्टिवल’ भी कहा जाता है) उतना ही पुराना है जितना कि जगन्नाथ मंदिर। यह कई मायनों में एक अनोखा त्योहार है। भारत में यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसमें देवी-देवताओं को मंदिर परिसर से बाहर निकाला जाता है। सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लोग इसमें शामिल होते हैं और पुरी में उमड़ने वाले जनसैलाब का हिस्सा बनकर आनंद लेते हैं। जगन्नाथ रथयात्रा भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध यात्रा है। हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को ओडिशा के पुरी में ये निकाली जाती है।

विश्वव्यापी संदेश-समानता का प्रतीक
रथ यात्रा का जो मूल संदेश हैं वो है समानता। जब ईश्वर स्वयं सड़क उतर जाते हैं तो समाज के सभी भेदभाव चाहे जाति के हों, वर्ग के हो या उंच-नीच के सब दूर हो जाते हैं। इसका संदेश देती है “छेरा पहरा” की रस्म। जब राजा खुद “छेरा पहरा” करते हैं यानी सोने की झाड़ू से रथ के आगे का रास्ता साफ करते हैं। इसका मतलब है कि भगवान के सामने सब बराबर हैं।

रथयात्रा का पहली बार टीवी पर प्रसारण
प्राचीन मंदला पांजी में रथ यात्रा के ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज हैं। फिर 14वीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों ने रथ यात्रा को देखा और इसके बार में लिखा। लेकिन साल 1984 में पहली बार राष्ट्रीय टीवी पर प्रसारण हुआ। जिसके बाद पहली बार पूरे देश ने रथयात्रा को देखा और भक्ति में डूब गए। आज ये पर्व पुरी से निकल कर अहमदाबाद, कोलकाता, लंदन, न्यूयॉर्क तक में जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है। ये भक्ति के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने का जरिया बन गई है।

इतिहास

पौराणिक कथा

ऐतिहासिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा ने एक बार अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाने की इच्छा जताई। उसी याद में हर साल उन्हें रथ पर बिठाकर पुरी के मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। ये 9 दिन तक वहां रहते हैं और फिर वापस आते हैं। इसे “बहुड़ा यात्रा” कहते हैं।

मंदिर से जुड़ी कथा
पुरी के जगन्नाथ मंदिर का निर्माण राजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था। कहा जाता है कि भगवान ने खुद लकड़ी के रूप में समुद्र किनारे प्रकट होकर मूर्तियां बनवाने का आदेश दिया था। रथ यात्रा उसी परंपरा का हिस्सा है जो 12वीं सदी से चली आ रही है।

ऐतिहासिक प्रमाण
कलिंग राजाओं के समय से ही रथ यात्रा का उल्लेख मिलता है। 12वीं सदी में राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने जगन्नाथ मंदिर बनवाया और तब से ये उत्सव बड़े पैमाने पर होने लगा।

महत्व और मान्यताएं

दर्शन का महत्व
साल में एक बार भगवान मंदिर से बाहर निकलकर आम लोगों को दर्शन देते हैं। मान्यता है कि जो भी रथ की रस्सी खींचता है या रथ के दर्शन करता है उसे मोक्ष मिलता है।

तीन अलग रथ
आपको जानकर हैरानी होगी ये विशालकाय रथों का निर्माण हर नया होता है, वो भी बिना किसी मशीन के सहारे के। सैकड़ों कारीगर हफ्तों तक दिन-रात मेहनत करके, इस रथ का निर्माण करते हैं। इन रथों को हजारों लोग मिलकर रस्सियों से खींचते हैं। 3 किमी का सफर 2-3 दिन में पूरा होता है। इन रथों को अलग-अलग नाम भी दिए जाते हैं।

नंदीघोष: भगवान जगन्नाथ का रथ, 16 पहिए, लाल-पीला कपड़ा, 45 फीट

तालध्वज: बलभद्र का रथ, 14 पहिए, लाल-हरे रंग का, 43 फीट

दर्पदलन: सुभद्रा का रथ, 12 पहिए, लाल-काले रंग काहर रथ, 42 फीट

रथ निर्माण
हर साल नए रथ बनाए जाते हैं। अक्षय तृतीया से ही लकड़ी काटने और रथ बनाने का काम शुरू हो जाता है। रथ का निर्माण इस तरह होता है कि मंदिर के अंदर हमेशा ठंडक बनी रहती है। अगर बारिश भी हो जाए तो ऐसे गुंबद बने होते हैं कि पानी की एक बूंद भी अंदर नहीं गिरती

गुंडिचा मंदिर = मौसी का घर

अब जानते हैं भव्य यात्रा आगे कैसे बढ़ती है। ये यात्रा मुख्य मंदिर से शुरू हो कर 3 किमी दूर गुंडिचा मंदिर तक जाती है।
9 दिन तक भगवान गुंडिचा मंदिर में रहते हैं। इसे उनका विश्राम और मौसी के घर जाना माना जाता है। वहां उन्हें खास “पोड़ा पिठा” भोग लगाया जाता है। भगवान फिर वापस अपने मुख्य मंदिर आ जाते हैं। इस वापसी की यात्रा को बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। खासतौर पर यह यात्रा जीवन में बदलाव और निरंतर चलने रहने को दर्शाती है।

खास बातें
नवकलेवर: हर 12-19 साल में जब आषाढ़ में दो महीने आते हैं तब भगवान की मूर्तियों को नई लकड़ी से बदलते हैं। इसे नवकलेवर कहते हैं।

महाप्रसाद: यात्रा के दौरान बनने वाला 56 भोग का प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता, इसे भगवान का चमत्कार माना जाता है।संक्षेप में कहें तो रथ यात्रा सिर्फ एक त्योहार नहीं है।
ये भक्ति, सेवा, समानता और समुदाय का जश्न है। भगवान खुद अपने भक्तों से मिलने उनके बीच आते हैं, इसलिए इसे “जनता का त्योहार” भी कहा जाता है।