IIT बॉम्बे की रिसर्च में खुलासा, एंटीबायोटिक से कैसे बच जाते हैं टीबी बैक्टीरिया

एक नए अध्ययन में बताया गया है कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्युलोसिस, जो दुनिया की सबसे संक्रामक बीमारी क्षय रोग (टीबी) का कारण बनता है, अपनी बाहरी चर्बीयुक्त परत (लिपिड कोटिंग) में बदलाव करके एंटीबायोटिक दवाओं से खुद को बचा लेता है और लंबे समय तक जीवित रह सकता है। यह अध्ययन बुधवार को जारी किया गया और इसका नेतृत्व आईआईटी बॉम्बे के शोधकर्ताओं ने किया।

सफल एंटीबायोटिक और टीकाकरण प्रयासों के बावजूद टीबी अब भी बड़ी संख्या में जानें ले रही है। वर्ष 2024 में दुनिया भर में 1.07 करोड़ लोग टीबी से संक्रमित हुए और 12.3 लाख लोगों की मौत हुई। भारत में इसका बोझ सबसे अधिक है, जहां 2.71 मिलियन से ज्यादा मामले दर्ज हुए।

अध्ययन, जो केमिकल साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है, में पाया गया कि बैक्टीरिया की झिल्ली (मेम्ब्रेन)—जो मुख्य रूप से फैटी पदार्थों यानी लिपिड से बनी होती है—उसे दवाओं से बचाती है और यही उसकी drug-tolerance का आधार है। शोधकर्ताओं ने बैक्टीरिया को दो अवस्थाओं में पनपाया—एक सक्रिय अवस्था, जिसमें बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं, और दूसरी सुप्त अवस्था, जो शरीर में latent infection जैसा माहौल बनाती है।

जब बैक्टीरिया को चार TB दवाओं—रिफाबुटिन, मोक्सीफ्लॉक्सासिन, एमिकैसिन और क्लैरिथ्रोमाइसिन—के संपर्क में लाया गया, तो पाया गया कि सुप्त अवस्था वाले बैक्टीरिया को रोकने के लिए दवाओं की मात्रा सक्रिय बैक्टीरिया की तुलना में 2 से 10 गुना ज्यादा चाहिए होती है। इसका मतलब है कि बीमारी के शुरुआती चरण में असरदार रहने वाली दवा बाद में सुप्त टीबी कोशिकाओं पर कम काम करती है। शोधकर्ताओं ने पुष्टि की कि यह बदलाव जेनेटिक म्यूटेशन के कारण नहीं, बल्कि बैक्टीरिया की झिल्ली में बदलाव की वजह से होता है।

टीम ने बैक्टीरियल झिल्ली में 270 से अधिक लिपिड अणु भी पहचाने, जो सक्रिय और सुप्त अवस्थाओं में स्पष्ट रूप से अलग थे। सक्रिय बैक्टीरिया की झिल्ली ढीली और तरल जैसी थी, जबकि सुप्त बैक्टीरिया की झिल्ली बहुत कठोर और सघन थी, जिससे वह दवाओं के प्रवेश को रोक देती है।

अध्ययन की प्रमुख लेखिका प्रोफेसर शोभना कपूर ने कहा कि लंबे समय से टीबी का अध्ययन मुख्य रूप से प्रोटीन पर केंद्रित रहा है, लेकिन अब पता चल रहा है कि लिपिड बैक्टीरिया की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। टीम ने यह भी पाया कि रिफाबुटिन जैसी एंटीबायोटिक सक्रिय बैक्टीरिया में आसानी से प्रवेश कर जाती है, लेकिन सुप्त बैक्टीरिया की कठोर बाहरी परत से लगभग नहीं गुजर पाती। यह बाहरी परत बैक्टीरिया की “पहली और सबसे मजबूत ढाल” की तरह काम करती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर इस कठोर बाहरी झिल्ली को कमजोर किया जाए तो पुरानी दवाएँ भी फिर से प्रभावी हो सकती हैं। प्रोफेसर कपूर के अनुसार, अगर दवा के साथ ऐसा अणु दिया जाए जो झिल्ली को ढीला करे, तो बैक्टीरिया फिर से दवाओं के प्रति संवेदनशील हो जाएगा और उसके पास स्थायी प्रतिरोध विकसित करने का मौका भी नहीं बचेगा।

-(इनपुटःएजेंसी)