त्र्यंबकेश्वर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से आठवां है। त्र्यंबकेश्वर ज्योर्तिलिंग में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही विराजित हैं, यही इस ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। अन्य सभी ज्योतिर्लिंगों में केवल भगवान शिव ही विराजित हैं।
‘सावन माह में विशेष’ की कड़ी में हम आपको पिछले कुछ दिनों से भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। यह शिव शक्ति के वो 12 पवित्र स्थल हैं, जहां भगवान शिव स्वयंभू प्रकट हुए। इससे पहले, आपने प्रथम सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन, तीसरे महाकालेश्वर, चौथे ओंकारेश्वर, पांचवें केदारेश्वर और छठें भीमाशंकर, सातवें विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में पढ़ा। आज आपको त्र्यंबकेश्वर ज्योर्तिलिंग के बारे में बता रहे हैं।
श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नासिक से लगभग 28 कि. मी. की दूरी पर ब्रह्मगिरी नामक पर्वत के पास स्थित है, जहां से गोदावरी नदी बहती है। इसका निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव (1740-1760) द्वारा एक पुराने मंदिर के स्थान पर किया गया था। त्र्यंबकेश्वर मंदिर एक धार्मिक केंद्र है, जिसके गर्भ गृह में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग है। मंदिर के अंदर एक छोटे से गढ्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति
इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के विषय में शिवपुराण में यह कथा वर्णित है- एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियां किसी बात पर उनकी पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन्होंने अपने पतियों को ऋषि गौतम का अपमान करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके निमित्त भगवान् श्रीगणेशजी की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न हो गणेशजी ने प्रकट होकर उनसे वर मांगने को तब उन ब्राह्मणों ने कहा- ‘प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं, तो किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दें।’ उनकी यह बात सुनकर गणेशजी ने उन्हें ऐसा वर न मांगने के लिए समझाया। किंतु वे अपने आग्रह पर अटल रहे।
अंततः गणेशजी को विवश होकर उनकी बात माननी पड़ी। अपने भक्तों का मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर रहने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि बड़ी नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हांकने के लिए लपके। उन तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं मरकर गिर पड़ी। अब तो बड़ा हाहाकार मचा।
सारे ब्राह्मण एकत्र हो, गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भर्त्सना करने लगे। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत आश्चर्यचकित और दुःखी थे। अब उन सारे ब्राह्मणों ने कहा कि तुम्हें यह आश्रम छोड़कर अन्यत्र कहीं दूर चले जाना चाहिए। गो-हत्यारे के निकट रहने से हमें भी पाप लगेगा। विवश होकर ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहाँ से एक कोस दूर जाकर रहने लगे। किंतु उन ब्राह्मणों ने वहां भी उनका रहना दूभर कर दिया। वे कहने लगे- ‘गो-हत्या के कारण तुम्हें अब वेद-पाठ और यज्ञादि के कार्य करने का कोई अधिकार नहीं रह गया।’ अत्यंत अनुनय भाव से ऋषि गौतम ने उन ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि आप लोग मेरे प्रायश्चित और उद्धार का कोई उपाय बताएं।
तब उन्होंने कहा- ‘गौतम! तुम अपने पाप को सर्वत्र सबको बताते हुए तीन बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करो। फिर लौटकर यहां एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद ‘ब्रह्मगिरी’ की 101 परिक्रमा करने के बाद तुम्हारी शुद्धि होगी अथवा यहां गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो। इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगीरि की 11 बार परिक्रमा करो। फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा।
ब्राह्मणों के कथनानुसार महर्षि गौतम वे सारे कार्य पूरे करके पत्नी के साथ पूर्णतः तल्लीन होकर भगवान शिव की आराधना करने लगे। इससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वर मांगने को कहा। महर्षि गौतम ने उनसे कहा- ‘भगवान् मैं यही चाहता हूं कि आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्त कर दें।’ भगवान् शिव ने कहा- ‘गौतम ! तुम सर्वथा निष्पाप हो। गो-हत्या का अपराध तुम पर छल पूर्वक लगाया गया था। छल पूर्वक ऐसा करवाने वाले तुम्हारे आश्रम के ब्राह्मणों को मैं दण्ड देना चाहता हूं।’ इस पर महर्षि गौतम ने कहा कि प्रभु! उन्हीं के निमित्त से तो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। अब उन्हें मेरा परमहित समझकर उन पर आप क्रोध न करें।’
बहुत से ऋषियों, मुनियों और देव गणों ने वहां एकत्र हो गौतम की बात का अनुमोदन करते हुए भगवान् शिव से सदा वहां निवास करने की प्रार्थना की। वे उनकी बात मानकर वहां त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए। गौतमजी द्वारा लाई गई गंगाजी भी वहां पास में गोदावरी नाम से प्रवाहित होने लगीं। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला है।
त्र्यंबकेश्वर प्राचीन हिंदू तीर्थ स्थल
त्र्यंबकेश्वर शहर ब्रह्मगिरी पहाड़ी की तलहटी में स्थित है, जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से 3000 फीट है। यह भारत की सबसे लंबी नदी गोदावरी के उद्गम स्थल पर बसा एक प्राचीन हिंदू तीर्थ स्थल है। मौजूदा त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव (1740-1760) ने एक पुराने मंदिर की जगह पर करवाया था। इसके चारों तरफ-यानी पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर दिशाओं में-प्रवेश द्वार बने हुए हैं। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्व दिशा शुरुआत को, पश्चिम दिशा परिपक्वता को, दक्षिण दिशा पूर्णता या समापन को और उत्तर दिशा ज्ञान-प्राप्ति या रहस्योद्घाटन को दर्शाती है।
गोदावरी के उद्गम-स्थान के समीप स्थित त्रयम्बकेश्वर-भगवान की बड़ी महिमा हैं।गौतम ऋषि तथा गोदावरी के प्रार्थनानुसार भगवान शिव इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यम्बकेश्वर नाम से विख्यात हुए। त्र्यंबकेश्वर मंदिर का रखरखाव त्र्यंबकेश्वर मंदिर न्यास द्वारा किया जाता है। साल 1954 में संस्थान को पब्लिक ट्रस्ट रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्टर किया गया था। श्री त्र्यंबकेश्वर संस्थान रोज़ाना तीन बार होने वाली पूजा और साल भर के सभी त्योहारों और बड़े आयोजनों की देखरेख करता है।
पूजा और कार्यक्रम
ऐसा भी माना जाता है कि जीवन मे सभी समस्याओ के लिए आध्यात्मिक निवारण हैं और विभिन्न अनुष्ठान करना उनमे से ही एक है। मान्यता है कि अन्य मंदिर के तुलना मे त्र्यंबकेश्वर में पूजा करने से अधिक लाभ होता है। विभिन्न अनुष्ठान जैसे नारायण नागबली, कालसर्प पूजा, महामृत्युंजय मंत्र जाप, त्रिपिंडी श्राद्ध, कुंभ विवाह, रूद्र अभिषेक यहां त्रिम्बकेश्वर महादेव मंदिर परिसर मे अधिकृत पुरोहितो और ब्राह्मणो के मार्गदर्शन मे ही किए जाते है।
शिवरात्रि और सावन सोमवार के दिन त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। भक्त भोर के समय स्नान करके अपने आराध्य के दर्शन करते हैं। यहां कालसर्प योग और नारायण नागबलि नामक खास पूजा-अर्चना भी होती है, जिसके कारण यहां साल भर लोग आते रहते हैं।


