प्रतिक्रिया | Friday, April 12, 2024

कठपुतली कला में नजर आता है भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब

आज के बच्चों में भले ही ऑनलाइन गेम्स को लेकर उत्साह हो, फिर भी कठपुतली कला का अभी भी मनोरंजन में विशेष स्थान है। कठपुतली नृत्य को लोकनाट्य की ही एक शैली माना गया है। कठपुतली कला अत्यंत प्राचीन नाटकीय खेल है जिसमें लकड़ी, धागे, प्लास्टिक या प्लास्टर ऑफ पेरिस की गाड़ियों द्वारा जीवन के प्रसंगों की अभिव्यक्ति तथा मंचन किया जाता है। कठपुतली कला विश्व के प्राचीनतम मनोरंजक कार्यक्रमों में से एक है।

कठपुतली कला क्यों पड़ा नाम
वास्तव में इसे कठपुतली कला इसलिए कहा गया क्योंकि इसे लकड़ी अर्थात काष्ठ से बनाया जाता था। इस प्रकार काष्ठ से बनी पुतली का नाम कठपुतली पड़ा। हर साल विश्व कठपुतली दिवस 21 मार्च को मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव जी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर माता पार्वती का मन बहला कर इस कला को प्रारंभ किया। ध्यातव्य है कि कठपुतली कला कई कलाओं का मिश्रण है जैसे – नाट्य कला, चित्रकला, वेशभूषा, मूर्तिकला, काष्ठकला, वस्त्र-निर्माण कला, रूप-सज्जा, संगीत, नृत्य आदि।

कठपुतली कला की कई शैलियां
बता दें कि भारत में कठपुतली कला की कई शैलियां हैं जैसे- धागा पुतली, छायापुतली, छड़ पुतली, दस्ताना पुतली आदि। धागा कठपुतली कला, इसमें अनेक जोड़युक्त अंगों का धागों द्वारा संचालन किया जाता है। वहीं छाया कठपुतली कला में पर्दे को पीछे से प्रदीप्त किया जाता है और पुतली का संचालन प्रकाश स्रोत तथा पर्दे के बीच से किया जाता है। जबकि दस्ताना पुतली को हथेली पुतली भी कहा जाता है। इसके अलावा छड़ कठपुतली कला वैसे तो दस्ताना पुतली का ही अगला चरण है, लेकिन यह उससे काफी बड़ी होती है ।

कठपुतली कला हो रही सीमित
हालाकि चिंता की बात यह है कि समय के साथ कठपुतली कला को लेकर आकर्षण लोगों में बहुत कम हो गया है। आधुनिक युग में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लोगों को कठपुतली के बजाय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कार्यक्रम देखना अधिक आकर्षक लगता है। आमतौर पर कठपुतली कला केवल भक्ति और पौराणिक कथाओं तक ही सीमित है। बदलते समय के साथ कठपुतली कला में तकनीकी और पूंजी निवेश नहीं हुआ है। कठपुतली कला के प्रदर्शन के मामले में आधुनिकीकरण का अभाव है।

कठपुतली कला का इतिहास
भारत में कठपुतली कला का लंबा इतिहास है। परंपरागत रूप से नर्तक गांव में जाकर लोगों का मनोरंजन करते थे। कठपुतली कला का विषय चर्चित प्रेम प्रसंगों के लिए जाने जाता हैं। इन कठपुतलियों से स्थानीय चित्रकला, वास्तुकला, वेशभूषा और अलंकारी कलाओं का पता चलता है। मध्यकालीन राजस्थानी पोशाक पहने कठपुतलियों द्वारा इतिहास के प्रेम प्रसंग दर्शाए जाते हैं। अमर सिंह राठौर का चरित्र काफी लोकप्रिय है, क्योंकि इसमें युद्ध और नृत्य दिखाने की भरपूर संभावनाएं हैं। कठपुतली की सबसे खास बात यह है कि इसमें कई कलाओं का संगम है। इसलिए जब भी मंच पर कठपुतली कला का मंचन होता है तो यह दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है। आज वक्त की मांग है कि कठपुतली कला के कलाकारों को समाज के स्तर पर बढ़ावा मिले। वहीं कठपुतली कला में पूंजी और तकनीकी का निवेश भी हो जिससे कठपुतली कला को प्रोत्साहन मिले।

by-दीपक दुबे

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आखरी अपडेट: 12th Apr 2024